Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/33

4/33
Sutra
क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः ।। ४.३३ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - अथ कोऽयं क्रमो नामेति ?

अर्थ - अब यह 'क्रम' नामक (वस्तु) क्या है ?

Word Meaning

क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः॥३३॥

शब्दार्थ - (क्षण-प्रतियोगी) क्षणों के समूह पर आश्रित तथा (परिणाम-अपरान्त-निर्ग्राह्यः) परिणाम की समाप्ति पर ज्ञात होने वाला (क्रमः) क्रम है। 

सूत्रार्थ - क्षणों के पौर्वापर्य स्वरूप वाला अर्थात् जिसमें एक क्षण के पश्चात् परवर्ती क्षण उपस्थित होते हैं तथा परिणाम की समाप्ति पर जो ज्ञात होता है, वह 'क्रम' है। 

Vyas Bhashya

क्षणानन्तर्यात्मा परिणामस्यापरान्तेनावसानेन गृह्यते क्रमः। न ह्यननुभूतक्रमक्षणा-नवस्य पुराणता वस्त्रस्यान्ते भवति। नित्येषु च क्रमो दृष्टः।

द्वी चेयं नित्यता- कूटस्थनित्यता परिणामिनित्यता च। तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य। परिणामिनित्यता गुणानाम्। यस्मिन्परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम्। उभयस्य च तत्त्वानभिघातान्नित्यत्वम्। तत्र गुणधर्मेषु बुद्ध्यादिषु परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमो लब्धपर्यवसानो, नित्येषु धर्मिषु गुणेष्वलब्धपर्यवसानः। कूटस्थनित्येषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु मुक्तपुरुषेषु स्वरूपास्तिता क्रमेणैवानुभूयत इति तत्राप्यलब्धपर्यवसानः शब्दपृष्ठेनास्तिक्रियामुपादाय कल्पित इति।

अथास्य संसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वर्तमानस्यास्ति क्रमसमाप्तिर्न वेति ? अवचनीयमेतत्। कथम् ? अस्ति प्रश्न एकान्तवचनीयः - सर्वो जातो मरिष्यति इति ? ओम् भ इति।

अथ सर्वो मृत्वा जनिष्यत इति ? विभज्यवचनीयमेतत्। प्रत्युदितख्यातिः क्षीणतृष्णः कुशलो न जनिष्यत इतरस्तु जनिष्यते। तथा मनुष्यजातिः श्रेयसी न वा श्रेयसीत्येवं परिपृष्टे विभज्यवचनीयः प्रश्नः, पशूनधिकृत्य श्रेयसी देवानृषींश्चाधिकृत्य नेति। अयं त्ववचनीयः प्रश्नः - संसारोऽयमन्तवानथानन्त इति। कुशलस्यास्ति संसारक्रमपरिसमाप्तिर्नेतरस्येत्यन्यतरावधारणेऽदोषः। तस्माद्वयाकरणीय एवायं प्रश्न इति॥३३॥

व्या० भा० अ० - क्षण के पश्चात् उपस्थित होने वाला परिणाम की समाप्ति रूपी अवसान से गृहीत होता है (वह) 'क्रम' है। नये वस्त्र के अन्त में जो पुरानापन है, वह क्रम के आश्रित क्षणों का अनुभव किए बिना नहीं होता है। और नित्य पदार्थों में 'क्रम' देखा जाता है।

