इस सूत्र में यह बतलाया है कि द्रष्टा और दृश्य से सम्बद्ध चित्त 'सर्वार्थ' कहाता है।
द्रष्टा जीवात्मा है और चित्त तथा उसके द्वारा दिखाये जाने वाले पदार्थों को 'दृश्य' कहते हैं। चित्त तीन स्थितियों में रहता है।
(१) जब जीवात्मा चित्त के माध्यम से किसी अन्य पदार्थ को जान रहा होता है, यद्यपि उस समय चित्त ज्ञान का साधन होता है परन्तु अविद्या के कारण वह चित्त उन पदार्थों का ज्ञान करने वाला (ज्ञाता) प्रतीत होता है तब वह चित्त 'ग्रहीता' कहलाता है
(२) जब जीवात्मा चित्त के माध्यम से किसी अन्य पदार्थ को जानता है तब चित्त उस पदार्थ को जानने का साधन होने के कारण 'ग्रहण' कहलाता है।
(३) जब जीवात्मा चित्त के स्वरूप को जानना चाहता है और चित्त को ही जान रहा होता है, उस समय चित्त 'ग्राह्य' कहलाता है। इसलिये चित्त को 'सर्वार्थ' कहा है।
इस स्थिति को ठीक न जानने के कारण कुछ लोग चित्त को ही आत्मा मानते हैं। कुछ लोग सब कुछ चित्त को ही मानते हैं, दृश्यमान जगत् (घट पट आदि) को चित्त से पृथक् नहीं मानते इसका कारण यह है कि कभी चित्त 'ग्राह्य' रूप में रहता है अर्थात् जानने योग्य पदार्थ के रूप में रहता है। कभी 'ग्रहण' के रूप में रहता है अर्थात् किसी पदार्थ को जनाने का साधन बनता है। जैसे नेत्र जनाने का साधन है। कभी 'ज्ञाता' के रूप में रहता है अर्थात् जानने वाले के रूप में रहता है जैसे जीवात्मा। इन तीनों रूपों में रहने के कारण कुछ लोग चित्त को ही सब कुछ समझते हैं। चित्त को ठीक रूप में न जानने के कारण कुछ लोग कहते हैं कि एक चेतन मन है और दूसरा जड़ मन है। वास्तविकता यह है कि ग्रहीतृ, ग्रहण और ग्राह्य इन तीनों को जो विशुद्ध रूप में जानते हैं, वे ही जीवात्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने वाले हैं, अन्य नहीं।
इन तीनों का विशुद्ध ज्ञान समाधि के द्वारा हो सकता है, अन्यथा नहीं। चाहे कोई कितना भी किन्हीं विषयों का विद्वान् क्यों न बन जाय। परन्तु जब तक समाधि के द्वारा आत्मा और परमात्मा को नहीं जान लेता तब तक विशुद्ध विद्वान् होकर अपना और अन्यों का कल्याण नहीं कर सकता। इसलिये प्रत्येक योगाभ्यासी को यह जानना चाहिये कि मैं 'ग्रहीतृ' आत्मा हूँ। चित्त 'ग्रहण' = जनाने का साधन है और जो चित्त के द्वारा जो पदार्थ जानें जाते हैं, वे 'ग्राह्य' हैं। ऐसा जानने से भ्रान्ति दूर हो जाती है॥२३॥