अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च, परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतति, तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहस्वरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकारमात्रतया बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिराख्यायते। तथा चोक्तम्-
न पातालं न च विवरं गिरीणां, नैवान्धकारं कुक्षयो नोदधीनाम्।
गुहा यस्यां निहितं ब्रह्म शाश्वतं बुद्धिवृत्तिमविशिष्टां कवयो वेदयन्ते॥ इति॥ २२॥
व्या० भा० अ० - अपरिणामिनी और प्रतिसङ्क्रमणरहित भोक्तृशक्ति परिणामी पदार्थ (बुद्धि) में प्रतिसंक्रान्ता के समान (होकर) उस बुद्धि की वृत्ति का अनुगमन करती है। चेतन शक्ति के प्रकाश से चेतन सदृश स्वरूप को प्राप्त उस बुद्धिवृत्ति के अनुकारमात्रता के कारण बुद्धिवृत्ति से अभिन्न (समान) ही ज्ञानवृत्ति कही जाती है। और ऐसा कहा गया है - जिसमें नित्य ब्रह्म स्थित है वह गुहा न पाताल है, न पर्वतों की गुहा है, न अन्धकार है न समुद्रों का अन्तस्तल किन्तु चेतन से अभिन्न बुद्धिवृत्ति ही गुफा है, ऐसा क्रान्तदर्शी विद्वान् जानते हैं॥२२॥