Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/7

4/7
Sutra
कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्. त्रिविधं इतरेषां ।। ४.७ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० यतः-

अर्थ – क्योंकि

Word Meaning

कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्॥७॥

शब्दार्थ - (कर्म -अशुक्ल-अकृष्णम्) कर्म न शुक्ल होते हैं न कृष्ण अर्थात् निष्काम होते हैं (योगिनः) योगी के (त्रिविधम्) तीन प्रकार के कर्म होते हैं (इतरेषाम्) योगी से भिन्न व्यक्तियों के।

सूत्रार्थ - योगी के कर्म अशुक्ल = लौकिक पुण्य फल की कामना से रहित और अकृष्ण = पाप रहित होते हैं अर्थात् ईश्वरप्राप्तिमात्र के लिये किये गये 'निष्काम कर्म' होते हैं। योगी से भिन्न सांसारिक व्यक्तियों के शुभ, अशुभ और पापपुण्य (=मिश्रित) तीन प्रकार के कर्म होते हैं।

Vyas Bhashya

चतुष्पदा खल्वियं कर्मजातिः। कृष्णा, शुक्लकृष्णा, शुक्ला शुक्लाकृष्णा चेति। तत्र कृष्णा दुरात्मनाम्। शुक्लकृष्णा बहिः साधनसाध्या तत्र परपीडानुग्रहद्वारेणैव कर्माशयप्रचयः। शुक्ला तपःस्वाध्यायध्यानवताम्। सा हि केवले मनस्यायतत्वाद्बहिः साधनानधीना न परान्पीडयित्वा भवति। अशुक्लाकृष्णा संन्यासिनां क्षीणक्लेशानां चरमदेहानामिति। तत्राशुक्लं योगिन एव फलसंन्यासात्, अकृष्णं चानुपादानात्। इतरेषां तु भूतानां पूर्वमेव त्रिविधमिति॥७॥

व्या० भा० अ० - 'कर्मजाति' (कर्म समूह) चार प्रकार की होती है। और वे जैसे कृष्णा (पाप), शुक्लकृष्णा (पापपुण्य), शुक्ला (पुण्य) अशुक्लाकृष्णा (न पुण्य न पाप)। उनमें से पापात्मक (कर्मजाति) दुरात्माओं की होती है। पाप-पुण्य (कर्मजाति) बाह्य साधनों से सम्पादित होती है। उसमें दूसरों को दुःख देकर, दूसरों पर दया करने के द्वारा ही कर्माशयों का सङ्ग्रह किया जाता है। पुण्य (कर्मजाति) तप, स्वाध्याय और ध्यान करने वालों की होती है। वह (कर्मजाति) केवल मन के आश्रित होने से, बाह्य साधनों के आधीन न होने से, दूसरों को दुःख देने से नहीं होती है। पापपुण्य रहित (कर्मजाति) संन्यासियों, क्षीणक्लेश वालों एवं चरम (अन्तिम) देह वालों की होती है। उनमें से फलसंन्यास करने से पुण्यरहित तथा पाप कर्मों को न अपनाने से पापरहित (कर्मजाति) योगियों की ही होती है। अन्य समस्त प्राणियों की पूर्वोक्त तीन प्रकार की (कर्मजाति) होती है॥७॥

Yog Prakash

चतुष्पदा खल्वियं कर्मजातिः। कृष्णा, शुक्लकृष्णा, शुक्ला शुक्लाकृष्णा चेति। तत्र कृष्णा दुरात्मनाम्। शुक्लकृष्णा बहिः साधनसाध्या तत्र परपीडानुग्रहद्वारेणैव कर्माशयप्रचयः। शुक्ला तपःस्वाध्यायध्यानवताम्। सा हि केवले मनस्यायतत्वाद्बहिः साधनानधीना न परान्पीडयित्वा भवति। अशुक्लाकृष्णा संन्यासिनां क्षीणक्लेशानां चरमदेहानामिति। तत्राशुक्लं योगिन एव फलसंन्यासात्, अकृष्णं चानुपादानात्। इतरेषां तु भूतानां पूर्वमेव त्रिविधमिति॥७॥

व्या० भा० अ० - 'कर्मजाति' (कर्म समूह) चार प्रकार की होती है। और वे जैसे कृष्णा (पाप), शुक्लकृष्णा (पापपुण्य), शुक्ला (पुण्य) अशुक्लाकृष्णा (न पुण्य न पाप)। उनमें से पापात्मक (कर्मजाति) दुरात्माओं की होती है। पाप-पुण्य (कर्मजाति) बाह्य साधनों से सम्पादित होती है। उसमें दूसरों को दुःख देकर, दूसरों पर दया करने के द्वारा ही कर्माशयों का सङ्ग्रह किया जाता है। पुण्य (कर्मजाति) तप, स्वाध्याय और ध्यान करने वालों की होती है। वह (कर्मजाति) केवल मन के आश्रित होने से, बाह्य साधनों के आधीन न होने से, दूसरों को दुःख देने से नहीं होती है। पापपुण्य रहित (कर्मजाति) संन्यासियों, क्षीणक्लेश वालों एवं चरम (अन्तिम) देह वालों की होती है। उनमें से फलसंन्यास करने से पुण्यरहित तथा पाप कर्मों को न अपनाने से पापरहित (कर्मजाति) योगियों की ही होती है। अन्य समस्त प्राणियों की पूर्वोक्त तीन प्रकार की (कर्मजाति) होती है॥७॥

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