Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/53

3/53
Sutra
जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः ।। ३.५३ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Inception

अव० - तस्य विषयविशेष उपक्षिप्यते -

अर्थ० - उस (विवेकज ज्ञान) का विषय विशेष उदाहृत किया जाता है।

Word Meaning

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः॥५३॥

शब्दार्थ - (जाति-लक्षण-देशैः) जाति, लक्षण और देश से (अन्यता-अनवच्छेदात्) भेद का निश्चय न होने से (तुल्ययोः) दो समान प्रतीत होने वाली वस्तुओं का (ततः) उस विवेकज ज्ञान से (प्रतिपत्ति:) पृथक् पृथक् निश्चय होता है।

सूत्रार्थ - जाति, लक्षण, देश से समान प्रतीत होने वाली दो वस्तुओं के भेद का ज्ञान न होने से उस विवेकज ज्ञान के द्वारा उन दोनों वस्तुओं में क्या विशेष अन्तर है, यह ज्ञान हो जाता है।

Vyas Bhashya

तुल्ययोर्देशलक्षणसारूप्ये जातिभेदोऽन्यताया हेतुर्गौरियं वडवेयमिति। तुल्यदेशजातीयत्वे लक्षणमन्यत्वकरं कालाक्षी गौः स्वस्तिमती गौरिति। द्वयोरामलकयोर्जातिलक्षणसारूप्याद्देशभेदोऽन्यत्वकर इदं पूर्वमिदमुत्तरमिति। यदा तु पूर्वमामलकमन्यव्यग्रस्य ज्ञातुरुत्तरदेश उपावर्त्यते तदा तुल्यदेशत्वे पूर्वमेतदुत्तरमेतदिति प्रविभागानुपपत्तिः। असंदिग्धेन च तत्त्वज्ञानेन भवितव्यमित्यत इदमुक्तं ततः प्रतिपत्तिर्विवेकजज्ञानादिति।

कथम् ? पूर्वामलकसहक्षणो देश उत्तरामलकसहक्षणाद्देशाद् भिन्नः। ते चामलके स्वदेशक्षणानुभवभिन्ने। अन्यदेशक्षणानुभवस्तु तयोरन्यत्वे हेतुरिति। एतेन दृष्टान्तेन परमाणोस्तुल्यजातिलक्षणदेशस्य पूर्वपरमाणुदेशसहक्षणसाक्षात्करणादुत्तस्य परमाणोस्तद्देशानुपपत्तावुत्तरस्य तद्देशानुभवो भिन्नः सहक्षणभेदात्तयोरीश्वरस्य योगिनोऽन्यत्वप्रत्ययो भवतीति।

अपरे तु वर्णयन्ति येऽन्त्या विशेषास्तेऽन्यताप्रत्ययं कुर्वन्तीति। तत्रापि देशलक्षणभेदो मूर्तिव्यवधिजातिभेदश्चान्यत्वे हेतुः। क्षणभेदस्तु योगिबुद्धिगम्य एवेति। अत उक्तं - मूर्तिव्यवधिजातिभेदाभावान्नास्तिमूलपृथक्त्वमिति वार्षगण्यः॥५३॥

व्या० भा० अ० दो समान पदार्थों के देश और लक्षण (आकार-रङ्ग-रूपादि के) समान होने पर उन दोनों की भिन्नता का हेतु जाति (होती है), जैसे कि यह गौ और यह घोड़ी है समानस्थान, समानजाति होने पर ( दोनों की) भिन्नता का हेतु लक्षण (होता है), जैसे कि काली आँख वाली गौ, स्वस्तिक चिह्न वाली गौ। जाति और लक्षण के समान होने पर दो आँवलों की

भिन्नता का हेतु देश की भिन्नता होगी, जैसे कि यह पूर्ववर्ती है, यह उत्तरवर्ती है। जब तो पूर्ववर्ती आँवला ज्ञाता के अन्य विषय में आसक्त होने पर उत्तर देश में रखा जाता है तब दोनों आँवलों के समान देशस्थ होने पर यह पूर्ववर्ती है ऐसा विभाग ज्ञात नहीं होता। तत्त्वज्ञान सन्देहरहित होता है इसलिए यह कहा गया है कि 'विवेकज ज्ञान' से ज्ञात होता है।

कैसे ? पूर्ववर्ती आँवले के साथ के क्षणों वाला देश उत्तरवर्ती आँवले के साथ के क्षणों वाले देश से भिन्न है। और वे आँवले अपने अपने देशों के अनुभवों के कारण भिन्न हैं। अन्य देशों के क्षणों का अनुभव ही उन दोनों (आँवलों) के अन्यत्व में हेतु है। इस दृष्टान्त से परमाणु के समान जाति, समान लक्षण, समान देश वाले परमाणु का पूर्ववर्ती परमाणु के देश के साथ वाले क्षणों का साक्षात्कार होने से उत्तरवर्ती परमाणु का वह (पूर्व) देश न होने पर (उत्तर) देश का ( क्षणों के साथ वाला) अनुभव भिन्न होता है, साथ वाले क्षणों का भेद होने से उन दोनों परमाणुओं की भिन्नता का ज्ञान ऐश्वर्यवान् योगी को होता है।

