Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/10

4/10
Sutra
तासां अनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात् ।। ४.१० ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्॥१०॥

शब्दार्थ - (तासाम्) उन वासनाओं का (अनादित्वं च ) प्रवाह से अनादित्व भी है (आशिष) जीने की इच्छा के (नित्यत्वात्) सदा बने रहने से।

सूत्रार्थ - सुख व सुख साधनों की प्राप्ति की, दुःख व दुःख साधनों की निवृत्ति की, तथा सदा जीवित बने रहने की इच्छा से, वासनाओं का 'प्रवाह से अनादित्व' भी है। 

Vyas Bhashya

तासां वासनानामशिषोनित्यत्वादनादित्वम्। येयमात्माशीर्मा न भूवं भूयासमिति सर्वस्य दृश्यते सा न स्वाभाविकी। कस्मात् ? जातमात्रस्य जन्तोरननुभूतमरणधर्मकस्य द्वेषदुःखानुस्मृतिनिमित्तो मरणत्रासः कथं भवेत् ? न च स्वाभाविकं वस्तु निमित्तमुपादत्ते। तस्मादनादिवासनानुविद्धमिदं चित्तं निमित्तवशात्काश्चिदेव वासनाः प्रतिलभ्य पुरुषस्य भोगायोपावर्तत इति।

घटप्रासादप्रदीपकल्पं संकोचविकासि चित्तं शरीरपरिमाणाकारमात्रमित्यपरे प्रतिपन्नाः। तथा चान्तराभावः संसारश्च युक्त इति। वृत्तिरेवास्य विभुनश्चित्तस्य संकोचविकासिनीत्याचार्यः।

तच्च धर्मादिनिमित्तापेक्षम्। निमित्तं च द्विविधम्- बाह्यमाध्यमात्मिकं च। शरीरादिसाधनापेक्षं बाह्यं स्तुतिदानाभिवादनादि। चित्तमात्राधीनं श्रद्धाद्याध्यात्मिकम्। तथा चोक्तम्- ये चैते मैत्र्यादयो ध्यायिनां विहारास्ते बाह्यसाधननिरनुग्रहात्मानः प्रकृष्टं धर्ममभिनिर्वर्तयन्ति। तयोर्मानसं बलीयः। कथम् ? ज्ञानवैराग्ये केनातिशय्येते ? दण्डकारण्यं च चित्तबलव्यतिरेकेण कः शारीरेण कर्मणा शून्यं कुर्तुमुत्सहेत समुद्रमस्त्यवद्वा पिबेत् ?॥१०॥

व्या० भा० अ० - कामना के नित्य होने से उन वासनाओं की (प्रवाह से) अनादिता सिद्ध होती है। जो यह आत्मा की कामना है कि मैं न रहूँ ऐसा न हो (अर्थात् सदा रहूँ, ऐसी प्रत्येक की कामना दिखती है, वह स्वाभाविक नहीं है। क्यों ? उसी समय उत्पन्न प्राणी (बालक) का जिसने (इस जन्म में) मरणधर्म का अनुभव नहीं किया (उसको) द्वेषात्मक, पूर्वानुभवजन्य दुःख की स्मृति से उत्पन्न मरणभय होता है, वह कैसे होवे ? और स्वाभाविक पदार्थ कारण का आश्रय नहीं लेता। इसलिये ( प्रवाह से ) अनादि काल की वासनाओं से सम्बद्ध यह चित्त (कर्माशयरूप) निमित्त के कारण (उनमें से) कुछ ही वासनाओं को लेकर पुरुष के भोग के लिए प्रवृत्त होता है।

घट (एवं) भवन में रखे दीपक के सदृश सङ्कोच-विकास (स्वभाव वाला) चित्त केवल शरीर के परिमाण के आकार वाला है, ऐसा कुछ आचार्य मानते हैं। ऐसा मानने से बाधा का अभाव होता है तथा पुनर्जन्म भी सिद्ध होता है। इस विभु चित्त की वृत्ति सङ्कोच - विकास वाली है, ऐसा (योग के) आचार्य मानते हैं।

और वह (सङ्कोच-विकास-शील-वृत्ति) धर्माधर्मरूपी निमित्त के कारण होती है। और (धर्माधर्म) निमित्त बाह्य एवं आध्यात्मिक नाम से दो प्रकार का होता है। शरीर आदि साधनों की अपेक्षा रखने वाला स्तुतिदान अभिवादन आदि (निमित्त) बाह्य है, श्रद्धा आदि आध्यात्मिक (निमित्त) है। और वैसा ही कहा है - और ये जो योगियों के मैत्री आदि व्यापार हैं वे बाह्य साधनों की अपेक्षा न रखने वाले (होने से) उत्कृष्ट धर्म को उत्पन्न करते हैं। उन (बाह्य आध्यात्मिक निमित्तों) में से मानस (आध्यात्मिक निमित्त) बलवान् है। किस प्रकार ? ज्ञान और वैराग्य से बढ़कर कौन (हो सकता) है ? चित्तबल के बिना (केवल) शारीरिक कर्म से कौन दण्डकारण्य को निर्जन करने का साहस करे ? अथवा अगस्त्य के सदृश कौन समुद्र को पीवे ?॥१०॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि आत्मा की अपने कल्याण की इच्छा नित्य होने से वासनाओं का अनादित्व है।

