Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/51

3/51
Sutra
स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ।। ३.५१ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्॥५१॥

शब्दार्थ - (स्थानि-उपनिमन्त्रणे) उच्च स्थान प्राप्त व्यक्तियों के द्वारा निमन्त्रित किये जाने पर (सङ्ग-स्मय-अकरणम्) आसक्ति और अभिमान नहीं करना चाहिये। (पुनः) ऐसा करने से पुन: (अनिष्ट-प्रसङ्गात्) योगमार्ग से विचलित होने का अवसर उपस्थित होने से।

सूत्रार्थ - समाज में उच्च स्थान प्राप्त लौकिक व्यक्तियों अर्थात् राजा-महाराजा, धनबल, ऐश्वर्य सम्पन्न व्यक्तियों के द्वारा निमन्त्रित किये जाने पर आसक्ति और अभिमान नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा करने से योगी के योगमार्ग से विचलित होने का अवसर उपस्थित हो जाता है।

Vyas Bhashya

चत्वारः खल्वमी योगिनः प्रथमकल्पिको मधुभूमिकः प्रज्ञाज्योतिरतिक्रान्तभावनीयश्चेति। तत्राभ्यासी प्रवृत्तमात्रज्योतिः प्रथमः। ऋतम्भरप्रज्ञो द्वितीयः। भूतेन्द्रियजयी तृतीयः सर्वेषु भावितेषु भावनीयेषु कृतरक्षाबन्धः कृतकर्तव्यसाधनादिमान्। चतुर्थो यस्त्वतिक्रान्तभावनीयः, तस्य चित्तप्रतिसर्ग एकोऽर्थः सप्तविधास्य प्रान्तभूमिप्रज्ञा।

तत्र मधुमतीं भूमिं साक्षात्कुर्वतो ब्राह्मणस्य स्थानिनो देवाः सत्त्वविशुद्धिमनुपश्यन्तः स्थानैरुपनिमन्त्रयन्ते-भो इहास्यतामिह रम्यतां, कमनीयोऽयं भोगः, कमनीयेयं कन्या, रसायनमिदं जरामृत्यू बाधते वैहायसमिदं यानममी कल्पद्रुमाः, पुण्या मन्दाकिनी, सिद्धा महर्षयः, उत्तमा अनुकूला अप्सरसो, दिव्ये श्रोत्रचक्षुषी, वज्रोपमः कायः स्वगुणैः सर्वमिदमुपार्जितमायुष्मता प्रतिपद्यतामिदमक्षयमजरममरस्थानं देवानां प्रियमिति।

एवमभिधीयमानः सङ्गदोषान्भावयेद्-घोरेषु संसाराङ्गारेषु पच्यमानेन मया जननमरणान्धकारे विपरिवर्तमानेन कथञ्चिदासादितः क्लेशतिमिरविनाशी योगप्रदीपः। तस्य चैते तृष्णायोनयो विषयवायवः प्रतिपक्षाः। स खल्वहं लब्धालोकः कथमनया विषयमृगतृष्णया वञ्चितस्तस्यैव पुनः प्रदीप्तस्य संसाराग्नेरात्मानमिन्धनीकुर्यामिति। स्वस्ति वः स्वप्नोपमेभ्यः कृपणजनप्रार्थनीयेभ्यो विषयेभ्य इत्येवं निश्चितमतिः समाधिं भावयेत्।

सङ्गमकृत्वा स्मयमपि न कुर्यादेवमहं देवानामपि प्रार्थनीय इति। स्मयादयं सुस्थितं मन्यतया मृत्युना केशेषु गृहीतमिवात्मानं न भावयिष्यति। तथा चास्य च्छिद्रान्तरापेक्षी नित्यं यत्नोपचर्यः प्रमादो लब्धविवरः क्लेशानुत्तम्भयिष्यति। ततः पुनरनिष्टप्रसङ्गः। एवमस्य सङ्गस्मयावकुर्वतो भावितोऽर्थो दृढी भविष्यति। भावनीयश्चार्थोऽभिमुखीभविष्यति॥५१॥

