Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/26

4/26
Sutra
तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तं ।। ४.२६ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥२६॥

शब्दार्थ - (तदा) विवेकज्ञान के होने पर (विवेकनिम्नम्) विवेकमार्ग की ओर चलने वाला (कैवल्य-प्राग्भारम्) मोक्ष प्राप्त कराने के सामर्थ्य से युक्त (चित्तम्) चित्त हो जाता है। 

सूत्रार्थ - विवेकख्याति प्राप्त होने पर अर्थात् बुद्धि और जीवात्मा के भेद का ज्ञान होने पर चित्त विवेकमार्ग की ओर चलने वाला तथा मोक्ष प्राप्त कराने के सामर्थ्य से युक्त हो जाता है।

Vyas Bhashya

तदानीं यदस्य चित्तं विषयप्राग्भारमज्ञाननिम्नमासीत्, तदस्यान्यथा भवति कैवल्यप्राग्भारं विवेक ज्ञाननिम्नमिति॥२६॥

व्या० भा० अ० - तब योगी का चित्त पहले जो विषयाभिमुख अज्ञान मार्ग का अनुसरण करने वाला था, उसका वह (चित्त) अन्य प्रकार का अर्थात् कैवल्याभिमुख = विवेक मार्ग का अनुसरण करने वाला होता है॥२६॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि विशेष ज्ञानी का चित्त, विवेक की ओर झुक जाता है और मोक्ष प्राप्ति के सामर्थ्य से परिपूर्ण हो जाता है।

विवेकज्ञान की उत्पत्ति के पूर्व साधक का चित्त सांसारिक विषय भोगों में झुका हुआ होता है। और भोगों की प्राप्ति करवाने के सामर्थ्य से परिपूर्ण होता है। विशेषज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात् साधक का चित्त विवेक की ओर झुक जाता है। विवेक से पूर्व चित्त भोगों की ओर अग्रसर रहता है, विवेक होने पर समाधि की ओर अग्रसर रहने लगता है। जिस प्रकार ऊँची भूमि होने पर जल नीची भूमि की ओर बहता है, उस ओर से बाँध बाँधकर रोक दिया जाय और दूसरी ओर से बाँध को हटा दिया जाय तो जल वहाँ से हटकर दूसरे निम्नस्थल की ओर बहने लगता है। इसी प्रकार से जब विवेक, वैराग्य के माध्यम से साधक चित्त को भोगों से रोक देता है तो उस अवस्था में चित्त विवेक की ओर विचरने लगता है। जब विवेक की उत्पत्ति नहीं होती है तब चित्त में भोग भुगाने का सामर्थ्य भरा हुआ होता है। इसी का नाम 'विषय प्राग्भार' है। 

जब योगाभ्यासी विवेक-वैराग्य के द्वारा चित्त को विशुद्ध बना लेता है, तब वह 'कैवल्य प्राग्भार' हो जाता है अर्थात् मोक्षप्राप्ति के सामर्थ्य से परिपूर्ण हो जाता है। ऐसी स्थिति में चित्त को अधिकार में रखना सरल हो जाता है। यदि योगाभ्यासी विवेक वैराग्य की सुरक्षा के लिये उचित प्रयास करना छोड़ देता है तो जो अवस्था विवेकज्ञान से पूर्व होती है, वही सांसारिक स्थिति फिर उत्पन्न हो सकती है। इसलिये विवेक, वैराग्य की उत्पत्ति के लिये उचित प्रयत्न करना चाहिये और विवेक, वैराग्य की सुरक्षा के लिये भी पूर्ण प्रयत्न करते रहना चाहिये।। २६।।

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