Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/34

4/34
Sutra
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं,स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिर् इति ।। ४.३४ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - गुणाधिकारक्रमसमाप्तौ कैवल्यमुक्तम्। तत्स्वरूपमवधार्यते - 

अर्थ - गुणों के अधिकार की समाप्ति होने पर 'कैवल्य' कहा गया है। उस (कैवल्य) के स्वरूप का निश्चय किया जाता है -

Word Meaning

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति॥३४॥

शब्दार्थ - (पुरुषार्थ- शून्यानाम् ) जीवात्मा के प्रयोजन से रहित हुये (गुणानाम्) सत्त्वादि कार्यरूप गुणों का (प्रति-प्रसवः) अपने कारण में लीन हो जाना (कैवल्यम्) मुक्ति है (स्वरूपप्रतिष्ठा वा) अथवा अपने स्वरूप में स्थित (चितिशक्तिः) जीवात्मा। (इति) पाद समाप्ति तथा शास्त्र समाप्ति का द्योतक है।

सूत्रार्थ - भोग और अपवर्ग प्रयोजन से रहित चित्तादि कार्यरूप गुणों का अपने कारण में लीन हो जाना, अथवा सब क्लेशों से सर्वथा छूटकर जीवात्मा का अपने तथा ईश्वर के स्वरूप को ठीक-ठीक जान कर, अपने और ईश्वर के स्वरूप में अवस्थित हो जाना, 'मोक्ष' है।

Vyas Bhashya

कृतभोगापवर्गाणां पुरुषार्थशून्यानां यः प्रतिप्रसवः कार्यकारणात्मकानां गुणानां तत्कैवल्यं, स्वरूपप्रतिष्ठा पुनर्बुद्धिसत्त्वानभिसम्बन्धात्पुरुषस्य चितिशक्तिरेव केवला, तस्याः सदा तथैवावस्थानं कैवल्यमिति॥३४॥

व्या० भा० अ० (महदादि) कार्य-कारणात्मक जिन गुणों ने (पुरुष के लिए) भोग तथा अपवर्ग को सम्पन्न किया हो और जो पुरुषार्थता से रहित हो गये हों, उनका जो अपने कारण में लीन होना है, वह 'कैवल्य' है। स्वरूप में प्रतिष्ठा, फिर से पुरुष का बुद्धिसत्त्व से सम्बन्ध न होने से केवल चितिशक्तिमात्र का रहना, उसका सदा उसी प्रकार स्थित रहना 'कैवल्य' है॥३४॥

Yog Prakash

इस सूत्र में कैवल्य का स्वरूप बतलाया है। जीवात्मा का भोग और अपवर्ग सिद्ध करके पुरुषार्थ - शून्य कार्यकारणरूप गुणों का प्रकृति में लीन हो जाना, कैवल्य है। अथवा बुद्धि आदि पदार्थों से जीवात्मा का पुनः सम्बन्ध न होना, केवल अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना, 'कैवल्य' है। जीवात्मा के भोग और अपवर्ग दो प्रयोजन हैं। सत्त्वादि तीन गुण इन दोनों प्रयोजनों को सिद्ध करने के पश्चात् पुरुषार्थशून्य हो जाते हैं। जब इन गुणों का कोई प्रयोजन नहीं रहता, तब ये अपनी प्रकृति में लीन हो जाते हैं। अर्थात् ईश्वर इनको प्रकृति में लीन कर देता है।

