Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/6

4/6
Sutra
तत्र ध्यानजं अनाशयं ।। ४.६ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

तत्र ध्यानजमनाशयम्॥६॥

शब्दार्थ - (तत्र) प्रथम सूत्रोक्त पाँच प्रकार के चित्तों में से (ध्यानजम्) समाधि द्वारा उत्कृष्ट बनाया गया चित्त (अनाशयम्) वासनारहित होता है।

सूत्रार्थ - जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि के द्वारा उत्कृष्ट बनाये गये चित्तों में से जो चित्त ध्यानज अर्थात् समाधि द्वारा उत्कृष्ट किया गया है, वह 'वासनारहित' होता है। 

Vyas Bhashya

पञ्चविधं निर्माणचित्तं जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धय इति। तत्र यदेव ध्यानजं चित्तं तदेवानाशयम्। तस्यैव नास्त्याशयो रागादिप्रवृत्तिः। नातः पुण्यपापाभिसंबन्धः क्षीणक्लेशत्वाद्योगिन इति। इतरेषां तु विद्यते कर्माशयः॥६॥

व्या० भा० अ० - निर्माण चित्त पाँच प्रकार का होता है। क्योंकि जन्म, औषधि, मन्त्र, तप, समाधि से (पाँच प्रकार की) सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं। उनमें से ध्यान से उत्पन्न चित्त ही (राग द्वेष मूलक) वासनाओं से रहित होता है। उसका आशय (वासनाएँ) रागादि प्रवृत्ति (व्यापार) नहीं होता। इस कारण से पाप-पुण्य का सम्बन्ध नहीं होता है। क्योंकि योगी क्षीणक्लेश होता है अर्थात् योगी के क्लेश क्षीण हो चुके होते हैं। अन्यों (अयोगियों) का तो कर्माशय होता है।। ६।।

Yog Prakash

इस सूत्र में ध्यान से सुसंस्कृत चित्त को वासनारहित बतलाया है। इसी पाद के प्रथम सूत्र - जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः के द्वारा पाँच प्रकार का निर्माण चित्त बतलाया है। जो ध्यान (समाधि) से बनाया गया (सुसंस्कृत किया) है वह चित्त वासनाओं से रहित होता है। उस चित्त में राग, द्वेष आदि प्रवृत्तियाँ नहीं होती हैं। क्योंकि क्षीण क्लेश वाला चित्त अशुभ कर्मों से रहित होता है। और जो चार प्रकार के चित्तों का निर्माण किया जाता है। उन चित्तों में राग, द्वेष आदि प्रवृत्तियाँ रहती हैं। यहाँ ध्यान से अथवा समाधि से परिष्कृत चित्त को वासना रहित बतलाया है।

'ध्यानज' का यह अर्थ नहीं है कि ध्यान चित्त का उपादान कारण है और चित्त उसका कार्य है। ध्यान द्वारा जो सुसंस्कृत किया गया है, वह ध्यान चित्त है। यदि अस्मिता उपादान कारण से चित्त की उत्पत्ति मानी जाती तो ध्यानज चित्त का उपादान कारण ध्यान को अथवा समाधि को मानना पड़ेगा, जो कि असंगत है। इसलिये पाँच प्रकार के जो चित्त कहे गये हैं वे एक ही चित्त के भिन्न भिन्न स्तर हैं। जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि आदि के द्वारा एक ही चित्त का स्तर भिन्न भिन्न हो जाता है। इसलिये योगी के द्वारा अस्मिता से बनाये गये चित्तों का सञ्चालन एक चित्त करता है। यह मान्यता ठीक नहीं है॥६॥।

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