इस सूत्र में यह कहा है कि विवेकयुक्त चित्त के सांसारिक भोगों के संस्कारों के कारण मध्य मध्य में विवेकज्ञान के विरुद्ध विषयभोग से सम्बद्ध ज्ञानों की उत्पत्ति होती है। अनेक जन्मों से आत्मा सांसारिक भोगों को भोगता आया है। उन भोगों के संस्कार अत्यन्त दृढ़ हो जाने पर उनको अल्प ज्ञान वैराग्य से दूर करना कठिन है। परन्तु असम्भव नहीं है। जब योगाभ्यासी थोड़ा सा भी असावधान हो जाता है तो विवेक, वैराग्य की स्थिति में शैथिल्य आ जाता है। ऐसी स्थिति में भोगों से उत्पन्न संस्कारों से सांसारिक भोगों की ओर ले जाने वाले ज्ञान उत्पन्न होते हैं। सांसारिक अवस्था में व्यक्ति 'मैं' और 'मेरा' इस सम्बन्ध को अत्यन्त दृढ़ बना लेता है। वह यह मानता है कि ये संसार के पदार्थ मेरे हैं और मैं इनका स्वामी हूँ। ये सदा मेरे साथ
रहेंगे। ऐसी मान्यता से बने संस्कार विवेक, वैराग्य के कुछ शिथिल होते ही उभर आते हैं और उन संस्कारों से यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ये पदार्थ मेरे हैं। मैं इनका स्वामी हूँ। इस प्रकार के जो ज्ञान उत्पन्न होते हैं, उनका नाम 'प्रत्ययान्तराणि' है।
योगाभ्यास करते-करते इन सांसारिक संस्कारों को प्रथम निर्बल करके पुन: दग्धबीजभाव अवस्था में पहुँचा दिया जाता है। इस स्थिति के पश्चात् योग के विरोधी ज्ञान उत्पन्न नहीं होते। इस विषय में यह जानना चाहिये कि शुभ वा अशुभ संस्कारों को उत्पन्न भी किया जा सकता है और समाप्त भी किया जा सकता है। इसलिये शुभ संस्कारों को उत्पन्न करने का और अशुभ संस्कारों को नष्ट करने का प्रयत्न करते रहना चाहिये॥२७॥