इस सूत्र में यह बतलाया है कि अस्मिता = अहंकार से बने चित्त को योगी विविध स्तर का बना लेता है। सत्त्वादि तीन गुणों से महत्तत्व का निर्माण हुआ है। उससे अस्मिता = अहंकार का। अहंकार से चित्त वा मन का निर्माण हुआ है अर्थात् ईश्वर ने किया है। निर्माण चित्तानि का अर्थ 'बहुत से चित्त बना लेना', नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि चित्त अस्मिता मात्र से बना है अर्थात् उसका उपादानकारण 'अस्मिता' है। उस चित्त को योगाभ्यास से योगी विविध स्तर का बना लेता है। इसी पाद में तत्र ध्यानजमनाशयम्॥४/६।। कहा है। इसका अर्थ यह है कि ध्यान से (समाधि) से उत्पन्न चित्त वासनाओं से रहित होता है। इससे यह सिद्ध है कि उपादान-कारण से चित्त की उत्पत्ति का प्रसङ्ग नहीं है। किन्तु ज्ञान से, ध्यान से विविध प्रकार के साधनों से चित्त को संस्कृत बनाया जाता है।
इस पाद के चौथे सूत्र की अवतरणिका में कहा है कि जब योगी अनेक शरीरों की रचना करता है तो वे शरीर मनसहित होते हैं वा मनरहित। इस अवतरणिका की बात को चौथे सूत्र 'निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्' के साथ सम्बद्ध किया गया है। इसका अर्थ यह है कि योगी अस्मितामात्र से अनेक चित्तों को बना लेता है और वे सब शरीर चित्तसहित हो जाते हैं। यदि यह मान लिया जाता है कि योगी अनेक शरीरों को बनाकर उनको अपने बनाये हुये अनेक मनों से युक्त कर देता है तो यहाँ पर प्रश्न उठता है कि जब योगी अनेक शरीरों को बनाकर, उनको मनों से संयुक्त करता है, तो वे शरीर जीवात्मा के बिना जीवित कैसे रहते हैं ? यदि कोई कहे कि योगी उनको जीवित रखने के लिये स्वयं उन शरीरों में प्रवेश कर जाता है तो यह सम्भव नहीं है। समस्त शरीरों में एक योगी एक साथ प्रवेश नहीं कर सकता। क्योंकि आत्मा अणु है। इसलिए एक शरीर में रह सकता है अनेक शरीरों में नहीं। ऐसी स्थिति में वे सभी शरीर जीवित नहीं रह सकते। जब योगी अपने शरीर को छोड़कर उन अनेक शरीरों में प्रवेश करने जाएगा तो योगी का शरीर मर जायेगा। कोई कह सकता है कि योगी उन शरीरों में से आकर अपने शरीर को जीवित कर लेता है। इस विषय में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी सत्यार्थप्रकाश के चौदहवें समुल्लास में लिखते हैं कि 'भला जीवित से मृतक मृतक से जीवित हो सकता है ? ईश्वर की व्यवस्था अछेद्य अभेद्य है कभी अदल-बदल नहीं हो सकती।" शरीर की रचना के विषय में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी लिखते हैं कि "देखो ! चाहे कितना ही कोई सिद्ध हो तो भी शरीर आदि की रचना को पूर्णता से नहीं जान सकता। " -सत्यार्थप्रकाश द्वादश समुल्लास
जब शरीर की, मन की, इन्द्रियों की रचना को कोई भी कितना भी सिद्ध हो, पूर्णरूपेण जान ही नहीं सकता, तो बना भी नहीं सकता। इसलिये न तो योगी शरीर, मन, इन्द्रियों की रचना को पूर्णरूप से जान सकता है और न ही बना सकता है। इसलिये यह अनेक शरीरों को, मन, इन्द्रियों को बनाने की मान्यता व्यास ऋषि की नहीं हो सकती। इसे प्रक्षिप्त मानना ही ठीक है। यह तो सम्भव है कि योगी योगाभ्यास आदि अनेक साधनों से अपने शरीर को समय-समय पर विविध स्तर का बना लेता है। इसी का नाम शरीर निर्माण और मन का निर्माण है अर्थात् इनको उत्तम बना लेना। यह बात पूर्व लिखी गई है कि ध्यान (= समाधि) से चित्त को वासना रहित बनाना सूत्रकार ने माना है, किसी उपादानकारण से नहीं। शरीर, मन, इन्द्रियों को सुसंस्कृत करना ही निर्माण है। उपादान कारण से निर्माण करना नहीं है॥४॥