यह नित्यता दो प्रकार की होती है। (एक) कूटस्थ नित्यता और (दूसरी) परिणामी नित्यता। उन दोनों में से कूटस्थ नित्यता पुरुष की होती है, गुणों की परिणामी नित्यता होती है। जिसके परिणत होने पर (मूल) तत्त्व नष्ट नहीं होता, वह नित्य (पदार्थ) होता है। और स्वरूप के नष्ट न होने से (गुण एवं पुरुष) दोनों नित्य हैं। उन दोनों में से गुणों के धर्मभूत बुद्धयादि पदार्थों में परिणाम की समाप्ति से ज्ञायमान जो क्रम है उसका पर्यवसान लब्ध होता है (अर्थात् बुद्धयादि धर्मों में क्रम अवसान को प्राप्त होता है)। नित्यस्वरूप जो धर्मी गुण सत्त्वादि हैं, उनमें क्रम अवसान को प्राप्त नहीं होता है। कूटस्थ नित्य, स्वरूप में अवस्थित मुक्त पुरुषों में स्वरूप का अस्तित्व, क्रम के द्वारा अनुभूत होता है। इसलिए उनमें भी (क्रम का) पर्यवसान (समाप्ति) उपलब्ध नहीं होता है। ( वहाँ ऐसा क्रम) शब्द के आधार पर 'अस्ति' क्रिया को लेकर कल्पित किया गया है (वास्तव में क्रम नहीं है)।

इसके अनन्तर प्रश्न उपस्थित होता है कि सत्त्व आदि गुणों में, स्थिति एवं गति रूप से विद्यमान इस संसार की क्रम समाप्ति है वा नहीं ? यह (एक शब्द में) उत्तर देने योग्य (प्रश्न) नहीं है। कोई प्रश्न एक शब्द में उत्तर देने योग्य होता है, जैसे कि (क्या) जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी मरेगा ? (इसका उत्तर है) कि 'हाँ' (मरेगा)।

क्या प्रत्येक मृत प्राणी जन्मेगा ? (यह दूसरे प्रकार का प्रश्न है जिसका उत्तर दो भागों में विभाग करके दिये जाने योग्य है कि - विवेकख्याति को प्राप्त, नष्ट हो चुकी तृष्णावाला, कुशल नहीं जन्मेगा, अन्य (प्राणी) तो जन्मेगा। उसी प्रकार मनुष्य जाति श्रेष्ठ है वा नहीं ? ऐसा पूछे जाने पर यह प्रश्न विभाग करके ही समाधान करने योग्य है। (जैसे कि) पशुओं की तुलना में श्रेष्ठ है, देवों एवं ऋषियों की तुलना में (श्रेष्ठ) नहीं है। यह संसार अन्त वाला है अथवा अनन्त ? यह प्रश्न भी (एक शब्द में) समाधान करने योग्य नहीं है। ( इसका उत्तर) कुशल (योगी) के संसार क्रम की समाप्ति होती है, (कुशल से) अन्य की नहीं होती है। (ऐकान्तिक रूप से) निश्चय करने पर दोष होगा। इसलिए यह प्रश्न विभागपूर्वक उत्तर देने योग्य ही है॥३३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में क्रम का स्वरूप बतलाया है। व्यासभाष्यानुसार सबसे अल्पकाल को 'क्षण' कहते हैं। क्षणान्तर्यात्मा - क्षणों की अनन्तरता, एक के पश्चात् परवर्ती क्षणों का उपस्थित होते रहना ही स्वरूप है जिसका, परिणाम के अन्तिम भाग से परिज्ञात होने वाला 'क्रम' है। क्रमाश्रित क्षणों का अनुभव न करने वाला पुरानापन नये वस्त्र में दिखाई नहीं दे सकता अर्थात् नवीन वस्त्र पुराना नहीं हो सकता। नित्य पदार्थों में भी क्रम होता है। जिन पदार्थों का अस्तित्व बना रहता है, उनमें भी क्रम होता है।

