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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 3

191 Sukta
19 Mantra
1/105/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
मो षु दे॑वा अ॒दः स्व१॒॑रव॑ पादि दि॒वस्परि॑। मा सो॒म्यस्य॑ श॒म्भुव॒: शूने॑ भूम॒ कदा॑ च॒न वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

मो इति॑ । सु । दे॒वाः॒ । अ॒दः । स्वः॑ । अव॑ । पा॒दि॒ । दि॒वः । परि॑ । मा । सो॒म्यस्य॑ । श॒म्ऽभुवः॑ । शूने॑ । भू॒म॒ । कदा॑ । च॒न । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
मो षु देवा अदः स्व१रव पादि दिवस्परि। मा सोम्यस्य शम्भुव: शूने भूम कदा चन वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

मो इति। सु। देवाः। अदः। स्वः। अव। पादि। दिवः। परि। मा। सोम्यस्य। शम्ऽभुवः। शूने। भूम। कदा। चन। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
हे (देवाः) विद्वानो ! तुम लोगों से (दिवः) सूर्य के प्रकाश से (परि) ऊपर (अदः) वह प्राप्त होनेहारा (स्वः) सुख (कदा, चन) कभी (मो, अव, पादि) विरुद्ध न उत्पन्न हुआ है। हम लोग (सोम्यस्य) ऐश्वर्य के योग्य (शंभुवः) सुख जिससे हो उस व्यवहार की (सु शूने) सुन्दर उन्नति में विरुद्ध भाव से चलनेहारे कभी (मा) (भूम) मत होवें। और अर्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि इस संसार में धर्म और सुख से विरुद्ध काम नहीं करें और पुरुषार्थ से निरन्तर सुख की उन्नति करें ॥ ३ ॥
Subject
इस जगत् में विद्वान् जन कैसे पूछने के योग्य हैं, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है ।

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