Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/31

4/31
Sutra
तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयं अल्पं ।। ४.३१ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्॥३१॥

शब्दार्थ - (तदा) क्लेशों तथा सकाम शुभ एवं अशुभ कर्मों के दूर हो जाने पर (सर्वआवरण-मल-अपेतस्य) [ज्ञान को ढकने वाले] सब प्रकार के अज्ञानरूपी मल से रहित (ज्ञानस्य) शुद्ध ज्ञान के (आनन्त्यात्) अधिक हो जाने से (ज्ञेयम्) जानने योग्य विषय (अल्पम्) थोड़ा रह जाता है।  

सूत्रार्थ - 'धर्ममेघ समाधि' के सिद्ध होने के उपरान्त अविद्यादि क्लेशों तथा सकाम शुभ एवं अशुभकर्मों के दूर हो जाने पर ज्ञान को ढकने वाले सब प्रकार के अज्ञानरूपी मल से रहित = शुद्धज्ञान के अधिक हो जाने से जानने योग्य विषय थोड़े ही रह जाते हैं।

Vyas Bhashya

सर्वैः क्लेशकर्मावरणैर्विमुक्तस्य ज्ञानस्यानन्त्यं भवति। आवरकेण तमसाभिभूतमावृतमनन्तं ज्ञानसत्त्वं क्वचिदेव रजसा प्रवर्तितमुद्घाटितं ग्रहणसमर्थं भवति। तत्र यदा सर्वैरावरणमलैरपगतं भवति तदा भवत्यस्यानन्त्यम्। ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पं संपद्यते; यथा-आकाशे खद्योतः। यत्रेदमुक्तम् -अन्धो मणिमविध्यत्तमनङ्गुलिरावयत्। अग्रीवस्तं प्रत्यमुञ्चत्तमजिह्वोऽभ्यपूजयत्॥ इति॥३१॥

व्या० भा० अ० - समस्त क्लेश कर्मावरणों से विमुक्त (योगी) के ज्ञान की अनन्तता होती है (अर्थात् ज्ञान इतना होता है कि अज्ञान प्राप्ति का अवकाश ही नहीं होता)। आच्छादित करने वाले तमोगुण से अभिभूत (आच्छादित) ज्ञानसत्त्व = (ज्ञान), रजोगुण के द्वारा कहीं (एकदेश में) प्रवर्तित (= प्रभावित) (वा आवरण के) उद्घाटित होने पर (ज्ञेय के ज्ञान को) ग्रहण करने में समर्थ होता है। ऐसी स्थिति में जब (ज्ञान) समस्त आवरण मलों से रहित एवं निर्मल हो जाता है तब उसकी अनन्तता होती है। ज्ञान की अनन्तता से ज्ञेय अल्प हो जाता है; जैसे कि (अनन्त) आकाश में (अणु परिमाण) जुगनू।

जिसके विषय में कहा गया है कि (उस योगी का शरीरपात के अनन्तर जन्म लेना ऐसा ही असम्भव है जैसे कि) अन्धे का मणि को बींधना, उसका (मणि का) अंगुली विहीन (व्यक्ति) के द्वारा (माला में) पिरोया जाना, ग्रीवाहीन के द्वारा उसका (माला का) धारण किया जाना और उसकी जिह्वारहित (व्यक्ति) के द्वारा प्रशंसा किया जाना॥३१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि तब समस्त आवरण और मलों के दूर होने से ज्ञान की अधिकता के कारण ज्ञेय पदार्थ अल्प रह जाता है। 

अष्टाङ्ग योग के अनुष्ठान से, ईश्वर प्रणिधान से और मोक्षशास्त्रों के अध्ययन से अविद्या, अधर्म आदि मलों के दूर हो जाने से ज्ञान की अधिकता के कारण जानने योग्य पदार्थ अल्प रह जाता है, अर्थात् ईश्वर को जानने का कार्य थोड़ा ही शेष रहता है। ज्ञान की अनन्तता का यह अभिप्राय नहीं है कि जीव का ज्ञान ईश्वर की भाँति अनन्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि ज्ञान की मात्रा अधिक हो जाती है। उसके अधिक होने से आत्मा के लिये जो जानने योग्य पदार्थ हैं, वे अल्प रह जाते हैं। अर्थात् मोक्षप्राप्ति के लिये जितने पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है, उनमें से कुछ ही पदार्थ शेष रह जाते हैं ।

ज्ञान की अधिकता के अनेक कारण हैं। उनमें से कुछ नीचे लिखे जाते हैं –

(१) अविद्या के नाश से ज्ञान की वृद्धि होती है। 

(२) कुसंस्कारों के नाश से ज्ञान की वृद्धि होती है। 

(३) अधर्माचरण के त्याग से ज्ञान की वृद्धि होती है। 

(४) मोक्षशास्त्रों के अध्ययन से ज्ञान की वृद्धि होती है। 

(५) सत्त्वगुण की प्रधानता से ज्ञान की वृद्धि होती है। 

(६) ईश्वरप्रदत्त ज्ञान से ज्ञान की वृद्धि होती है।

यहाँ एक बात का ध्यान रखना चाहिए। जब योगाभ्यास आदि कारणों से योगी का ज्ञान प्रवृद्धि को प्राप्त होता है, तब योगी को अत्यन्त सावधान रहना पड़ता है। उस ज्ञान की अधिकता के कारण योगी के मन में अभिमान उत्पन्न होने की सम्भावना होती है। यदि ऐसी स्थिति में योगी ईश्वरप्रणिधान को सतत बनाये रखता है तो अभिमान नहीं होता। अन्यथा अभिमान से बचना कठिन है। इसलिये योगाभ्यासियों को सदा ईश्वरप्रणिधान की स्थिति में रहने का सतत अभ्यास करते रहना चाहिये। इससे स्व-स्वामी सम्बन्ध उत्पन्न नहीं होता और स्वस्वामी सम्बन्ध के न होने से अभिमान भी उत्पन्न नहीं होता॥३१॥

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