नित्यता दो प्रकार की है। कूटस्थ नित्यता और परिणामी नित्यता। कूटस्थ नित्यता, जीवात्मा और परमात्मा की है। परिणामी नित्यता, सत्त्वादि तीन गुणों की है। विविध परिणाम होने पर भी मूल तत्त्व का विद्यमान रहना, अर्थात् मूल तत्त्व का अभाव न होना, परिणामी नित्यता है। जैसे सोने के विविध आभूषण बनाने पर भी मूल पदार्थ = सोना ज्यों का त्यों बना रहता है। यह परिणामी नित्यता है। और किसी भी परिणाम - परिवर्तन का न होना, अपरिणामी नित्यता है। जैसे जीवात्मा और परमात्मा की। सत्त्वादि गुणों के धर्म रूप बुद्धि आदि पदार्थों में परिणाम के अन्तिम भाग से निश्चय करने योग्य = जानने योग्य क्रम की समाप्ति उपलब्ध हो जाती है। नित्य धर्मी = सत्त्वादि तीन गुणों में क्रम की समाप्ति उपलब्ध नहीं होती। अर्थात् बुद्धि, अहंकार, तन्मात्रा आदि में तो समाप्ति वाला क्रम होता है। क्योंकि बुद्धि आदि पदार्थ नाशवान हैं। इनके नाश के पश्चात् क्रम भी समाप्त हो जाता है। सत्त्वादि तीन गुण नित्य हैं, उनमें समाप्त न होने वाला क्रम होता है। जीवात्मा में और परमात्मा में क्रम कल्पित किया जाता है, वास्तव में होता नहीं। 

क्रम के प्रसङ्ग में प्रश्न उठता है कि सत्त्वादि गुणों में स्थिति और गति रूप से विद्यमान इस संसार के क्रम की परिसमाप्ति होती है वा नहीं ? अर्थात् यह संसार कभी समाप्त होता है अथवा नहीं। यह विभज्यवचनीय प्रश्न है, अर्थात् एक शब्द में उत्तर देने योग्य नहीं है। कैसे ? इस बात को समझने के लिए प्रथम इसका एक विपरीत उदाहरण समझ लेवें। जैसे कि एक प्रश्न एकान्त-वचनीय है, अर्थात् जिसका उत्तर एक ही शब्द में दिया जा सके, वह एकान्तवचनीय प्रश्न है। जैसे उत्पन्न होने वाले सभी मरेंगे वा नहीं ? इसका उत्तर है कि हाँ, ( उत्पन्न होने वाले सभी मरेंगे)। अब उस प्रश्न को लीजिये जो अवचनीय (विभज्यवचनीय) है, जैसे कि इस संसार के क्रम की समाप्ति है वा नहीं ? इसका उत्तर यह है कि कुशल व्यक्ति के संसारक्रम की परिसमाप्ति है। जो व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन गया है उसके संसार क्रम की समाप्ति होती है अर्थात् उसका जन्म-मरण का क्रम समाप्त हो जाता है और जो आत्मा मोक्ष के अधिकारी नहीं बने हैं उनका जन्म-मरण का क्रम चलता रहता है। यहाँ पर यह जानना चाहिये कि मोक्ष के अधिकारी आत्माओं का जन्म-मरण, मोक्ष की अवधि तक समाप्त होता है, अनन्तकाल तक नहीं। 

क्रम को सरलता से जानने का उपाय एक = प्रत्यक्ष और दूसरा = अनुमान है। जैसे-मिट्टी से पिण्ड बना, पिण्ड से घड़ा बना, घड़े से कपाल-ठीकरे बने, उनसे चूर्ण बना। यहाँ पर मिट्टी से पिण्ड, उससे घड़ा, उससे कपाल बने, यह क्रम है अर्थात् एक के पश्चात् दूसरे का बनना क्रम है। यह क्रम प्रत्यक्षरूप से देखा जाता है। क्रम को जानने का दूसरा उपाय अनुमान है। जैसे - किसी वस्त्र की उत्पत्ति होने पर वह नवीन दिखाई देता है। परन्तु धीरे धीरे वह पुराना होता रहता है। क्षण क्षण में उसमें पुरानापन आता है। वह पुराना होता हुआ दिखाई नहीं देता। किन्तु पुराना होते होते वह लम्बे काल में इतना पुराना हो जाता है कि उसको हाथ से पकड़ कर उठाने पर खण्ड - खण्ड हो जाता है। यह क्रम अनुमान से जाना जाता है॥३३॥

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