प्रत्येक प्राणी यह इच्छा रखता है कि मैं सदा जीवित रहूँ, मरूँ कभी नहीं। इससे यह सिद्ध होता है कि मृत्यु से भयभीत होने वाले प्राणियों ने पूर्वजन्म में मृत्यु से होने वाले दुःख का अनुभव किया है। यदि मृत्यु से डरने वाले प्राणियों ने पूर्व जन्म में मृत्यु से होने वाले दुःख का अनुभव न किया होता तो वे मृत्यु से भय न करते। क्योंकि डरने वाले प्राणियों ने इस जन्म में मरकर नहीं देखा है। मृत्यु से आत्मा को भय इसलिये होता है कि कभी मृत्यु से होने वाला दुःख मुझे पुनः प्राप्त न हो जाय। मृत्यु से आत्मा को दुःख होता है। उस दुःख के अनुभव से संस्कार: वासनायें उत्पन्न होती हैं। उन वासनाओं से स्मृति उत्पन्न होती है और स्मृति से दुःख उत्पन्न होता है। इससे जीवात्मा का अनादित्व सिद्ध होता है। क्योंकि जिस आत्मा ने पूर्वजन्म में मृत्यु के दुःख का अनुभव किया है वही मृत्यु से डरता है। 

इस सूत्र में वासनाओं को अनादि कहा है। इसका अभिप्राय यह है कि वासनायें स्वरूप से अनादि नहीं हैं। परन्तु प्रवाह से अनादि हैं। वासनाओं की उत्पत्ति होती है और विनाश भी। बार-बार एक प्रकार की वासनायें उत्पन्न होती हैं और नष्ट भी होती हैं। उत्पन्न होना और नष्ट होना यह प्रवाह चलता रहता है। इसलिये वासनाओं को अनादि कहा है। इस सूत्र के व्यासभाष्य में चित्त को विभु और चित्त वृत्तियों को संकोच विकास धर्म वाली कहा है। इस मान्यता को 'आचार्य' नाम से बतलाया है। यहाँ 'आचार्य' शब्द से योगदर्शनकार महर्षि पतञ्जलि जी का ग्रहण किया जाता है।

कुछ लोग 'विभु' शब्द का अर्थ 'सर्वव्यापक' कर सकते हैं। परन्तु आचार्य पतञ्जलि के मत में 'विभु' शब्द का अर्थ सर्वव्यापक करना उचित नहीं है। क्योंकि बन्धकारणशैथिल्यात्... यो० द० ३/४८॥ इस सूत्र में योगी अपने चित्त को शरीर से बाहर निकालकर अन्य प्राणी के शरीर में प्रविष्ट करता है, ऐसा लिखा है। यदि चित्त विभु माना जाता है तो योगी उसको अपने शरीर सेनिकालकर दूसरे के शरीर में कैसे प्रविष्ट कर सकता है। क्योंकि विभु का एक शरीर से निकलना और दूसरे शरीर में प्रवेश करना सम्भव नहीं है।

व्यासभाष्य में प्रत्यक्ष प्रमाणवृत्ति के प्रकरण में यह लिखा है कि इन्द्रियों की प्रणाली के द्वारा चित्त का बाहर के पदार्थों से सम्बन्ध होता है। तब बाहर के विषय का प्रत्यक्ष होता है। यदि चित्त विभु है तो इन्द्रियों के द्वारा बाहर के विषयों में सम्बन्ध करने की क्या आवश्यकता है। क्योंकि चित्त विभु है और विभु = व्यापक होने से उसका सभी पदार्थों से सम्बन्ध सदा रहता है। इन्द्रियों के माध्यम की आवश्यकता नहीं। ध्यातव्य है कि वृत्तियाँ चित्त का धर्म हैं और चित्त धर्मी है। धर्म धर्मी को व्यासभाष्य में एक ही माना है, भिन्न-भिन्न नहीं। यदि धर्म धर्मी एक हैं और वृत्तियों में संकोच विकास धर्म माना जाता है तो यह बात सिद्ध हो जाती है कि धर्मी चित्त भी संकोच - विकास धर्म वाला है। क्योंकि चित्त वृत्तियाँ चित्त से पृथक् पदार्थ नहीं हैं। यदि 'विभु' का अर्थ यह किया जाता है कि विविध इन्द्रियों से चित्त का सम्बन्ध होने से चित्त विभु है तब तो संगत हो सकता है।

इस सूत्र के व्यासभाष्य में यह कहा है कि - चित्तबल के बिना शारीरिक कर्म से दण्डकारण्य को कौन शून्य कर सकता है ? और अगस्त्य के बिना समुद्र को कौन पी सकता है ? इसका अभिप्राय यह है कि मानसिक कर्म, शारीरिक कर्म से बलवान् होता है। मानसिक कर्म से दण्डकारण्य को शून्य कर दिया, और अगस्त्य ने मानसिक कर्म से समुद्र को पी लिया। यह समझाने के लिये काल्पनिक कथा तो हो सकती है। परन्तु केवल मानसिक कर्मों से न दण्डकारण्य को शून्य किया जा सकता है और न अगस्त्य समुद्र को पी सकता है॥१०॥

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