व्या० भा० अ० प्राथमकल्पिक, मधुभूमिक, प्रज्ञाज्योति और अतिक्रान्तभावनीय नाम से वे योगी चार (प्रकार के) हैं। उनमें से प्रथम (प्रकार का योगी) अभ्यास करने वाला, ज्योति जिसको प्रवृत्तमात्र हुई हो। द्वितीय ऋतम्भरा प्रज्ञा वाला, तृतीय (वह जो कि) भूतों एवं इन्द्रियों पर जय प्राप्त करने वाला, सम्पादित, असम्पादित सब विषयों में आत्मरक्षार्थ कृत-रक्षा-बन्ध विहित साधनानुष्ठानादि से युक्त है। चतुर्थ अतिक्रान्तभावनीय है, उसका चित्त का प्रलय एक ही प्रयोजन शेष रहता है। इस योगी की सात प्रकार की प्रान्त भूमि प्रज्ञा होती है।

उनमें से मधुमती भूमि का साक्षात्कार करने वाले ब्राह्मण की सत्त्वशुद्धि को देखते हुवे स्थान से सम्बद्ध देव, स्थानों के द्वारा निमन्त्रण करते हैं - श्रीमान् जी ! यहाँ बैठिए, यहाँ रमण करिए, यह भोग कामना करने योग्य है, यह कन्या सुन्दरी है, यह रसायन है जरा-मृत्यु को दूर करता है, यह आकाशीय विमान है, ये कल्पवृक्ष है, यह पावन नदी है, सिद्ध महर्षि हैं, श्रेष्ठ अनुकूल अप्सराएँ हैं, दिव्य श्रोत्र एवं चक्षु है, वज्र के समान (दृढ़) काया है। आपके द्वारा यह सारा उपार्जित है, यह देवताओं के लिए प्रिय अविनश्वर, अजर, अमर स्थान है।

इस प्रकार कहा जाता हुआ (योगी) सङ्गदोषों की भावना करे कि " भीषण संसार रूपी अङ्गारों में जलते हुवे जन्ममरण के अन्धकार में पड़ने वाले मैंने क्लेशान्धकार को नष्ट करने वाले योगप्रदीप को किसी प्रकार से प्राप्त किया है। तृष्णा को उत्पन्न करने वाले ये विषयवायु उसके विरोधी है। वह मैं प्रासप्रकाश इस विषय मृगतृष्णा से वञ्चित होकर पुन: किस प्रकार अपने को प्रज्वलित संसाराग्नि का इन्धन बनाऊँ।" हे निम्नजनों के द्वारा प्रार्थनीय स्वप्न सदृश विषयों ! ('आप मुझसे दूर ही रहें, मैं आप का संग नहीं करूंगा) आप का कल्याण हो', इस प्रकार स्थिर बुद्धि होकर (योगी) समाधि का अभ्यास करें।

(विषयों का) सङ्ग न करके ऐसा गर्व भी न करे कि मैं देवों का भी प्रार्थनीय हो गया हूँ। गर्व से अपने को महान् मानने के कारण (योगी) मृत्यु के द्वारा पकड़े गए बाल वाले के समान समाधि को सम्पादित नहीं करेगा। इस प्रकार दूसरे छिद्रों की प्रतीक्षा करने वाला प्रमाद, जो कि प्रतिदिन प्रयत्न से दूर किये जाने योग्य (होता है वह) अवकाश प्राप्त करके क्लेशों को उभारेगा। उससे फिर अनिष्ट की प्राप्ति होगी। इस प्रकार (विषयों का) सङ्ग और गर्व न करने वाले (योगी) की सम्पादित समाधि दृढ़ होगी। सम्पादनीय समाधि सम्मुख होगी॥५१॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि योगी का सम्मान होने पर और विषय भोग के साधनों की प्राप्ति होने पर, यदि वह भोगों में आसक्त होता है और अभिमान करता है तो अनिष्ट को प्राप्त हो जाता है।योगी चार प्रकार के होते हैं। प्राथमकल्पिक। मधुभूमिक। प्रज्ञाज्योति। अतिक्रान्तभावनीय। 

