Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/16

4/16
Sutra
न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात् ।। ४.१६ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

केचिदाहुः-ज्ञानसहभूरेवार्थो भोग्यत्वात्सुखादिवदिति। त एतया द्वारा साधारणत्वं बाधमानाः पूर्वोत्तरक्षणेषु वस्तुरूपमेवापह्नुवते-

अर्थ - कुछ लोग कहते हैं कि "सुखादि के समान भोग्य होने के कारण पदार्थ ज्ञान के साथ ही रहता है।'' वे इस (मान्यता) के द्वारा वस्तु के साधारणत्व को (अर्थात् अनेक ज्ञानों के प्रति विषय बनने) का खण्डन करते हुए पूर्ववर्ती उत्तरवर्ती क्षणों में (रहने वाली) वस्तु का ही निषेध करते हैं।

Word Meaning

न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्॥१६॥

शब्दार्थ - (न) नहीं है (च) और (एक चित्त-तन्त्रम्) एक ज्ञान के आधीन (वस्तु) पदार्थ (तद्) वह पदार्थ (अ-प्रमाणकम् ) प्रमाण से न जानने पर ( तदा) तब (किम्) क्या (स्यात्) हो जाएगा ? (अर्थात् क्या वह पदार्थ नहीं रहेगा ? )

सूत्रार्थ - किसी भी वस्तु का अस्तित्व एक ज्ञान के आधीन नहीं होता क्योंकि जब वस्तु, प्रमाण से नहीं जानी जा रही होती है तब क्या उस वस्तु का अस्तित्व नहीं रहेगा ? परन्तु प्रमाण = ज्ञान के हट जाने पर भी वस्तु का अस्तित्व देखा जाता है इसलिये एक ज्ञान के आधीन किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं होता है।

Vyas Bhashya

एकचित्ततन्त्रं चेद्वस्तु स्यात्तदा चित्ते व्यग्रे निरुद्धे वा स्वरूपमेव तेनापरामृष्टमन्यस्याविषयीभूतमप्रमाणकमगृहीतमस्वभावकं केनचित्तदानीं किं तत्स्यात् ? संबध्यमानं च पुनश्चित्तेन कुत उत्पद्येत ? ये चास्यानुपस्थिता भागास्ते चास्य न स्युरेवं नास्ति पृष्ठमित्युदरमपि न गृह्येत। तस्मात्स्वतन्त्रोऽर्थः सर्वपुरुषसाधारणः, स्वतन्त्राणि च चित्तानि प्रतिपुरुषं प्रवर्तन्ते। तयोः संबन्धादुपलब्धिः पुरुषस्य भोग इति॥१६॥

व्या० भा० अ० - यदि पदार्थ एक चित्त के आधीन हो, तब चित्त के अन्य वस्तु में व्यस्त रहने पर अथवा निरुद्ध होने पर उस (पदार्थ) का स्वरूप ही अगृहीत, अन्य (चित्त) का आलम्बन न बनने वाला (इसलिए) अप्रामाणिक, किसी के द्वारा भी अज्ञातस्वरूप वाला वह क्या होगा ? और फिर से चित्त से सम्बद्ध होने वाला वह (पदार्थ) कहाँ से उत्पन्न हो जायेगा ? इसके जो अज्ञात भाग हैं, वे भी नहीं होने चाहिएँ। इस प्रकार पीठ नहीं (दिखती) है इस कारण पेट भी नहीं होना चाहिए। इस कारण पदार्थ स्वतन्त्र (स्वरूप से विद्यमान) है और वह सब के लिए साधारण है। चित्त स्वतन्त्र हैं, प्रत्येक प्राणी में (स्वतन्त्र रूप से) प्रवृत्त होते हैं। उन (पदार्थ एवं चित्त) के सन्निकर्ष से जो ज्ञान होता है, वह पुरुष का भोग है॥१६॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि एक चित्त के आधीन वस्तु नहीं है। वह वस्तु प्रमाणरहित होने पर क्या होगी ?

कुछ लोगों का यह मत है कि ज्ञान के काल में ही पदार्थ की सत्ता है, सुख के समान। जैसे सुख भोगकाल में ही सुख की सत्ता प्रतीत होती है, अन्य समय में नहीं। इसी प्रकार से वे ज्ञानकाल से पूर्व और ज्ञानकाल के पश्चात् वस्तु के स्वरूप को स्वीकार नहीं करते। इस विषय में सूत्रकार ने कहा कि एक चित्त के आधीन वस्तु नहीं है। यदि एक चित्त के आधीन वस्तु हो तो जिस समय वस्तु को देखने वाला व्यक्ति किसी अन्य विषय में लग जायेगा तो उस वस्तु के विषय में क्या कहा जायेगा ? इस मान्यता के आधार पर इस प्रश्न का उचित उत्तर नहीं दिया जा सकता। इस विषय में यह भी प्रश्न उठता है कि चित्त के साथ पुनः सम्बद्ध होती हुई वही वस्तु फिर कहाँ से आ जायेगी ? इस प्रश्न का उत्तर भी इस मत वालों के पास नहीं है। जब वस्तु के आगे का भाग प्रत्यक्ष रूप में देखा जायेगा तब पीछे का भाग दिखाई नहीं देगा। क्योंकि उस वस्तु के पीछे के भाग से ज्ञान का सम्बन्ध नहीं है। इस मत के अनुसार ज्ञान के होने से ही वस्तु की सत्ता होती है। वस्तु के पीछे के भाग से ज्ञान का सम्बन्ध न होने से वह भाग वस्तु नहीं माना जा सकता। यदि पीछे का भाग वस्तु नहीं है तो उसका आगे का भाग भी वस्तु नहीं माना जा सकता। क्योंकि पीछे के भाग के बिना वस्तु का आगे का भाग नहीं हो सकता। इसलिये स्वतन्त्र वस्तु सभी पुरुषों के लिये समान रूप से विद्यमान है और चित्त भी स्वतन्त्र रूप से समस्त आत्माओं में प्रवृत्त रहते हैं।

इस विषय में यह बात भी ध्यान देने की है कि किसी वस्तु की विद्यमानता उसके अवयवों पर आधारित होती है। जब तक किसी वस्तु के अवयव अर्थात् उपादान कारण विद्यमान रहते हैं तब तक वह वस्तु विद्यमान रहती है और अवयवों के छिन्न-भिन्न हो जाने पर वह वस्तु छिन्नभिन्न हो जाती है अर्थात् नष्ट हो जाती है। ज्ञान किसी भी वस्तु का उपादानकारण नहीं है, जिसके न रहने पर वह नष्ट हो जाय। इसलिये चाहे कोई वस्तु किसी उपादानकारण से बनी हो और चाहे वह अनादि हो अर्थात् उपादान कारण से न बनी हो, दोनों प्रकार की वस्तुयें स्वतन्त्र हैं। किसी चित्त (ज्ञान) के आधीन नहीं हैं॥१६॥

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