इस सूत्र में निरोध परिणाम का स्वरूप बतलाया है। क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त चित्त की इन तीन अवस्थाओं में जो चित्त पर संस्कार पड़ते हैं, वे सम्प्रज्ञात समाधि की अपेक्षा से व्युत्थान संस्कार हैं। सम्प्रज्ञात समाधि अवस्था में जो चित्त पर संस्कार पड़ते हैं, वे असम्प्रज्ञात समाधि की अपेक्षा से व्युत्थान संस्कार कहे जाते हैं। व्युत्थान संस्कार चित्त का धर्म है और निरोध संस्कार भी चित्त का धर्म है। इन दोनों प्रकार के संस्कारों से चित्त सम्बद्ध रहता है। जब योगी ज्ञान, वैराग्य, अभ्यास से सम्प्रज्ञात समाधि के संस्कारों को रोक देता है तो निरोध संस्कार उत्पन्न होते हैं। निरोध संस्कारों के तीव्र होने से व्युत्थान संस्कार अभिभूत हो जाते हैं अर्थात् अपना कार्य करना छोड़ देते हैं। इस स्थिति में निरोध संस्कार अपना कार्य करना प्रारंभ कर देते है। यह है व्युत्थान संस्कारों का अभिभव और निरोध संस्कार का प्रादुर्भाव। निरोधकाल में चित्त इन दोनो प्रकार के संस्कारों से युक्त रहता है। यह चित्त का 'निरोध परिणाम' है।
चित्त में प्रतिक्षण सत्त्वादिगुणों में परिवर्तन होता रहता है, गुणों के इस परिवर्तन को भी इस सूत्रभाष्य में 'व्युत्थान संस्कार' के नाम से कहा गया है। ये संस्कार ज्ञानात्मक नहीं हैं। इसलिए वृत्तियों के रुक जाने पर भी ये नहीं रुकते। क्योंकि वृत्तियाँ इनका कारण नहीं हैं। किन्तु सत्त्व, रजस्, तमस् का स्वभाव ही इनका कारण है। यह व्युत्थान संस्कारों का अभिभव हो जाना और निरोध संस्कारों का प्रादुर्भाव होना योगी के प्रयत्न से होता है, स्वयं नहीं। जब सुषुप्ति अवस्था होती है जब योगी प्रयत्न नहीं करता तो निरोध संस्कार अभिभूत हो जाते हैं अर्थात् दब जाते हैं और व्युत्थान संस्कारों का प्रादुर्भाव हो जाता है। उस समय में निर्बीज समाधि नहीं रहती। जब योगी निद्रा से उठता है तो अपने प्रयत्न से व्युत्थान संस्कारों को रोक देता है और निरोध संस्कारों को उबुद्ध कर लेता है। तब निर्बीज समाधि प्रारम्भ हो जाती है। इससे यह बात भी ज्ञात होती है कि अनेक बार निर्बीज समाधि भङ्ग होती है और अनेक बार प्रयत्न से उसको सिद्ध किया जाता है। ऐसा नहीं जानना चाहिए कि एक बार असम्प्रज्ञात समाधि सिद्ध होते ही जीवात्मा का मोक्ष हो जाता है। असम्प्रज्ञात समाधि के समय ईश्वर का साक्षात्कार होता है। उससे क्लेशों की निवृत्ति, आनन्द, ज्ञान, निर्भयतादि गुणों की प्राप्ति होती है। जब निद्राकाल से योगी उठता है तो असम्प्रज्ञात समाधि में आनन्द, ज्ञान के अनुभव से उत्पन्न संस्कार के कारण शीघ्र ही असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त कर लेता है। योगाभ्यासी प्रथम क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त अवस्थाओं के संस्कारों को रोकता है, उसके पश्चात् सम्प्रज्ञात समाधि के संस्कारों को रोकता है। उनके रुक जाने से और
निरोध संस्कारों के जागृत होने से असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि होती है। इस निरोध परिणाम का वेद में वर्णन है -
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥ यजुर्वेद ४०/७॥
भावार्थ - (तत्र) उस परमात्मा आदि में (एकत्वम्) अद्वितीय भाव की (अनुपश्यतः) अनुकूल योगाभ्यास से साक्षात् देखते हुए योगिजन को (क) कौन (मोहः) मूढ़ावस्था और (क) कौन (शोकः) शोक वा क्लेश होता है अर्थात् कुछ भी नहीं।
-महर्षि दयानन्द वेदभाष्य
ईश्वर का साक्षात्कार हो जाने पर अविद्या और क्लेश नहीं रहते॥९॥