तस्य संयमस्य जितभूमेर्यानन्तरा भूमिस्तत्र विनियोगः। न ह्यजिताधरभूमिरनन्तरभूमिं विलङ्घ्य प्रान्तभूमिषु संयमं लभते। तदभावाच्च कुतस्तस्य प्रज्ञालोकः ! ईश्वरप्रसादाज्जितोत्तरभूमिकस्य च नाधरभूमिषु परचित्तज्ञानादिषु संयमो युक्तः। कस्मात् ? तदर्थस्यान्यत एवावगतत्वात्। भूमेरस्या इयमनन्तरा भूमिरित्यत्र योग एवोपाध्यायः। कथम् ? एवं ह्युक्तम् -
योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते।
योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम्॥इति॥६॥
व्या० भा० अ० - उस संयम की जितभूमि की जो अगली भूमि है उसमें विनियोग = प्रयोग करना चाहिये। निम्न भूमि को न जीतनेवाला योगी तदनंतर भूमि को छोड़कर अगली ऊँची भूमियों में संयम नहीं कर सकता। उस संयम के न होने से प्रज्ञा लोक: (उस योगी की प्रज्ञा का उत्कर्ष) कैसे हो सकता है ? ईश्वर की कृपा से अगली भूमियों को जीते हुए योगी का परचित्त ज्ञान आदि पिछली भूमियों में संयम अपेक्षित नहीं है। क्यों ? वह अर्थ (उत्तरभूमिजय) अन्य कारण (ईश्वरप्रसाद) ज्ञात होने से। इस भूमि के अनन्तर यह यह भूमि है इस विषय में योग ही गुरु मार्गदर्शक है। कैसे ? ऐसा ही कहा है -
योग, योग के द्वारा जानने योग्य है। योग, योग से आगे बढ़ता है। योग में जो अप्रमत्त = (असावधान नहीं होता) है, वह दीर्घकाल तक योग में रमण करता है अर्थात् योगजन्य आनन्द का अनुभव करता है॥६॥