इस सूत्र में यह कहा है कि धर्मों के कालभेद के कारण भूत व भविष्यत् वस्तु-स्वरूप से विद्यमान है।
इस पाद के १०वें सूत्र में वासनाओं को अनादि कहा है। ४।११ में हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन के अभाव होने पर उन वासनाओं का अभाव बतलाया है। यहाँ पर प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में उन वासनाओं का अभाव हो जाता है ? इसका उत्तर सूत्रकार ने दिया है कि अतीत और अनागत वस्तु स्वरूप से विद्यमान रहती है। उसमें धर्मों का काल भेद कारण है। भविष्यकाल में अभिव्यक्त होने वाला पदार्थ अनागत होता है अर्थात् वर्तमान काल में वह अपने धर्मी में छिपा रहता है। जो पदार्थ अभिव्यक्त होकर अपने धर्मी में छिप जाता है, वह अतीत होता है। जो वर्त्तमानकाल में अभिव्यक्त हो रहा है, वह वर्त्तमान होता है। मिट्टी में घट विद्यमान है। जब तक उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती तब तक वह अनागत है। अभिव्यक्ति होने पर वर्त्तमान है और टूट फूट जाने पर अतीत है। इसी प्रकार से प्रत्येक पदार्थ अतीत, अनागत रूप से वर्त्तमान रहता है। उसका अभाव नहीं होता। यह सत्कार्यवाद का सिद्धान्त है कि अभाव से भाव और भाव से अभाव की उत्पत्ति नहीं होती। सांख्कार महर्षि कपिल जी ने कहा है कि -
"उपादाननियमात् "॥सांख्यदर्शन १२ / ११५॥
अर्थात् उपादान कारण में जो गुण एवं स्वभाव होते हैं वे ही उसके कार्य में आते हैं। गीता में कहा है कि -
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः॥गीता २ / १६॥
अर्थात् अभाव से भाव और भाव से अभाव उत्पन्न नहीं होता।
यदि अतीत, अनागत स्वरूप से वर्तमान न होते तो भूत-भविष्यत् पदार्थों का ज्ञान किसी को भी नहीं होता। परन्तु भूत-भविष्यत् पदार्थों का ज्ञान सामान्य जनों को अल्पमात्रा में और योगियों को अधिक मात्र में होता है। जो कर्म लौकिक फल प्राप्ति के लिये अथवा मोक्ष प्राप्ति के लिये किये जाते हैं उनका फल भविष्यत् काल में मिलेगा। यदि कर्मों के फल को अनागत रूप में न माना जाय तो व्यक्ति शुभ कर्म करना छोड़ देवें। धर्माचरण (कर्म) फलप्रदाता के पास पहले से विद्यमान फल को ही दिलवाता है। अभाव से भाव की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता। धर्मी अनेक स्वभावों वाला है। जब उसके धर्मों को अभिव्यक्त करने वाला कारण उपस्थित होता है तब उसके धर्मों की अभिव्यक्ति होती है और जब अभिव्यक्ति करने वाला कारण उपस्थित नहीं होता, तब अनभिव्यक्ति रहती है। इसलिये कालभेद से सभी पदार्थ स्वरूप से वर्तमान रहते हैं, उनका अभाव कभी भी नहीं होता। हेतु, फल आदि जो वासनाओं का आश्रय है उनको योगी दूर कर देता है तो वे अपने उपादान कारण प्रकृति में लीन हो जाती हैं। उन वासनाओं का अभाव नहीं होता॥१२॥