अन्य लोग तो वर्णन करते हैं - जो अन्तिम विशेष होते हैं वे भिन्नत्व उत्पन्न करते हैं। वहाँ भी देशभेद, लक्षणभेद, मूर्ति (अवयव सन्निवेश) भेद, व्यवधान (जनित) भेद और जाति भेद अन्यता में हेतु है। क्षण (गत) भेद तो योगि-बुद्धि द्वारा ही ज्ञेय होता है। इसलिए आचार्य वार्षगण्य ने कहा है कि मूर्ति, व्यवधान, जाति (जनित) भेद के न होने से मूल (प्रकृति) में पृथक्ता नहीं है॥५३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में विवेकज ज्ञान का फल बतलाया है। पदार्थों के स्वरूप का भेद जाने वाले तीन कारण हैं। जाति, लक्षण और देश। 

(१) जाति एक ही स्थान में गौ और भैंस खड़ी हों तो उनका भेदज्ञान 'जाति' से होता है कि यह गौ है और यह भैंस है। जो अनेक पदार्थों में एक बुद्धि (ज्ञान) को उत्पन्न करती है, वह जाति कहाती है।

(२) लक्षण एक ही जाति की भिन्न-भिन्न रंग वाली गौएं हों तो उनके भिन्नत्व का ज्ञान लक्षण से होता है। जैसे यह काले रंग की गौ है और यह श्वेत रंग की गौ है। यहाँ पर पृथक्त्व ज्ञान का कारण लक्षण है।

(३) देश - जाति एक होने पर भी एक गौ पूर्व देश में हो और दूसरी पश्चिम देश में हो तो उनके पृथक्त्व का ज्ञान देश (स्थान) से होता है। जाति व लक्षण एक होने पर भी दो आँवलों को देशभेद से पृथक्-पृथक् जाना जाता है। यदि उन दोनों आँवलों को उस देश से हटाकर किसी अन्य देश में रख दिया जाए, जहाँ रखने पर उनको पहले भिन्न-भिन्न देशों में देखने वाला न देख सके। अथवा उनको भिन्न भिन्न देशों में देखने वाले की दृष्टि से बचाकर उन आँवलों का देश परस्पर परिवर्तित कर दिया जाए। अर्थात् जो आँवला पहले पूर्व दिशा में रखा था उसको पश्चिम में रख दिया जाय और जो पश्चिम में रखा था, उसको पूर्व में रख दिया जाय, तो उनको भिन्न-भिन्न देशों में देखने वाले को यह ज्ञान होना कठिन है कि पहले कौन सा आँवला किसदेश में रखा था। परन्तु इन दोनों के पृथक्त्व का ज्ञान 'विवेकज ज्ञान' से हो जाता है। इसका कारण भाष्यकार ने यह बतलाया है कि उत्तर आँवले के क्षण सहित देश से पूर्व आँवले का क्षण सहित देश भिन्न है। जब वे आँवले अपने अपने देश - क्षण अनुभव में भिन्न भिन्न हैं, तब उन दोनों के देश, क्षण का अनुभव उन दोनों के भेद का कारण है। इसी दृष्टान्त के समान तुल्य जाति, लक्षण, देश वाले परमाणुओं में, पूर्व देश वाले परमाणुओं के देश, क्षणों सहित साक्षात्कार करने से, उस उत्तर देश वाले परमाणुओं का वह देश निश्चय न होने पर उत्तर वाले देश का भिन्न अनुभव क्षणों सहित भेद से होता है। उन दोनों देश क्षणों सहित परमाणुओं के ज्ञान में समर्थ योगी को ही उन दोनों के भेद का ज्ञान होता है।

यहाँ पर एक बात विचारणीय है। योगी के समक्ष दो आँवले रख दिये जायें। एक पूर्व दिशा में और एक पश्चिम दिशा में। उन दोनों आँवलों को वहाँ से उठाकर परोक्ष में रख दिया जाये, जहाँ पर वह योगी उनको नहीं देख सके। उसके पश्चात् जो आँवला पूर्व दिशा में रखा था, उसको पश्चिम दिशा में रख दिया जाय और जो पश्चिम दिशा में रखा था, उसको पूर्व दिशा में रख दिया जाय। योगी ने उन दोनों आँवलों का अनुभव भिन्न भिन्न देश क्षण सहित किया था। इसी आधार पर योगी की दृष्टि से परोक्ष में रखने से पूर्व जो आँवला जिस दिशा में रखा था उसको योगी 'विवेकज ज्ञान' से जान जाता है। उन दोनों आँवलों की दिशा को परिवर्तित करने पर योगी उनको धर्म, लक्षण, अवस्था परिणामों के आधार पर जानता है अथवा अन्य किसी कारण के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है।

पिछले सूत्र के भाष्य में भाष्यकार ने परमाणु के एक देश से अन्य देश में गति करने में लगने वाले काल को 'क्षण' कहा है। यहाँ पर 'परमाणु' का अर्थ है पाँच भूतों के सूक्ष्म अंश, जिन का उपादान कारण तन्मात्रायें हैं और जिन से पृथिवी आदि भूतों की उत्पत्ति होती है॥५३॥

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