इस सूत्र में यह कहा है कि विवेकख्याति में प्राप्त सिद्धियों से भी विरक्त योगी की सर्वथा- विवेकख्याति से 'धर्ममेघ समाधि' होती है।
योगाभ्यास करते करते योगी सम्प्रज्ञात समाधि की ऊँची अवस्था में पहुँच जाता है। इस अवस्था में विवेकख्याति विप्लव को प्राप्त नहीं होती। किन्तु अविप्लव की स्थिति में रहती है। इस विवेकख्याति में भी योगी का राग नहीं रहता। क्योंकि ये विवेकख्याति भी सत्त्वगुण का धर्म माना जाता है। योगदर्शन-१।१६ “तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्" सूत्र में यह कहा है कि पुरुष का अपना विशुद्ध स्वरूप परिज्ञात होने से सत्त्वगुण से भी वैराग्य हो जाता है। यह परवैराग्य विवेकख्याति में दोष देखने से होता है। प्रथम पाद के द्वितीय सूत्र के भाष्य में कहा है कि उस विवेकख्याति में भी विरक्त चित्त, उसको भी रोक देता है। सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति बतलाई है और उस सत्त्वपुरुषान्यताख्याति अर्थात् विवेकख्याति में विरक्त चित्त उसको भी रोक देता। इस स्थिति में विवेकख्याति से परवैराग्य उत्पन्न होता है। उससे असम्प्रज्ञात समाधि होती है। असम्प्रज्ञात समाधि से ईश्वरसाक्षात्कार और उससे अवशिष्ट समस्त क्लेशों की निवृत्ति और आनन्द की प्राप्ति होती है।
यहाँ पर यह बात स्पष्ट हो गई कि 'धर्ममेघ समाधि' असम्प्रज्ञात समाधि नहीं है। किन्तु वह सम्प्रज्ञात समाधि की ऊँची अवस्था है। विवेकख्याति के सतत बने रहने से धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति मानी है। विवेकख्याति से परवैराग्य होने पर असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि होती है। विवेकख्याति के होने पर धर्ममेघ समाधि होती है। और विवेकख्याति का अभाव होने पर = (उससे विरक्त होकर उसे छोड़ देने पर) असम्प्रज्ञात समाधि होती है। अतः धर्ममेघ समाधि, असम्प्रज्ञात समाधि नहीं है॥२९॥