तदुपरागापेक्षित्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताऽज्ञातम्॥१७॥
शब्दार्थ - (तद्-उपराग - अपेक्षित्वात्) उस बाह्य वस्तु के सम्बन्ध की अपेक्षा करने वाला होने से (चित्तस्य) चित्त के (वस्तु) बाह्य पदार्थ (ज्ञात-अज्ञातम् ) ज्ञात और अज्ञात रहते हैं।
सूत्रर्थ - बाह्य वस्तु के सम्बन्ध की अपेक्षा करने वाला होने से, चित्त के द्वारा बाह्य पदार्थ ज्ञात और अज्ञात रहते हैं। अर्थात् जब चित्त बाह्य पदार्थ से सम्बद्ध होता है, तो वस्तु जानी जाती है और जब चित्त बाह्य पदार्थ से असम्बद्ध होता है, तब वस्तु नहीं जानी जाती है।