सृष्टि की उत्पत्ति का क्रमः - सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की साम्यावस्था 'प्रकृति' है। इन तीनों को लेकर ईश्वर महत्तत्त्व नामक पदार्थ की रचना करता है। महत्तत्त्व से अहंकार, उससे पाँच तन्मात्राओं, पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों और एक मन की रचना करता है। पाँच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पाँच स्थूल भूतों की, पाँच स्थूल भूतों से सूर्य, चन्द्र, भूमि, मनुष्य-शरीर आदि अन्य पदार्थों की रचना करता है। जीवात्मा के भोग और अपवर्ग सिद्ध हो जाने पर उसको इस सृष्टि की आवश्यकता नहीं रहती। आत्मा, मोक्ष का अधिकारी बनकर मोक्ष को प्राप्त करता है अर्थात् ईश्वर अपनी व्यवस्था के अनुसार जीवात्मा को मोक्ष प्रदान करता है। उस स्थिति में मोक्ष प्राप्त करने वाले आत्मा के साथ प्रकृति से बने जो भी शरीर चित्त आदि पदार्थ सम्बद्ध थे, वे सब प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं। स्थूलशरीर पाँच स्थूलभूतों में लीन हो जाता है। पाँच स्थूलभूत तन्मात्राओं में लीन हो जाते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्रायें और एक मन - अहंकार में लीन हो जाते हैं। अहंकार-महत्तत्त्व में, और महत्तत्त्व - प्रकृति में लीन हो जाते हैं। शेष सृष्टि अन्य आत्माओं के भोगापवर्ग की सिद्धि के लिये ज्यों की त्यों बनी रहती है। इस सृष्टि की रचना, पालन, प्रलय ईश्वर करता है। इस रचना, पालन, प्रलय को न प्रकृति कर सकती है और न जीवात्मा कर सकता है। भोगापवर्ग की सिद्धि होने पर गुणों के अपने कारण में लीन होने पर आत्मा का कैवल्य हो जाता है। अर्थात् तीन गुणों से आत्मा का सम्बन्ध टूट जाता है, आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है। इसको 'कैवल्य' बतलाया है।।

यहाँ पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि भोग एवं अपवर्ग अर्थात् (कैवल्य), प्रकृति और जीवात्मा की शक्ति से ही सिद्ध नहीं होते। किन्तु इनकी सिद्धि का मुख्य कारण ईश्वर है। यदि सृष्टि की उत्पत्ति व पालन ईश्वर न करे, तो प्रकृति और आत्मा भोगापवर्ग की सिद्धि नहीं कर सकते। केवल जीवात्मा का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना कैवल्य नहीं है। परन्तु अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होना और ईश्वर के स्वरूप में प्रतिष्ठित होना कैवल्य है। वेद में ईश्वर ने उपदेश दिया है कि "तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय"॥ यजु० ३१ - १८॥ अर्थात् ईश्वर को जानकर ही जीवात्मा मृत्यु आदि दुःखों से छूट जाता है और कोई भी मार्ग मोक्ष प्राप्ति का नहीं है। "रसो वै सः। रसं हि एव अयं लब्ध्वा आनन्दी भवति"॥ तैत्तिरीय उपनिषद् २/७। इसका अभिप्राय यह है कि ईश्वर आनन्दस्वरूप है। उसी को प्राप्त करके जीवात्मा आनन्दी हो जाता है। 

शरीर आदि साधनों से-शुद्धज्ञान, निष्काम कर्म और ईश्वरोपासना से आत्मा अपने स्वरूप को जान जाता है; और असम्प्रज्ञात समाधि से ईश्वर का साक्षात्कार करता है। ईश्वरसाक्षात्कार से अविद्या, अधर्माचरण, कुसंस्कार आदि दोष दूर हो जाते हैं। समस्त क्लेशों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति होती है। वास्तव में ईश्वरप्राप्ति ही कैवल्य है। कैवल्य या मोक्ष के विषय में यह भी जानना चाहिये कि जीवात्मा का कैवल्य अनन्तकाल के लिये नहीं होता। मोक्ष काल की एक अवधि है। उतने ही काल पर्यन्त आत्मा मोक्ष में रहता है और उसको मोक्ष की अवधि के समाप्त होने पर पाप-पुण्य तुल्य रहने से ईश्वर की व्यवस्था से साधारण मनुष्य का जन्म मिलता है। छत्तीस सहस्र बार सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय में जितना समय लगता है, उतना ही समय मोक्ष की अवधि है। एक बार सृष्टि का समय ४ अरब ३२ करोड़ वर्ष है और इतना ही समय (४ अरब ३२ करोड वर्ष) एक बार की प्रलय का है इस प्रकार से दोनों को मिलाकर ८ अरब ६४ करोड़ वर्ष का समयएक बार की सृष्टि और प्रलय का है। इसे ३६ सहस्र से गुणा करने पर मोक्ष का सम्पूर्ण समय ३१ नील, १० खरब और ४० अरब वर्ष बनता है। (संदर्भ = सत्यार्थ प्रकाश नवम समुल्लास )॥३४॥

 

Footnote

॥इति चतुर्थः कैवल्यपादः॥

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