Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/30

4/30
Sutra
ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः ।। ४.३० ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥३०॥

शब्दार्थ- (ततः) उस धर्ममेघ समाधि से (क्लेश-कर्म-निवृत्ति:) अविद्यादि क्लेश तथा सकाम शुभ-अशुभ कर्म दूर हो जाते हैं।

सूत्रार्थ - उस धर्ममेघ समाधि के सिद्ध हो जाने पर अविद्या आदि क्लेश तथा सकाम शुभ एवं अशुभ कर्म दूर हो जाते हैं। 

Vyas Bhashya

तल्लाभादविद्यादयः क्लेशाः समूलकाषं कषिता भवन्ति। कुशलाकुशलाश्च कर्माशयाः समूलघातं हता भवन्ति। क्लेशकर्मनिवृत्तौ जीवन्नेव विद्वान् विमुक्तो भवति। कस्मात् ? यस्माद्विपर्ययो भवस्य कारणम्। न हि क्षीणविपर्ययः कश्चित् केनचित् क्वचिज्जातो दृश्यत इति॥३०॥

व्या० भा० अ० - उस (धर्ममेघसमाधि) के लाभ से अविद्या आदि क्लेश समूल नष्ट हो जाते है (भावी) पुण्यापुण्य कर्माशय समूल नष्ट हो जाते हैं। क्लेश और कर्माशयों की निवृत्ति होने पर जीवनकाल में ही योगी विमुक्त हो जाता है। किसलिए ? क्योंकि 'अविद्या' ही 'जन्म का कारण' है। नष्ट हुई अविद्या वाला कोई (व्यक्ति) किसी के द्वारा और कहीं (भी) उत्पन्न हुआ देखा नहीं जाता है।। ३०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह कहा है कि धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होने पर अविद्या आदिपाँच क्लेशों की तथा शुभ-अशुभ और मिश्रित सभी सकाम कर्मों की निवृत्ति हो जाती है। धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होने पर अविद्या आदि पाँच क्लेशों की निवृत्ति हो जाती है। सकाम कर्म अर्थात् शुभ कर्म, अशुभ कर्म और शुभाशुभ = मिश्रित कर्मों की लगभग समाप्ति हो जाती है। इस अवस्था में योगी निष्काम कर्म करता है। शुद्ध ज्ञान, शुद्ध = कर्म निष्काम कर्म और शुद्धोपासना से मोक्ष का अधिकारी बन कर जीवन काल में ही योगी मुक्त हो जाता है और ऐसे जीवात्मा का अगला जन्म नहीं होता है, जैसा कि महर्षि गौतम जी ने न्यायदर्शन में कहा हैं "वीतरागजन्मादर्शनात् "॥३ / २ / २५॥अविद्या, अधर्माचरण, सकाम कर्म और अशुद्धोपासना बन्धन के कारण है। 

इस सूत्र के व्यासभाष्य के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि धर्ममेघ समाधि से ही समस्त क्लेश नितान्त समाप्त हो जाते हैं और यह असम्प्रज्ञात समाधि है। वास्तव में न तो धर्ममेघ समाधि सेक्लेशों की नितान्त परिसमाप्ति होती है और न ही यह असम्प्रज्ञात समाधि है। क्योंकि धर्ममेघ समाधि अवस्था में विवेकख्याति कारण मानी है "...... सर्वथाविवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः"॥ योगदर्शन ४/२९।। सूत्रकार ने यहाँ सर्वथा विवेकख्याति से धर्ममेघ समाधि विद्यमान रहती है, ऐसा माना है।

भाष्यकार ने विवेकख्याति को सत्त्वगुण का ही धर्म माना है। योगदर्शन १/२ के भाष्य में यह कहा है कि विवेकख्याति से चित्त विरक्त होकर उसको भी रोक देता है। तत्परं पुरुष...॥यो० १/१६।। इस सूत्र में यह कहा है कि पुरुष का वास्तविक स्वरूप परिज्ञात होने पर सत्त्व आदि तीनों गुणों से वैराग्य हो जाता है। प्रस्तुत सूत्र में वर्णित धर्ममेघ समाधि सम्प्रज्ञात समाधि की ऊँची अवस्था है और विवेकख्याति यहाँ पर विद्यमान है। इस विवेकख्याति से भी परवैराग्य उत्पन्न होता है। क्योंकि योगी विवेकख्याति में भी दोष देखता है। विवेकख्याति सत्त्वगुण का धर्म बतलाया है। जहाँ पर सत्त्वगुण रहेगा, वहाँ पर गौणरूप से रजोगुण और तमोगुण भी रहेंगे। रजोगुण, तमोगुण की उपस्थिति में अविद्यादि समस्त क्लेशों का नितान्त अभाव नहीं हो सकता। इसलिये धर्ममेघसमाधि में क्लेशों का पर्याप्त विनाश हो जाता है। परन्तु योगदर्शन और व्यासभाष्य के आधार पर सूक्ष्म क्लेश बने रहते हैं। पहले लिख दिया है कि जहां पर सत्त्वगुण रहेगा, वहाँ पर क्लेश भी सूक्ष्मरूप में रहेंगे। क्योंकि सत्त्वगुण के साथ रजोगुण और तमोगुण भी रहेंगे। विवेकख्याति को हानोपाय कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि अविप्लव विवेकख्याति परम्परा से मोक्ष का उपाय है, साक्षात् नहीं। इसी प्रकार से धर्ममेघसमाधि परम्परा से मोक्ष का उपाय है, साक्षात् नहीं। इससे यह सिद्ध होता है कि 'धर्ममेघ समाधि' असम्प्रज्ञात समाधि नहीं है और न ही इससे क्लेशों का नितान्त विनाश होता है॥३०॥

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