Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 4/1

4/1
Sutra
जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः ।। ४.१ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः॥१॥

शब्दार्थ - (जन्म-औषधि-मन्त्र-तपः-समाधिजाः) जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि से (सिद्धयः) सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं।

सूत्रार्थ - पूर्व जन्म के संस्कारों से, औषधियों के सेवन से, गायत्री आदि मन्त्रों के जप से, तप से और समाधियों से 'सिद्धियाँ' उत्पन्न होती हैं।

Vyas Bhashya

देहान्तरिता जन्मना सिद्धिः। ओषधिभिरसुरभवनेषु रसायनेनेत्येवमादि। मन्त्रैराकाशगमनाणिमादिलाभः। तपसा संकल्पसिद्धिः कामरूपी यत्र तत्र कामग इत्येवमादि। समाधिजा: सिद्धयो व्याख्याताः॥१॥

व्या० भा० अ० - देहान्तर में (होने वाली) जन्म के द्वारा ( होने वाली) जन्मजा सिद्धि कही जाती है। चिकित्सालयों में औषधियों के द्वारा, रसायन के द्वारा, जो सिद्धि होती है इत्यादि। मन्त्रों के द्वारा आकाशगमन, अणिमा आदि की प्राप्ति होती है। तप से संकल्प की सिद्धि होती है, अभिलषित रूपवाला होकर जहाँ तहाँ कामना के अनुसार गमन करता है इत्यादि। समाधिज सिद्धियाँ पूर्वपाद में व्याख्यात हो चुकी हैं॥१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में पाँच प्रकार की सिद्धियों का कथन है। जन्मजा सिद्धि - जो जन्म से प्राप्त हो, वह 'जन्मजा-सिद्धि' कहाती है। जिस सिद्धि की प्राप्ति में इस वर्तमान जन्म में विशेष प्रयास न किया जाय, वह जन्म से प्राप्त सिद्धि है। पूर्वजन्मों में किये गये शुभकर्म, योग के स्वरूप का वर्णन करने वाले वेद व वेदानुकूल शास्त्रों का अध्ययनअध्यापन, यम-नियम आदि आठ अङ्गों का अनुष्ठान, विवेक, वैराग्य, सत्पुरुषों का सङ्ग। इस प्रकार के आचरण से संस्कार उत्पन्न होते हैं। वे संस्कार अल्प परिश्रम से ही सिद्धि की प्राप्ति में कारण होते हैं। संसार में देखा जाता है कि कई बार कुछ अच्छे पढ़े लोगों को ऐसी सफलता नहीं मिलती, जैसी अल्प पढ़े हुए को मिलती है। इसमें पूर्वजन्म के संस्कार कारण हैं। परन्तु इस जन्म में भी संस्कारों को उबुद्ध करने में कुछ प्रयास करना पड़ता है। यदि व्यक्ति उन संस्कारों को उद्बुद्ध करने में परिश्रम न करे और योग के विपरीत आचरण करना प्रारम्भ कर देवे तो पूर्वजन्म के संस्कार अभिभूत हो सकते हैं। इसलिये उन संस्कारों को उभारने के लिये परिश्रम करना आवश्यक है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि जन्म होते ही सिद्धि हो जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि व्यक्ति का जन्म होता है। उसके पश्चात् माता - पिता आदि उसको शिक्षा देते हैं और जब वह कुछ बड़ा हो जाता है, अच्छे प्रकार से सुनने, पढ़ने, विचारने आदि कार्यों को करने लग जाता है; तब विवेकपूर्वक शुभ कर्मों को करता है, अशुभ कर्मों को नहीं करता। ऐसे संस्कारवान, विवेकसम्पन्न व्यक्ति को वैराग्य और ईश्वरप्रणिधान के अभ्यास से अल्प काल में, अल्प- परिश्रम से समाधि की सिद्धि होती है। यह 'जन्मजा सिद्धि' है।औषधिजा सिद्धि - विशेष औषधियों के सेवन से, रसायन आदि के प्रयोग से तथा शुद्ध सात्त्विक भोजन से शरीर, इन्द्रियाँ स्वस्थ बलवान् हो जाते हैं। इसी को आयुर्वेद में कायाकल्प कहते हैं। औषधि से यह सिद्धि उत्पन्न होती है। इसीलिये 'औषधिजा सिद्धि' है। यहाँ पर यह बात ध्यान देने की है कि औषधि के साथ साथ भोजन, व्यायाम, ब्रह्मचर्य का पालन, दिनचर्या भी आवश्यक है।

मन्त्रजा सिद्धि - वेदों में जो शब्द समुदाय हैं, उनको मन्त्र कहते हैं और जिन विचारों के माध्यम से सूक्ष्म-विद्या की गवेषणा की जाती है, उनको भी मन्त्र कहते हैं। अर्थसहित गायत्री आदि मन्त्रों का जप करने से और उनके अनुसार आचरण करने से व्यक्ति का मन एकाग्र होता है, मन; इन्द्रियाँ वश में आते हैं। मन्त्रों में ईश्वर, जीव और प्रकृति के स्वरूप का वर्णन है। उन मन्त्रों का गम्भीरता से अध्ययन करने से इन तीनों पदार्थों का परिज्ञान होता है। भौतिक पदार्थों का भी परिज्ञान होता है। जिससे विविध प्रयोजनों की सिद्धि होती है। मन्त्र का एक अर्थ मनन, चिन्तन, विचार भी है। जब व्यक्ति जिज्ञासु होकर सूक्ष्मता से मनन- चिन्तन, ऊह-अपोह करता है तो विशेष ज्ञान और ज्ञान से विशेष पदार्थों की प्राप्ति होती है। इसलिये यह 'मन्त्रजा सिद्धि' है। परन्तु बिना अर्थ चिन्तन के केवल मन्त्रपाठ से कोई सिद्धि नहीं होती।

तपोजा सिद्धि - विद्या पढ़ने पढ़ाने, यमनियम का पालन करने आदि में सुख-दुःख, मानअपमान, शीतता-उष्णता, हानि-लाभ को प्रसन्नतापूर्वक सहन करना तप है। इनके अनुष्ठान से व्यक्ति का शरीर स्वस्थ, बलवान, दीर्घायु होता है। बुद्धि पवित्र होती है। अन्य लोगों पर वाणी का विशेष प्रभाव पड़ता है। मन में विद्यमान जन्म-जन्मान्तर के कुसंस्कारों का नाश और सुसंस्कारों की उत्पत्ति होती है। अधर्माचरण का परित्याग करके धर्माचरण करने में व्यक्ति अत्यन्त दृढ़ हो जाता है। यह 'तपोजा सिद्धि' है।

समाधिजा सिद्धि - समाधिजा सिद्धियों का वर्णन योग्यदर्शन के तीसरे पाद में कर दिया है। वहाँ पर देख लेवें॥१॥

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