इस सूत्र में यह बतलाया है कि चित्त ज्ञानस्वरूप नहीं है, दृश्य होने से।
इस प्रसंग में चित्त को ही आत्मा मानने वाले यह शङ्का कर सकते हैं कि चित्त ही अपने स्वरूप को और अन्य विषयों के स्वरूप को जनाने वाला हो जायेगा, उसको जनाने वाले किसी अन्य चेतन आत्मा को मानने की आवश्यकता नहीं है। इसका उत्तर सूत्रकार ने दिया है कि चित्त ज्ञानस्वरूप नहीं है, क्योंकि वह दृश्य है। जैसे श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ दृश्य हैं, वैसे ही चित्त भी दृश्य है। इन्द्रियाँ स्वयं ज्ञानस्वरूप नहीं हैं। क्योंकि वे स्वयं अपना और घट, पट आदि पदार्थों का अनुभव नहीं कर सकती। जीवात्मा इन्द्रियों को प्रेरणा देकर किसी विषय के साथ सम्बद्ध करता है, उस स्थिति में जीवात्मा की सहायता से इन्द्रियाँ विषय का चित्र उतारती हैं किन्तु उसका अनुभव नहीं करती। आत्मा की सहायता से किसी विषय को जनाने में वे सहायक होती हैं। जैसे नेत्रेन्द्रिय रूप के जनाने में सहायक होती है, वैसे ही चित्त भी जीवात्मा की प्रेरणा से विषयों के साथ सम्बद्ध होकर जनाने में सहायक होता है। परन्तु वह स्वयं विषयों को नहीं जानता।
इसी प्रकार से शब्द आदि विषय भी दृश्य होने से ज्ञानस्वरूप नहीं है। यहाँ पर अग्नि के दृष्टान्त से चित्त को ज्ञानस्वरूप कहा जा सकता है। जैसे अग्नि स्वयं को प्रकाशित करती है और घट, पट आदि को भी प्रकाशित करती है। वैसे ही चित्त भी स्वयं को और अन्य विषयों को प्रकाशित करता है। यह अग्नि का दृष्टान्त ठीक नहीं है क्योंकि अग्नि जड़ होने से स्वयं अपने स्वरूप को प्रकट नहीं कर सकती, और जब कभी घट पटादि अन्य पदार्थों के स्वरूप को प्रकट करती भी है, तब भी वह अन्य पदार्थों (घट-पटादि) के स्वरूप को स्वयं प्रकट नहीं करती। कोई अन्य मनुष्य वहाँ घट आदि के पास अग्नि को उपस्थित करता हैं तब अग्नि घटादि पदार्थों के स्वरूप को प्रकट कर पाती है। इसलिये चित्त को ज्ञानस्वरूप सिद्ध करने के लिये अग्नि का दृष्टान्त ठीक नहीं है।
सूत्रकार ने दृश्य का स्वरूप दूसरे पाद में वर्णित किया है कि प्रकाश - क्रिया- स्थितिशील, भूतेन्द्रियस्वरूप भोग और अपवर्ग को सिद्ध करने वाला दृश्य है। सत्त्वादि तीन गुणों से बना हुआ चित्त भी दृश्य है। सत्त्वादि ज्ञानरहित जड़ पदार्थ हैं। वैसे ही चित्त भी जड़ पदार्थ है। जो पदार्थ संघात रूप होकर अन्यों के प्रयोजन को सिद्ध करता है, वह ज्ञानस्वरूप नहीं, ज्ञानरहित होता है। जैसे घट, पट आदि। संसार में दो प्रकार के पदार्थ हैं। एक चेतन और दूसरे जड़। ईश्वर और जीव ये दोनों चेतन और ज्ञानवान् हैं। सत्त्व आदि तीन गुणों से बने पदार्थ जड़ हैं। ईश्वर ने तीन गुणों से इस सृष्टि की रचना की है। उस रचना को इस प्रकार से जानना चाहिये कि सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण की साम्यावस्था प्रकृति है। ईश्वर ने प्रकृति से महत्तत्व, महत्तत्व से अहङ्कार, अहङ्कार से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ एक मन, पाँच तन्मात्रायें, पाँच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पाँच स्थूलभूत और उनसे मनुष्य आदि शरीरों की रचना की है। इस रचना के अन्तर्गत चित्त वा मन भी है। जो व्यक्ति चित्त और इस पूर्वोक्त रचना (जड़ रूप) को जान लेता है और ईश्वर, जीव के स्वरूप को भी अच्छे प्रकार से जान लेता है वह कृतकृत्य हो जाता है॥१९॥