इस सूत्र में यह बतलाया है कि वे धर्म प्रकट और सूक्ष्म सत्त्व आदि गुण-स्वरूप हैं।
समस्त दुःखों से, बन्धनों से छूटकर नित्यानन्द मोक्ष को प्राप्त करने के लिये तीन सत्तात्मक पदार्थों को जानना आवश्यक है, अनिवार्य है। उनमें से एक जड़ प्रकृति है। वह व्यक्त और अव्यक्त रूप में रहती है। कुछ लोग इसकी अव्यक्तावस्था को न जान सकने के कारण इसको नहीं स्वीकार करते हैं। इस विषय में यह कहा जा रहा है कि प्रकृति नामक जड़ पदार्थ सत्तात्मक है। यह व्यक्ताव्यक्त रूप में रहता है। ये सत्त्व, रजस्, तमस् नामक पदार्थ जब कार्यरूप को धारण कर लेते हैं, तब दृष्टिगोचर होते हैं और जब प्रलय को प्राप्त होकर कारण रूप को धारण करते हैं, तब दृष्टिगोचर नहीं होते। किन्तु अव्यक्त रूप में रहते हैं। वे तीन काल में रहने वाले धर्म व्यक्त और सूक्ष्म स्वरूप वाले हैं। जो वर्तमान हैं वे व्यक्त हैं और जो अतीतानागत हैं वे सूक्ष्म अर्थात् अव्यक्तहैं। सत्त्व आदि तीनों गुणों से महत्तत्व की उत्पत्ति, महत्तत्व से अहंकार की, अहंकार से दस इन्द्रियों, मन और पाँच तन्मात्राओं की उत्पत्ति होती है। पाँच तन्मात्राओं से पृथिवी आदि पाँच स्थूलभूत उत्पन्न होते हैं। उन पाँच भूतों से मनुष्य आदि के शरीर की उत्पत्ति होती है। ये सभी पदार्थ सत्त्वादि तीन गुणों के कार्य हैं। इसलिये इनको गुण स्वरूप कहा है। जो भी संसार में उत्पन्न पदार्थ हैं, वे सब इन तीन गुणों के ही रूपान्तर हैं, भिन्न पदार्थ नहीं।
योगाभ्यासी को कारण और कार्य के स्वरूप का ज्ञान होने से योगमार्ग पर चलना सरल हो जाता है। जब वह यह जान जाता है कि समस्त विश्व सत्त्वादि गुणों का ही कार्य है, और कालान्तर में ये सभी सांसारिक पदार्थ इन्हीं तीन गुणों में लीन हो जाते हैं, तब ईश्वर के ज्ञान, बलपूर्वक सांसारिक पदार्थों की उत्पत्ति को देखकर योगी इन पदार्थों के रचयिता ईश्वर को भी अच्छे प्रकार से जान जाता है। ईश्वर को इन पदार्थों का कर्त्ता मानने पर इनसे स्वस्वामी सम्बन्ध नहीं रहता और इन पदार्थों में आसक्ति भी नहीं रहती, इत्यादि प्रयोजनों की सिद्धि के लिये तीन गुणों और उनके कार्यों का परिज्ञान करना चाहिये॥१३॥