इस सूत्र में यह बतलाया है कि हेतु, फल, आश्रय, आलम्बनों के द्वारा वासनाओं के संगृहीत होने से इनके अभाव होने पर वासनाओं का अभाव हो जाता है। हेतु - धर्माचरण से सुख की प्राप्ति होती है, अधर्माचरण से दुःख की प्राप्ति होती है। धर्माचरण का अभिप्राय है सकाम शुभ कर्म और अधर्माचरण का अभिप्राय अशुभ कर्म हैं। सुख भोग से सुख के संस्कार बनते हैं और दुःख भोगने से दुःख के संस्कार बनते हैं।
सुख के जिस साधन से सुख की प्राप्ति होती है, उस (साधन) में और उससे मिलने वाले सुख में राग उत्पन्न होता है। उस राग के कारण व्यक्ति उस कार्य को करता है। उस कार्य के सम्पादन में जो व्यक्ति सहायता देता है, उसको वह लाभ पहुँचाता है और जो उस कार्य में बाधा उपस्थित करता है उसकी हानि करता है। इसी प्रकार से अधर्माचरण से दुःख मिलता है, दुःख के अनुभव से दुःख के संस्कार उत्पन्न होते हैं। दुःख और दुःख के साधनों से व्यक्ति द्वेष करता है। द्वेष के कारण मन, वाणी और शरीर से फिर अधर्माचरण करता है। इस प्रकार से व्यक्ति सकाम शुभ कर्म और अशुभ कर्मों को करता रहता है। धर्माधर्म, सुख-दुःख, राग-द्वेष, षडरों वाला यह संसार चक्र चलता रहता है। इस सतत वर्तमान चक्र का मूल कारण 'अविद्या' है। इसी को 'हेतु' कहा है।
फल - प्रायः व्यक्ति धन-सम्मान आदि लौकिक सुखों को लक्ष्य बनाकर कर्म करता रहता है। जिन लौकिक सुखों आदि को लक्ष्य बनाकर व्यक्ति कर्म करता है, उन्हें 'फल' कहते हैं। जब तक लौकिक सुखों को लक्ष्य बनाकर व्यक्ति कर्म करता रहेगा तब तक उसमें वासनायें बनती रहेंगी।
आश्रय - साधिकार मन अर्थात् जिस मन ने भोग और अपवर्ग को सिद्ध नहीं किया है, वह इन वासनाओं का 'आश्रय' है। जब मन भोग और अपवर्ग इन दो प्रयोजनों को पूर्ण कर लेता है, तब वासनायें नहीं रह सकतीं।
आलम्बन - समक्ष उपस्थित हुई वस्तु जिससे वासनायें अभिव्यक्त होती हैं, वह 'आलम्बन' कहाता है। जब तक राग-द्वेषयुक्त चित्त के समक्ष वासनाओं को अभिव्यक्त करने वाले पदार्थ उपस्थित होते रहते हैं, तब तक वासनाएँ अभिव्यक्त भी होती रहती हैं और नई भी बनती रहती हैं। परन्तु विवेक वैराग्य हो जाने पर वासनाएँ न तो अभिव्यक्त होती हैं और न ही नई उत्पन्न होती हैं। हेतु, फल, आश्रय और आलम्बन से वासनाओं का संग्रह होता है। इनका अभाव होने पर वासनाओं का भी अभाव हो जाता है। योगाभ्यासी व्यक्ति का यह मुख्य कर्तव्य है कि हेतु आदि वासनाओं के कारणों को दूर करने का प्रयास करे। इस विषय में पहले भी लिखा गया है कि वेदादि सत्य शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, श्रवण- मनन, यम आदि आठ अङ्गों का अनुष्ठान, सत्पुरुषों का सङ्ग, निष्काम कर्म आदि के करने से ये हेतु आदि वासनाओं के आश्रय दूर हो जाते हैं और इनके दूर होने से वासनायें भी दूर हो जाती हैं॥११॥