Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/8

4/8
Sutra
ततस्तद्विपाकानुगुणानां एवाभिव्यक्तिर्वासनानां ।। ४.८ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्॥८॥

शब्दार्थ. (ततः) उन तीन प्रकार के कर्मों से (तद्-विपाक-अनुगुणानाम् ) उन कर्मों के फल के अनुरूप (एव) ही (अभिव्यक्तिः) प्रकटता होती है (वासनानाम्) वासनाओं की। 

सूत्रार्थ - शुभाशुभ और मिश्रित इन तीन प्रकार के कर्मों से मिलने वाले फलों अर्थात् मनुष्य, पशु, पक्षी आदि शरीर के अनुसार ही वासनायें = संस्कार प्रकट होते हैं।

Vyas Bhashya

तत इति त्रिविधात्कर्मणः। तद्विपाकानुगुणानामेवेति। यज्जातीयस्य कर्मणो यो विपाकस्तस्यानुगुणा या वासनाः कर्मविपाकमनुशेरते तासामेवाभिव्यक्तिः। न हि दैवं कर्म विपच्यमानं नारकतिर्यङ्मनुष्यवासनाभिव्यक्तिनिमित्तं संभवति। किं तु दैवानुगुणा एवास्य वासना व्यज्यन्ते। नारकतिर्यङ्मनुष्येषु चैवं समानश्चर्चः॥८॥

व्या० भा० अ० - ततः अर्थात् तीन प्रकार के कर्म से, उनके फलों के अनुरूप (वासनाओं की) ही (अभिव्यक्ति होती है)। जिस प्रकार के कर्म का जो विपाक, उसके अनुरूप जो वासना कर्मफल का अनुसरण करती है, उन ही की अभिव्यक्ति होती है। फलोन्मुख दैवीकर्म नरक, तिर्यक्,, मनुष्यादि भोग की अभिव्यक्ति का कारण नहीं बन सकता। किन्तु दैवी भोग के अनुरूप ही इसकी वासनाएँ अभिव्यक्त होती हैं। नारकीय, तिर्यक् एवं मनुष्यों की वासनाओं में भी यही सिद्धान्त होता है॥८॥

Yog Prakash

इस सूत्र में कर्मफलानुरूप ही वासनाओं की अभिव्यक्ति बतलाई है।इससे पूर्व सूत्र में योगियों से भिन्न लोगों के तीन प्रकार के कर्म कहे हैं। शुभ, अशुभ और शुभाशुभ (मिश्रित)। पाप और पुण्य तुल्य होने पर अर्थात् पचास-पचास प्रतिशत होने पर साधारण मनुष्य जन्म मिलता है। पचास प्रतिशत से अधिक पुण्य और पचास प्रतिशत से कम पाप होने पर उच्च कोटि के माता पिता के सान्निध्य में मनुष्य का जन्म मिलता है। पचास प्रतिशत से अधिक पाप और पचास प्रतिशत से कम पुण्य होने पर पशु, पक्षी, कीट आदि का जन्म मिलता है। जब मनुष्य का जन्म मिलता है तब मनुष्य योनि में मिलने वाले फलानुसार ही वासनाएँ अभिव्यक्त होती हैं। पशु, पक्षी आदि योनियों में भोगे जाने वाले कर्मों के फलानुसार नहीं। जब पशु जन्म मिलता है तब पशु योनि में भोगे जाने वाले कर्मों के फलानुसार ही वासनाओं की अभिव्यक्ति होती है। मनुष्य योनि में भोगे जाने वाले कर्मानुसार वासनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होती।

जिस जीवात्मा ने पूर्वजन्म में मनुष्य शरीर में रहकर जैसे भोग भोगे थे वैसी ही वासनायें बनी थीं। यदि उसी जीवात्मा को अगला जन्म मनुष्य का मिल जाता है तो पूर्वजन्म में भोगे भोगानुसार अगले जन्म में भी वैसी ही वासनायें अभिव्यक्त होंगी। इसी प्रकार से पूर्वजन्म में जिस जीवात्मा ने पशु आदि योनि में रहकर जैसा फल भोगा है, यदि कर्मों के आधार पर उसे पशु योनि मिलती है तो पूर्वजन्म मे पशु योनि में रहकर जैसे भोग भोगे हैं, वैसी ही वासनायें अगले जन्म में भी अभिव्यक्त होती हैं। जिस-जिस योनि में जीवात्मा जन्म लेता है उस-उस योनि में भोगे कर्मफलों की वासनायें अभिव्यक्त होती हैं और उस योनि से भिन्न योनि की वासनायें दब जाती हैं। मनुष्य जन्म होने पर मनुष्य जन्म में भोगे फलानुसार वासनायें अभिव्यक्त होंगी, पशु योनि, पक्षी योनि में भोगे कर्म फलानुसार वासनाओं की अभिव्यक्ति नहीं होगी। इसलिये तीन प्रकार के कर्मफलानुसार ही उस उस योनि में उस उस योनि के कर्मफलानुसार वासनाओं की अभिव्यक्ति होती है और उससे भिन्न योनियों में भोगे कर्मफलों की वासनायें दब जाती हैं॥८॥

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