Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/2

4/2
Sutra
जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात् ।। ४.२ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - तत्र कायेन्द्रियाणामन्यजातिपरिणतानाम्-

अर्थ - उसमें भिन्न जाति के रूप में परिणत शरीर एवं इन्द्रियों का......

Word Meaning

जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्॥२॥

शब्दार्थ - (जाति-अन्तर-परिणामः) शरीर का अवस्थान्तर परिणाम (प्रकृति-आपूरात्) उपादान कारण के शरीर में प्रविष्ट होने से होता है।

सूत्रार्थ - उत्तम भोजन, औषधियों के सेवन और योगाभ्यास के अनुष्ठान से शरीर पूर्व की अपेक्षा अधिक स्वस्थ, बलवान् होता है तथा रंग-रूप व आकृति में भी विशेष परिवर्तन हो जाता है।

Vyas Bhashya

पूर्वपरिणामापाय उत्तरपरिणामोपजनस्तेषामपूर्वावयानुप्रवेशाद् भवति। कायेन्द्रियप्रकृतयश्च स्वं स्वं विकारमनुगृह्णन्त्यापूरेण धर्मादिनिमित्तमपेक्षमाणा इति॥२॥

व्या० भा० अ० - (शरीर तथा इन्द्रियों के) पूर्व परिणाम नष्ट होने पर उत्तरकाल के परिणाम की उत्पत्ति, उन (शरीरेन्द्रियों) के नये अवयवों के अनुप्रवेश से होती है। काया की एवं इन्द्रियों की प्रकृतियाँ = (भूत और अहङ्कार) अपने-अपने विकारों को = (शरीर और इन्द्रियों को) अवयवों के अनुप्रवेश द्वारा धर्मादि निमित्त की अपेक्षा करती हुई अनुगृहीत करती हैं॥२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि धर्माचरण से शरीर और इन्द्रियों के दोषों को दूर करके उनमें विशेष परिवर्तन किया जाता है। उसको 'जात्यन्तर परिणाम' कहते हैं।

शरीर और इन्द्रियों के गोलकों के उपादान कारण पृथिवी आदि पाँच भूत हैं। शरीर के तीन दोष हैं वात, पित्त और कफ। सात धातु हैं रस, रक्त, मांस, मेदस्, अस्थि मज्जा और वीर्य। आठवाँ धातु ओज भी माना जाता है। इन सबमें जो दोष उत्पन्न होते हैं उनको शारीरिक चिकित्सा विज्ञान से जानकर, आयुर्वेद की औषधियों तथा ब्रह्मचर्य के पालन से दूर कर दिया जाता है तो शरीर में उत्तम पदार्थों का समावेश हो जाता है। उससे शरीर में बहुत अधिक परिवर्तन आ जाता है। इन्द्रियों के गोलकों में भी अन्तर आ जाता है उनमें देखने, सुनने आदि का सामर्थ्य बढ़ जाता है। इसी का नाम 'जात्यन्तर परिणाम' है। जैसे किसी छोटे बालक को किसी ने दस वर्ष की अवस्था में देखा हो तो उसी को बीस वर्ष की अवस्था में देखने पर पहिचानना कठिन हो जाता है। इसी प्रकार से व्यक्ति के शरीर में इतना अधिक परिवर्तन आ जाता है कि पूर्व शरीर को पहिचानना कठिन हो जाता है। यह है जात्यन्तर परिणाम अथवा अवस्थान्तर हो जाना।

जो 'जात्यन्तर परिणाम' का यह अर्थ किया जाता है कि योगी अपने मनुष्य शरीर को परिवर्तित करके और इन्द्रियों में भी परिवर्तन करके पशु आदि अन्य जातियों के शरीर का निर्माण कर लेता है। यह असंगत है। मनुष्य शरीर से पशु आदि के शरीर में आने का योगी का क्या प्रयोजन है ? कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति ऊँची सुखप्रद अवस्था को छोड़कर अत्यन्त निम्नकोटि की अवस्था को प्राप्त नहीं करना चाहता। कल्पना कीजिये कि योगी ने अपने मनुष्य शरीर को किसी पशु शरीर में परिवर्तित कर लिया तो योगी उस पशु शरीर में नहीं रह सकता। क्योंकि पशु के स्वभाव में और योगी के स्वभाव में अत्यन्त विरोध होता है। योगी अपने गुण, कर्म, स्वभाव पशु जैसे क्यों बनाना चाहेगा ? क्योंकि जीवात्मा जिस शरीर में जन्म लेता है, उस शरीर में जाने पर उसका स्वभाव भी उस शरीर के अनुरूप बन जाता है। यदि पशु शरीर में जायेगा तो पशु शरीर के अनुरूप स्वभाव बनेगा। पशु मूर्ख है तो योगी भी मूर्ख हो जायेगा। अतः इस अपने मनुष्य शरीर को योगी अन्य पशु आदि जातियों में बदल देता है अर्थात् अपने शरीर को बदल कर पशु आदि शरीर बना देता है, यह मान्यता ठीक नहीं है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की जाति के विषय में यह मान्यता है कि "जाति जो जन्म से लेकर मरणपर्यन्त बनी रहे, जो अनेक व्यक्तियों में एकरूप से प्राप्त हो, ईश्वरकृत अर्थात् मनुष्य, गाय, अश्व और वृक्षादि समूह हैं वे जाति शब्दार्थ से लिये जाते हैं।"

  • आर्योद्देश्यरत्नमाला ३८

इससे यह सिद्ध होता है कि कोई भी मनुष्य, अपने मनुष्य शरीर को पशु आदि जातियों में परिवर्तित नहीं कर सकता। मनुष्यादि के शरीरों, इन्द्रियों एवं मन की रचना को पूर्णरूप से कोई योगी नहीं जान सकता है और न ही कोई उनकी रचना कर सकता है॥२॥

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