इस सूत्र में यह बतलाया है कि जात्यन्तर परिणाम = अवस्थान्तर हो जाने में धर्माचरण शरीर की प्रकृति (उपादान कारण) को प्रेरित नहीं करता। किन्तु अधर्म (बाधक) को दूर करता है।
शरीर और इन्द्रियों में जो दोष उत्पन्न हो जाते हैं उन दोषों को धर्माचरण से दूर कर दिया जाता है। उनके दूर हो जाने पर शरीर का जो उपादान कारण पृथिवी आदि पाँच भूत हैं और भोजन आदि जिनसे शरीर का निर्माण होता है वे स्वयं शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। खेती करने वाला व्यक्ति जब अपने खेत में पानी देता है तो एक क्यारी के भरने के पश्चात् दूसरी क्यारी में अपने हाथ से पानी नहीं सींचता। किन्तु दो क्यारियों के मध्य में जो बाँध = मेड़ है उसको दूर कर देता है। उस बाधक के दूर होने पर पानी स्वयं दूसरी क्यारी में चला जाता है।
इसी प्रकार से दूसरा उदाहरण - खेती करने वाला व्यक्ति अपने खेत में से विविध प्रकार के घास, झाड़ आदि जो अन्न को बढ़ने, फूलने - फलने नहीं देते उनको निकाल देता है। इस स्थिति में जल एवं भूमि के रस धान के पौधों में स्वयं प्रवेश कर जाते हैं। इसी प्रकार योगी धर्माचरण से अधर्म को दूर कर देता है तो उसके शरीर के अन्दर उत्तम पदार्थों का समावेश हो जाता है। यदि योगी शरीर और इन्द्रियों के उपादान कारण पाँच स्थूल भूत और अस्मिता को लेकर नये शरीर और इन्द्रियों को स्वयं बना लेता तो यह खेत का उदाहरण देना व्यर्थ हो जाता। क्योंकि जैसे खेती करने वाला अपने खेत में से घास आदि को निकाल देता है, परन्तु खेत में धान के मूल में जल को व भूमि के रस को वह पकड़कर प्रवेश नहीं करा सकता। इसी प्रकार योगी शरीर के दोषों को दूर कर सकता है और शरीर को उत्तम बना सकता है। परन्तु मनुष्य के शरीर इन्द्रिय एवं मन से पशु आदि के शरीर, इन्द्रिय एवं मन को नहीं बना सकता इसलिये यही बात संगत प्रतीत होती है कि योगी उत्तम - साधनों से और अपने उत्तम-ज्ञान से शरीर और इन्द्रियों में विशेषता उत्पन्न कर देता है। नये शरीर और इन्द्रियों को नहीं बना सकता॥३॥