इस सूत्र में यह बतलाया है कि विशेषज्ञ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, चित्त आदि पदार्थों के स्वरूप को और आत्मा, परमात्मा के स्वरूप को विशुद्ध रूप से जानने वाले योगी की 'आत्मभावभावना' समाप्त हो जाती है।
'आत्मभावभावना का स्वरूप' जानना आवश्यक है। उसको ऐसे जानना चाहिए कि- मैं भूतकाल में कौन था ? किस प्रकार से था ? यह शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि क्या हैं ? किस प्रकार से हैं ? हम सभी आगे आने वाले समय में क्या होंगे ? कैसे होंगे ? यह आत्मभावभावना है। यह आत्मभावभावना विशेषज्ञ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, चित्त आदि जड़ पदार्थों और आत्मा, परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति की निवृत्त हो जाती है।
'आत्मभावभावना' को समझाने के लिये एक दृष्टान्त दिया है कि - मोक्ष मार्ग का उपदेश सुनने से जिस व्यक्ति के रोमाञ्च और अश्रुपात दिखाई देते हैं उस व्यक्ति ने पूर्वजन्मों में मोक्षशास्त्रों को पढ़ा-पढ़ाया है। योग के आठ अङ्गों का अनुष्ठान किया है। सत्पुरुषों के संग से मोक्ष विद्या को सुना है। इससे अनुमान होता है कि इस व्यक्ति में मोक्षप्राप्ति करने के बीज हैं। जिस व्यक्ति के जीवन में आत्मभावभावना नहीं होती, उस व्यक्ति की रुचि मोक्षमार्ग में नहीं होती। किन्तु उसकी रुचि केवल विषय भोगों में रत रहने की होती है। ऐसा भोगवादी व्यक्ति कहता है कि अगलेपिछले जन्म को किसने देखा है। आत्मा, परमात्मा को कोई भी नहीं जानता। न कोई बन्धन है और न कोई मोक्ष है, खाओ - पीओ, मौज करो। आत्मा-परमात्मा, धर्माधर्म, मोक्ष की बातों को छोड़ दो। इन भोगमार्ग वालों का जीवन कैसा होता है, उपनिषत्कार ने उसको स्पष्ट किया है -
अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयन्धीराः पण्डितम्मन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥कठोपनिषद् २/५॥
भावार्थ - अविद्यायाम् - अविद्या में, प्रेय मार्ग में; अन्तरे - बीच में; वर्त्तमानाः - उपस्थित, पड़े हुए; स्वयम् - अपने आप ही; धीराः - ज्ञानी; पण्डितम्मन्यमानाः - अपने आप को पण्डित (चतुर, ज्ञानी) समझने वाले; दन्द्रम्यमाणाः - टेढ़े मार्ग पर चलते हुए; परियन्ति - भटकते हैं; मूढाः - मोहग्रस्त, मूर्ख; अन्धेनैव - अन्धे से ही; नीयमानाः - ले जाये जाते हुए; यथा अन्धाः - जैसे अन्धे॥२५॥