Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/49

3/49
Sutra
सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वंसर्वज्ञातृत्वं च ।। ३.४९ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च॥४९॥ 

शब्दार्थ – (सत्त्व-पुरुष-अन्यता-ख्यातिमात्रस्य) बुद्धि और पुरुष जीव की भिन्नता जानने वाले योगी को (सर्व-भाव-अधिष्ठातृत्वम्) अनेक पदार्थों का स्वामित्व (सर्व-ज्ञातृत्वम् च) और अनेक वस्तुओं का विशेष ज्ञान प्राप्त होता है।

सूत्रार्थ - बुद्धि और जीव की भिन्नता जानने वाले योगी को अनेक पदार्थों का स्वामित्व प्राप्त होता है अर्थात् मन, बुद्धि, शरीर आदि पदार्थों का नियन्त्रणपूर्वक संचालक हो जाता है तथा अनेक वस्तुओं का अर्थात् मन, इन्द्रिय, शरीर तथा जीवात्मादि अनेक पदार्थों का ज्ञान होता है।

Vyas Bhashya

निर्धूतरजस्तमोमलस्य बुद्धिसत्त्वस्य परे वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्तमानस्य सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्ररूपप्रतिष्ठस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वम्। सर्वात्मानो गुणा व्यवसायव्यवसेयात्मकाः स्वामिनं क्षेत्रज्ञं प्रत्यशेषदृश्यात्मत्वेनोपस्थिता इत्यर्थः। सर्वज्ञातृत्वं सर्वात्मनां गुणानां शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मत्वेन व्यवस्थितानामक्रमोपारूढं विवेकजं ज्ञानमित्यर्थं इति। एषा विशोका नाम सिद्धिय प्राप्य योगी सर्वज्ञः क्षीणक्लेशबन्धनो वशी विहरति॥४९॥

व्या० भा० अ० - रजस्-तमस् के मलों से रहित बुद्धि नामक पदार्थ के अत्यन्त शुद्ध होने पर, उत्कृष्ट वशीकार संज्ञा (वैराग्य) में स्थित, बुद्धि और पुरुष के अन्यत्व की ख्यातिमात्र के रूप में स्थित (योगी) को सब पदार्थों पर आधिपत्य (होता है)। ज्ञानात्मक एवं ज्ञेयात्मक सब प्रकार के गुण स्वामी-क्षेत्रज्ञ-(योगी) के प्रति सम्पूर्ण योग्य पदार्थों के रूप में उपस्थित होते हैं। सर्वज्ञातृत्वभूत, वर्तमान तथा भविष्यत् धर्मों के रूप में स्थित सभी रूपों वाले गुणों का बिना क्रम के (एक साथ) विवेकजनित ज्ञान होता है। यह 'विशोका' नामक सिद्धि है जिसको प्राप्त करके सर्वज्ञ, क्षीण-क्लेश-बन्धन वाला योगी, वशी होकर विचरण करता है॥४९॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि बुद्धि और आत्मा को पृथक्-पृथक् जानने वाले योगी को दो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। रजोगुण, तमोगुण के मलों से बुद्धि के अत्यन्त शुद्ध हो जाने पर उत्कृष्ट वैराग्य की प्राप्ति होने पर, बुद्धि और पुरुषान्यताख्याति रूप में प्रतिष्ठित योगी को 'सर्वभावाधिष्ठातृत्व' और 'सर्वज्ञातृत्व' सिद्धियाँ प्राप्त होती है।

पहली सिद्धि 'सर्वभावाधिष्ठातृत्व' है - इसका अर्थ यह है कि योगी के अपने से सम्बद्ध जो पदार्थ हैं, जैसे बुद्धि अहंकार मन, इन्द्रियाँ, शरीरादि। इन सब पदार्थों का योगी अधिष्ठाता बन जाता है अर्थात् इन सबको अपने वश में रखकर धर्म मार्ग पर चलाता है। कुछ बाहर के पदार्थों को जैसे कि पृथिवी, जलादि एवं उनसे बने पदार्थों को अपने अधिकार में रख कर योगी संसार के कल्याण के लिए उनका उचित प्रयोग कर सकता है। जन समुदाय को भी अपने अधिकार में रख कर उसे मोक्षमार्ग पर चला सकता है। परन्तु वह प्रकृति, विकृति, लोक-लोकान्तर आदि समस्त पदार्थों का अधिष्ठाता नहीं बन सकता। उनका अधिष्ठाता तो केवल ईश्वर ही है। क्योंकि वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ है।

दूसरी सिद्धि 'सर्वज्ञातृत्व' है - सत्त्वादि तीन गुणों से उत्पन्न एवं भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल में विद्यमान पदार्थों का योगी ज्ञाता बन जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि तीनों कालों में जो पदार्थ विद्यमान रहते हैं उनमें से अनेक पदार्थों का विशेष ज्ञान योगी को प्राप्त होता है।

अन्य लोगों की अपेक्षा योगी को अधिक ज्ञान होता है। परन्तु सम्पूर्ण पदार्थों का ज्ञान योगी को नहीं हो सकता क्योंकि योगी एकदेशी है। समस्त पदार्थों का पूर्णज्ञान तो केवल ईश्वर को ही हो सकता है। क्योंकि ईश्वर चेतन व सर्वव्यापक है। योगी को सर्वज्ञ इसलिए कहा जाता है कि वह मोक्ष के लिए जितना ज्ञान अपेक्षित है उस सबको प्राप्त कर लेता है। योगी के इस ज्ञान को 'विवेकज ज्ञान' कहते हैं। यह 'विशोका' नाम की सिद्धि है। जिसको प्राप्त करके योगी सर्वज्ञ, क्षीणक्लेशबन्धन वाला होकर स्वतंत्र विचरता है॥४९॥

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