इस सूत्र में यह बतलाया है कि चित्त की वृत्तियाँ सदा ज्ञात रहती हैं। क्योंकि चित्त का स्वामी पुरुष अपरिणामी है।
व्यापार जो वस्तु सत्त्वादि तीन गुणों से बनी है, वह परिणामी होती है। अर्थात् परिवर्तनशील होती है। चित्त भी तीन गुणों से बना है, वह भी परिवर्तनशील है। जीवात्मा चेतन है, उसके साथ सम्बद्ध होकर चित्त चेतनवत् हो जाता है। उसको जब आत्मा प्रेरणा देकर विषयों के साथ सम्बद्ध करता, तब वह विषयों के आकार-प्रकार के अनुरूप परिणत हो जाता है। अर्थात् जैसा विषय उसके समक्ष उपस्थित होता है, वह उसी रूप में परिणत हो जाता है। यह परिणत होना चित्त की वृत्ति कहलाता है। इस प्रकार की जितनी भी चित्तवृत्तियाँ चित्त में उभरती हैं, उन सबको आत्मा सदा जानता है। ऐसा कभी भी नहीं होता कि चित्त में वृत्तियाँ हों और जीवात्मा उनको न जाने। इसमें कारण यह है कि पुरुष परिणामी नहीं है अर्थात् पुरुष परिवर्तनशील नहीं है। बिना किसी प्रकार के परिवर्त्तन के ही चित्त की वृत्तियों को जानता है। चित्त में और आत्मा में अन्तर यह है कि चित्त तीन गुणों से बना है और परिणामी है। परन्तु आत्मा के उपादान कारण तीन गुण नहीं है। अतः वह परिणामी नहीं है। तीन गुण ज्ञानरहित हैं। इसलिये उनसे बना चित्त भी ज्ञानरहित है। आत्मा ज्ञानयुक्त है। चित्त दर्पण की भाँति वस्तु के जनाने में साधनमात्र है। परन्तु किसी भी वस्तु को वह जान नहीं सकता। आत्मा स्वयं ज्ञानी है अतः वह वस्तु को जानने में समर्थ है। वस्तु को जनाते समय चित्त परिणाम को प्राप्त होकर जनाता है परन्तु आत्मा बिना परिणाम को प्राप्त हुए वस्तु को जानता है। इसलिये आत्मा को अपरिणामी कहा। चित्त परिणामी और जड़ पदार्थ है। आत्मा अपरिणामी और चेतन पदार्थ है। इस प्रकार से इन दोनों के स्वरूप को जानना चाहिये॥१८॥