तुल्ययोर्देशलक्षणसारूप्ये जातिभेदोऽन्यताया हेतुर्गौरियं वडवेयमिति। तुल्यदेशजातीयत्वे लक्षणमन्यत्वकरं कालाक्षी गौः स्वस्तिमती गौरिति। द्वयोरामलकयोर्जातिलक्षणसारूप्याद्देशभेदोऽन्यत्वकर इदं पूर्वमिदमुत्तरमिति। यदा तु पूर्वमामलकमन्यव्यग्रस्य ज्ञातुरुत्तरदेश उपावर्त्यते तदा तुल्यदेशत्वे पूर्वमेतदुत्तरमेतदिति प्रविभागानुपपत्तिः। असंदिग्धेन च तत्त्वज्ञानेन भवितव्यमित्यत इदमुक्तं ततः प्रतिपत्तिर्विवेकजज्ञानादिति।
कथम् ? पूर्वामलकसहक्षणो देश उत्तरामलकसहक्षणाद्देशाद् भिन्नः। ते चामलके स्वदेशक्षणानुभवभिन्ने। अन्यदेशक्षणानुभवस्तु तयोरन्यत्वे हेतुरिति। एतेन दृष्टान्तेन परमाणोस्तुल्यजातिलक्षणदेशस्य पूर्वपरमाणुदेशसहक्षणसाक्षात्करणादुत्तस्य परमाणोस्तद्देशानुपपत्तावुत्तरस्य तद्देशानुभवो भिन्नः सहक्षणभेदात्तयोरीश्वरस्य योगिनोऽन्यत्वप्रत्ययो भवतीति।
अपरे तु वर्णयन्ति येऽन्त्या विशेषास्तेऽन्यताप्रत्ययं कुर्वन्तीति। तत्रापि देशलक्षणभेदो मूर्तिव्यवधिजातिभेदश्चान्यत्वे हेतुः। क्षणभेदस्तु योगिबुद्धिगम्य एवेति। अत उक्तं - मूर्तिव्यवधिजातिभेदाभावान्नास्तिमूलपृथक्त्वमिति वार्षगण्यः॥५३॥
व्या० भा० अ० दो समान पदार्थों के देश और लक्षण (आकार-रङ्ग-रूपादि के) समान होने पर उन दोनों की भिन्नता का हेतु जाति (होती है), जैसे कि यह गौ और यह घोड़ी है समानस्थान, समानजाति होने पर ( दोनों की) भिन्नता का हेतु लक्षण (होता है), जैसे कि काली आँख वाली गौ, स्वस्तिक चिह्न वाली गौ। जाति और लक्षण के समान होने पर दो आँवलों की
भिन्नता का हेतु देश की भिन्नता होगी, जैसे कि यह पूर्ववर्ती है, यह उत्तरवर्ती है। जब तो पूर्ववर्ती आँवला ज्ञाता के अन्य विषय में आसक्त होने पर उत्तर देश में रखा जाता है तब दोनों आँवलों के समान देशस्थ होने पर यह पूर्ववर्ती है ऐसा विभाग ज्ञात नहीं होता। तत्त्वज्ञान सन्देहरहित होता है इसलिए यह कहा गया है कि 'विवेकज ज्ञान' से ज्ञात होता है।
कैसे ? पूर्ववर्ती आँवले के साथ के क्षणों वाला देश उत्तरवर्ती आँवले के साथ के क्षणों वाले देश से भिन्न है। और वे आँवले अपने अपने देशों के अनुभवों के कारण भिन्न हैं। अन्य देशों के क्षणों का अनुभव ही उन दोनों (आँवलों) के अन्यत्व में हेतु है। इस दृष्टान्त से परमाणु के समान जाति, समान लक्षण, समान देश वाले परमाणु का पूर्ववर्ती परमाणु के देश के साथ वाले क्षणों का साक्षात्कार होने से उत्तरवर्ती परमाणु का वह (पूर्व) देश न होने पर (उत्तर) देश का ( क्षणों के साथ वाला) अनुभव भिन्न होता है, साथ वाले क्षणों का भेद होने से उन दोनों परमाणुओं की भिन्नता का ज्ञान ऐश्वर्यवान् योगी को होता है।
अन्य लोग तो वर्णन करते हैं - जो अन्तिम विशेष होते हैं वे भिन्नत्व उत्पन्न करते हैं। वहाँ भी देशभेद, लक्षणभेद, मूर्ति (अवयव सन्निवेश) भेद, व्यवधान (जनित) भेद और जाति भेद अन्यता में हेतु है। क्षण (गत) भेद तो योगि-बुद्धि द्वारा ही ज्ञेय होता है। इसलिए आचार्य वार्षगण्य ने कहा है कि मूर्ति, व्यवधान, जाति (जनित) भेद के न होने से मूल (प्रकृति) में पृथक्ता नहीं है॥५३॥