Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/25

4/25
Sutra
विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः ।। ४.२५ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः॥२५॥

शब्दार्थ - (विशेष-दर्शिनः) [विवेक ख्याति द्वारा जीवात्मा और चित्त में भेद को देखने वाले] विशेष ज्ञानी की (आत्म-भाव-भावना) आत्मविषयक जिज्ञासा (विनिवृत्ति:) निवृत्त हो जाती है।

सूत्रार्थ - विवेकख्याति द्वारा पुरुष और चित्त में भेद को देखने वाले योगी की 'मैं कौन हूँ', 'कैसा हूँ', 'क्या था', 'आगे क्या होऊँगा' इस प्रकार की 'आत्मविषयक जिज्ञासा' समाप्त हो जाती है।

Vyas Bhashya

यथा प्रावृषि तृणाङ्कुरस्योद्भेदेन तद्बीजसत्तानुमीयते, तथा मोक्षमार्गश्रवणेन यस्य रोमहर्षाश्रुपातौ दृश्येते, तत्राप्यस्ति विशेषदर्शनबीजमपवर्गभागीयं कर्माभिनिर्वर्तितमित्यनुमीयते। तस्यात्मभावभावना स्वाभाविकी प्रवर्तते, यस्याभावादिदमुक्तं - स्वभावं मुक्त्वा दोषाद्येषां पूर्वपक्षे रुचिर्भवत्यरुचिश्च निर्णये भवति। तत्रात्मभावभावना कोऽहमासं, कथमहमासं, किंस्विदिदं, कथंस्विदिदं, के भविष्यामः, कथं वा भविष्याम इति। सा तु विशेषदर्शिनो निवर्त्तते। कुतः ? चित्तस्यैवैष विचित्र: परिणामः, पुरुषस्त्वसत्यामविद्यायां शुद्धश्चित्तधर्मैरपरामृष्ट इति। ततोऽस्यात्मभावभावना कुशलस्य विनिवर्तत इति॥२५॥

व्या० भा० अ० - जिस प्रकार वर्षा काल में घास के अंकुर निकलने से उसके बीज की सत्ता का अनुमान किया जाता है, उसी प्रकार मोक्षमार्ग के श्रवण से जिसके रोमाञ्च और अश्रुपात देखे जाते हैं, उसमें भी (योगाङ्गानुष्ठानादि) कर्मों से सम्पादित, मोक्ष दिलानेवाला, विशेष ज्ञान का कारण है, ऐसा अनुमान से जाना जाता है। उसकी स्वाभाविक 'आत्मभावभावना' प्रवृत्त होती है। जिसके अभाव में कहा गया है कि "अपनी आत्मसत्ता को छोड़कर दोष के कारण इनकी पूर्वपक्ष (अनात्मवाद) में रुचि होती है और निर्णय में अरुचि होती है।" 'आत्मभावभावना' यह है कि मैं कौन था ? मैं कैसा था ? यह क्या है ? यह कैसा है ? क्या होंगे ? कैसे बनेंगे ? वह भावना विशेषदर्शी की निवृत्त होती है। क्यों ? यह विचित्र परिणाम चित्त का ही है। अविद्या के न रहने पर पुरुष चित्तधर्मों से पृथक् हो जाता है। उससे कुशल (योगी) की 'आत्मभावभावना' निवृत्त हो जाती है।। २५॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि विशेषज्ञ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, चित्त आदि पदार्थों के स्वरूप को और आत्मा, परमात्मा के स्वरूप को विशुद्ध रूप से जानने वाले योगी की 'आत्मभावभावना' समाप्त हो जाती है।

'आत्मभावभावना का स्वरूप' जानना आवश्यक है। उसको ऐसे जानना चाहिए कि- मैं भूतकाल में कौन था ? किस प्रकार से था ? यह शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि क्या हैं ? किस प्रकार से हैं ? हम सभी आगे आने वाले समय में क्या होंगे ? कैसे होंगे ? यह आत्मभावभावना है। यह आत्मभावभावना विशेषज्ञ अर्थात् शरीर, इन्द्रियाँ, चित्त आदि जड़ पदार्थों और आत्मा, परमात्मा को जानने वाले व्यक्ति की निवृत्त हो जाती है।

'आत्मभावभावना' को समझाने के लिये एक दृष्टान्त दिया है कि - मोक्ष मार्ग का उपदेश सुनने से जिस व्यक्ति के रोमाञ्च और अश्रुपात दिखाई देते हैं उस व्यक्ति ने पूर्वजन्मों में मोक्षशास्त्रों को पढ़ा-पढ़ाया है। योग के आठ अङ्गों का अनुष्ठान किया है। सत्पुरुषों के संग से मोक्ष विद्या को सुना है। इससे अनुमान होता है कि इस व्यक्ति में मोक्षप्राप्ति करने के बीज हैं। जिस व्यक्ति के जीवन में आत्मभावभावना नहीं होती, उस व्यक्ति की रुचि मोक्षमार्ग में नहीं होती। किन्तु उसकी रुचि केवल विषय भोगों में रत रहने की होती है। ऐसा भोगवादी व्यक्ति कहता है कि अगलेपिछले जन्म को किसने देखा है। आत्मा, परमात्मा को कोई भी नहीं जानता। न कोई बन्धन है और न कोई मोक्ष है, खाओ - पीओ, मौज करो। आत्मा-परमात्मा, धर्माधर्म, मोक्ष की बातों को छोड़ दो। इन भोगमार्ग वालों का जीवन कैसा होता है, उपनिषत्कार ने उसको स्पष्ट किया है -

अविद्यायामन्तरे वर्त्तमानाः स्वयन्धीराः पण्डितम्मन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥कठोपनिषद् २/५॥

भावार्थ - अविद्यायाम् - अविद्या में, प्रेय मार्ग में; अन्तरे - बीच में; वर्त्तमानाः - उपस्थित, पड़े हुए; स्वयम् - अपने आप ही; धीराः - ज्ञानी; पण्डितम्मन्यमानाः - अपने आप को पण्डित (चतुर, ज्ञानी) समझने वाले; दन्द्रम्यमाणाः - टेढ़े मार्ग पर चलते हुए; परियन्ति - भटकते हैं; मूढाः - मोहग्रस्त, मूर्ख; अन्धेनैव - अन्धे से ही; नीयमानाः - ले जाये जाते हुए; यथा अन्धाः - जैसे अन्धे॥२५॥

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