(१) जो यमनियमादि आठ अङ्गों का अनुष्ठान करते हुए वितर्क समाधि तक पहुँचा है। परन्तु यह उसकी प्रारम्भिक अवस्था है। अभी कोई विशेष सिद्धि उपलब्ध नहीं हुई है। यह प्राथमकल्पिक है।

(२) जिसने सम्प्रज्ञात समाधि की ऊँची अवस्था प्राप्त कर ली है, वह ऋतम्भरप्रज्ञ है, इसका नाम मधुभूमिक है।

(३) जो योग के साधनों का अभ्यास करते-करते भूतेन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुका है और योगाभ्यासी के समक्ष आने वाली बाधाओं से पार हो गया है। वह प्रज्ञाज्योति कहलाता है। 

(४) जो योगाभ्यास के ऊँचे स्तर को प्राप्त हो गया है अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि की ऊँची अवस्था में पहुँच गया है, चित्त को प्रकृति में लीन करना ही जिसका एक प्रयोजन शेष है। जिसकी सात प्रकार की उत्कृष्ट प्रज्ञा होती है, वह अतिक्रान्तभावनीय है। सात प्रकार की प्रान्तभूमि प्रज्ञा का स्वरूप २।२७ वे सूत्र में लिख दिया है, वहाँ पर देख लेवें।

इन चार प्रकार के योगियों में से 'मधुभूमिक योगी' को उसके कल्याण की भावना से सूत्रकार एवं भाष्यकार ने सावधान किया है कि योगी की विशेषताओं को देखकर लौकिक साधनों से सम्पन्न व्यक्ति उसको कहते हैं कि आप महान् हैं। आपने शारीरिक बल, विद्या, धर्म से स्वयं को ऊँचा उठाया है। इसलिये ये सब प्रकार के सुख के साधन हैं। इनका आप अपनी इच्छानुसार भोग कीजिये। ऐसी स्थिति में योगी उन लौकिक सुख और सुख के साधनों में आसक्त न होवे। और न यह माने कि ‘मैं महान् लोगों का भी पूज्य हो सकता हूँ' अर्थात् योगी अपनी योग की स्थिति को छोड़कर भोग की स्थिति में आ सकता है। इसलिये इस अनिष्ट से अपनी रक्षा के लिये योगी इस प्रकार से विचार करे कि मैं संसार के क्लेशों से सन्तप्त था। उनसे बचने के लिये मैंने योग की शरण प्राप्त की है। यदि मैं पुनः भोगों में पहूँगा तो मुझे महान् दुःख भोगने पड़ेंगे। ऐसा विचार करने से वह सब क्लेशों का नाश और आनन्द की प्राप्ति करवाने वाले योगमार्ग का परित्याग करके भोगों में आसक्त नहीं होता और न ही अभिमान करता है।

यहाँ पर 'ऋतम्भरप्रज्ञ योगी' को अनिष्ट से बचाने के लिये भोगों में आसक्त न होना और अभिमान न करना बतलाया है। उसको भोगों से आसक्ति को रोकने के लिये सदा उसे भोगों में चार प्रकार के दुःख को देखते रहना चाहिये। दर्शनकार ने पिछले पाद के १५ वें सूत्र में कहा हैकि परिणाम दुःख, ताप दुःख, संस्कार दुःख और गुणवृत्तिविरोध दुःख, ये संसार के प्रत्येक सुख में मिश्रित रहते हैं। ऐसा जानने से भोगों में आसक्ति नहीं होती। जब योगी इस बात को भूल जाता है तो भोगों में आसक्ति होती है। अभिमान से अपनी रक्षा करने का उपाय यह है कि जितने भी सृष्टि के पदार्थ हैं उनका बनाने वाला, उनकी रक्षा करने वाला और समस्त विद्याओं को तथा आनन्द को देने वाला ईश्वर है। इन सभी पदार्थों का तथा विद्या का स्वामी भी ईश्वर ही है, ऐसा जानने से मिथ्याभिमान नहीं हो सकता। जो योगी सदा ईश्वर समर्पित रहता है और उसी की उपासना करता है। उसके मन में न विषयासक्ति उत्पन्न होती है और न अभिमान ही होता है॥५१॥

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