इस सूत्र में ध्यान से सुसंस्कृत चित्त को वासनारहित बतलाया है। इसी पाद के प्रथम सूत्र - जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः के द्वारा पाँच प्रकार का निर्माण चित्त बतलाया है। जो ध्यान (समाधि) से बनाया गया (सुसंस्कृत किया) है वह चित्त वासनाओं से रहित होता है। उस चित्त में राग, द्वेष आदि प्रवृत्तियाँ नहीं होती हैं। क्योंकि क्षीण क्लेश वाला चित्त अशुभ कर्मों से रहित होता है। और जो चार प्रकार के चित्तों का निर्माण किया जाता है। उन चित्तों में राग, द्वेष आदि प्रवृत्तियाँ रहती हैं। यहाँ ध्यान से अथवा समाधि से परिष्कृत चित्त को वासना रहित बतलाया है।
'ध्यानज' का यह अर्थ नहीं है कि ध्यान चित्त का उपादान कारण है और चित्त उसका कार्य है। ध्यान द्वारा जो सुसंस्कृत किया गया है, वह ध्यान चित्त है। यदि अस्मिता उपादान कारण से चित्त की उत्पत्ति मानी जाती तो ध्यानज चित्त का उपादान कारण ध्यान को अथवा समाधि को मानना पड़ेगा, जो कि असंगत है। इसलिये पाँच प्रकार के जो चित्त कहे गये हैं वे एक ही चित्त के भिन्न भिन्न स्तर हैं। जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि आदि के द्वारा एक ही चित्त का स्तर भिन्न भिन्न हो जाता है। इसलिये योगी के द्वारा अस्मिता से बनाये गये चित्तों का सञ्चालन एक चित्त करता है। यह मान्यता ठीक नहीं है॥६॥।