Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/6

3/6
Sutra
तस्य भूमिषु विनियोगः ।। ३.६ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

तस्य भूमिषु विनियोगः॥६॥

शब्दार्थ - (तस्य) उस संयम का (भूमिषु) योगभूमियों अवस्थाओं में (विनियोगः) प्रयोग करना चाहिये। 

सूत्रार्थ - योग की स्थूल भूमियों में वश्यता प्राप्त होने पर उसके अनन्तर सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम भूमियों में संयम का प्रयोग करना चाहिये।

Vyas Bhashya

तस्य संयमस्य जितभूमेर्यानन्तरा भूमिस्तत्र विनियोगः। न ह्यजिताधरभूमिरनन्तरभूमिं विलङ्घ्य प्रान्तभूमिषु संयमं लभते। तदभावाच्च कुतस्तस्य प्रज्ञालोकः ! ईश्वरप्रसादाज्जितोत्तरभूमिकस्य च नाधरभूमिषु परचित्तज्ञानादिषु संयमो युक्तः। कस्मात् ? तदर्थस्यान्यत एवावगतत्वात्। भूमेरस्या इयमनन्तरा भूमिरित्यत्र योग एवोपाध्यायः। कथम् ? एवं ह्युक्तम् -

योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात्प्रवर्तते।
योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगे रमते चिरम्॥इति॥६॥

व्या० भा० अ० - उस संयम की जितभूमि की जो अगली भूमि है उसमें विनियोग = प्रयोग करना चाहिये। निम्न भूमि को न जीतनेवाला योगी तदनंतर भूमि को छोड़कर अगली ऊँची भूमियों में संयम नहीं कर सकता। उस संयम के न होने से प्रज्ञा लोक: (उस योगी की प्रज्ञा का उत्कर्ष) कैसे हो सकता है ? ईश्वर की कृपा से अगली भूमियों को जीते हुए योगी का परचित्त ज्ञान आदि पिछली भूमियों में संयम अपेक्षित नहीं है। क्यों ? वह अर्थ (उत्तरभूमिजय) अन्य कारण (ईश्वरप्रसाद) ज्ञात होने से। इस भूमि के अनन्तर यह यह भूमि है इस विषय में योग ही गुरु मार्गदर्शक है। कैसे ? ऐसा ही कहा है - 

योग, योग के द्वारा जानने योग्य है। योग, योग से आगे बढ़ता है। योग में जो अप्रमत्त = (असावधान नहीं होता) है, वह दीर्घकाल तक योग में रमण करता है अर्थात् योगजन्य आनन्द का अनुभव करता है॥६॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि उस विकसित बुद्धि का प्रयोग योग की भूमियों में (योग के भिन्न-भिन्न स्तरों में) करना चाहिये।

जब योगी को योग की एक स्थिति प्राप्त हो जाये तब आगे की स्थिति को प्राप्त करने के लिए उसे प्रज्ञालोक का प्रयोग करना चाहिये। कोई व्यक्ति पर्वत पर चढ़ना चाहता है तो अंधेरा होने पर उसको ऊपर चढ़ने के लिए दीपकादि की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार से ऊँचे T योग की प्राप्ति के लिये योगी को ऊँची बुद्धि की आवश्यकता होती है। इसलिये कहा है कि उस प्रज्ञालोक का योग की अवस्थाओं में प्रयोग करना चाहिये। योग की एक अवस्था को प्राप्त करके उसके पश्चात् उससे आगे की अवस्था को प्राप्त करने के लिये प्रयास करना चाहिये। यदि निकट वाली अवस्था को छोड़कर ऊँची ( दूर वाली) अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है तो योगी को उसमें सफलता नहीं मिलती। इसलिये क्रमशः योग की एक एक अवस्था

को प्राप्त करते हुए ही योगी को आगे की अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये। ईश्वरप्रणिधान से योगी को ईश्वर ज्ञान प्रदान करता है। उसके द्वारा आगे की भूमियों की प्राप्ति हो जाती है तो अन्य भूमियों में संयम करने की आवश्यकता नहीं हैं। इस योगभूमि के निकट यह आगे की भूमि है, इस विषय में योग को ही 'उपाध्याय' माना जाता है अर्थात् योग की एक अवस्था को प्राप्त करने पर उसके आगे की अवस्था ज्ञात होती है। जैसे सवितर्का समाधि की प्राप्ति होने पर निर्वितर्का समाधि को प्राप्त करने का सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है। इसलिये यह कहा जाता है कि योग ही योग का शिक्षक है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि योगविद्या का प्रशिक्षण देने वाले गुरु की आवश्यकता ही नहीं है। इसका तात्पर्य यह है कि योग की प्रथम अवस्था का अनुभव होने पर आगे की अवस्था का अनुभव स्वयं करना पड़ता है। केवल गुरु के उपदेशमात्र से वह अनुभव नहीं होता। योगविद्या का प्रशिक्षण देने वाला आचार्य शिष्य को उपदेश के माध्यम से योग के स्वरूप को बतला देता है। उस उपदेश के अनुसार आचरण करने से योग की भिन्न भिन्न अवस्थाओं का अनुभव साधक को स्वयं करना पड़ता है, जो व्यक्ति विधिपूर्वक योगाभ्यास करता है, उसको अवश्य ही सफलता मिलती है। कुछ लोग यह कहते हैं कि हमने योगाभ्यास किया और उसमें कोई सफलता नहीं मिली। सफलता न मिलने का कारण योग झूठा है ? ऐसा नहीं है; किन्तु योगाभ्यास विधिपूर्वक न करना, यहाँ कारण है॥६॥

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