इस सूत्र में यह बतलाया है कि क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेकज ज्ञान उत्पन्न होता है।
जैसे मिट्टी के ढेले का विभाग करते-करते अन्त में वह इतना सूक्ष्म हो जाय कि पुनः उसका विभाग न हो सके वह द्रव्य 'परमाणु' कहाता है। वैसे ही समय का विभाग करते जाने पर उसका जो सबसे छोटा भाग हो, वह क्षण (काल) है। अथवा जितने समय में चला हुआ परमाणु पूर्व देश को त्याग कर उत्तर देश को प्राप्त होता है, वह क्षण है। उन क्षणों का जो प्रवाह (नैरन्तर्य ) है तारतम्य है, उसका विच्छेद न होना 'क्रम' है। क्षण और क्षणों के अव्यवहित आनन्तर्य (क्रम) में वस्तु समाहार-वस्तु रूप में समुदाय नहीं है। मुहूर्त, दिन, रात्रि आदि जो स्थूल काल है, वह बौद्धिक दृष्टि से काल का समुदाय माना जाता है। वास्तव में वह काल और क्रम का समुदाय नहीं है। क्योंकि सभी क्षण और क्रम एक समय में एकत्रित नहीं हो सकते। उस क्षण काल का वस्तु समुदाय न होने पर भी अर्थात् अनेक क्षणों का वस्तु रूप में एक काल नहीं होता, फिर भी साधारण लोगों को वह वस्तु रूप में दिखाई देता है।
क्षण तो वस्तु कोटि में आता है और वह क्रम का आश्रय है। अर्थात् क्षण वास्तविक काल है। यदि क्षण को भी मुहूर्त आदि की भाँति काल्पनिक माना जाय तो क्रम का आश्रय कोई भी नहीं होगा। क्रम का यह अर्थ है कि वह क्षणों के आनन्तर्य रूप में रहता है अर्थात् क्षणों के साथ आबद्ध रहता है, क्षणों के आधीन रहता है। जो भूत एवं भावी क्षण हैं वे अतीत लक्षण परिणाम तथा अनागत लक्षण परिणाम में सामान्य रूप से अनुगत जानने चाहिए। एक ही क्षण से सम्पूर्ण लोक परिणाम का अनुभव करता है अर्थात् क्षण क्षण में परिवर्तन को प्राप्त होता है। सभी पदार्थ वर्तमान क्षण पर ही आरूढ़ रहते हैं अर्थात् क्षण काल से बाहर नहीं जा सकते। उन क्षणों तथा उनके क्रम में संयम करने से उनका साक्षात्कार होता है। उससे विवेकज ज्ञान की उत्पत्ति होती है।।
जब कोई भी वस्तु उत्पन्न होती है, तब वह नवीन दिखाई देती है। कालान्तर में वह पुरानी दिखाई देती है। प्रारम्भ में दृढ़ होती है, लम्बे काल के पश्चात् वह निर्बल हो जाती है। यदि बहुत अधिक काल तक उसको रखा जाय तो जीर्ण-शीर्ण हो जाती है। उसको हाथ से पकड़ कर उठाया जाए तो उसका चूर्ण हो जाता है। इससे यह ज्ञात होता है कि उत्पन्न हुए घट, पट, पत्थरादि पदार्थ क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त होते रहते हैं। उनमें परिवर्तन होता रहता है। यह परिवर्तन तत्काल नहीं होता, धीरे धीरे होता है। इससे यह परिणाम निकलता है कि महत्तत्व से लेकर मानव शरीर पर्यन्त सभी पदार्थ क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त हो रहे हैं। कालान्तर में उन सबका विनाश हो जायेगा और जीवात्मा और परमात्मा, क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त नहीं होते, इसलिए वे विनाशरहित हैं। इससे यह भी लाभ होता है कि सांसारिक पदार्थों में व्यक्ति की आसक्ति नहीं होती और उन पदार्थों में स्व-स्वामी सम्बन्ध भी नहीं रहता। स्व स्वामी सम्बन्ध के न रहने से व्यक्ति का अभिमान नष्ट हो जाता है॥५२॥