Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/48

3/48
Sutra
ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च ।। ३.४८ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च॥४८॥

शब्दार्थ - (ततः) उस इन्द्रियजय से (मनोजवित्वम्) मनोजवित्व (विकरण-भावः) विकरणभाव (प्रधान-जयः-च) और प्रधानजय सिद्धियाँ होती हैं।

सूत्रार्थ – 'मनोजवित्व' अर्थात् योगी के शरीर की गति का अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक होना, ‘विकरणभाव' अर्थात् इन्द्रियों का विशेष शक्ति से युक्त हो जाना 'प्रधानजय' अर्थात् प्राकृतिक पदार्थों का उचित उपयोग कर अपने प्रयोजन को सिद्ध करने में समर्थ हो जाना, ये उपरोक्त 'इन्द्रियजय' से होते हैं।

Vyas Bhashya

कायस्यानुत्तमो गतिलाभो मनोजवित्वम्। विदेहानामिन्द्रियाणामभिप्रेतदेशकालविषयापेक्षो वृत्तिलाभो विकरणभावः। सर्वप्रकृतिविकारवशित्वं प्रधानजय इति। एतास्तिस्रः सिद्धयो मधुप्रतीका उच्यन्ते। एताश्च करणपञ्चकस्वरूपजयादधिगम्यन्ते॥४८॥

व्या० भा० अ० - शरीर की अत्युत्तम गति का लाभ 'मनोजवित्व' कहलाता है। शरीर की अपेक्षा न रखने वाली इन्द्रियों का अभिलषित देश, काल, विषयों में व्यापार ( व्याप्त होना) 'विकरणभाव' कहाता। प्रकृति के समस्त विकारों पर वश्यता ( प्राप्त कर लेना) 'प्रधानजय' कहलाता है। ये तीनों सिद्धि 'मधुप्रतीका' कही जाती हैं। और ये सिद्धियाँ पाँचों इन्द्रियों के रूपों के जय से प्राप्त की जाती हैं॥४८॥

Yog Prakash

इस सूत्र में इन्द्रियजय की सिद्धियाँ बतलाई हैं। यहाँ पर इन्द्रियजय से तीन सिद्धियाँ बतलाई हैं। मनोजवित्व, विकरणभाव और प्रधानजय।

(१) मनोजवित्व - मन अति तीव्र गति वाला पदार्थ है। इसलिये मन का उदाहरण दिया गया है। इस सिद्धि से शरीर में तीव्रता से चलने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है और दौड़ने का सामर्थ्य भी बढ़ जाता है। साधारण लोगों की अपेक्षा योगी अधिक तीव्र गति से चल सकता है और अधिक दौड़ सकता है। परन्तु मन की भाँति चलना और दौड़ना शरीर से नहीं हो सकता। मन के साथ शरीर का कुछ सादृश्य दिखाया है, पूर्णरूपेण नहीं। शरीर के रहते हुये मन, इन्द्रियों के साथ जितनी गति से सम्बद्ध होता है, उतनी गति से शरीर नहीं चल सकता।

(२) विकरणभाव - इन्द्रियों में विषयों को ग्रहण करने का विशेष सामर्थ्य उत्पन्न होता है। यह विकरणभाव है। इसको न मानकर यदि विकरणभाव का यह अर्थ किया जाता है कि इन्द्रियाँ बिना शरीर के कहीं पर रहकर अपने कार्यों को कर सकती हैं तो ऐसा सम्भव नहीं है। यह पहले लिख दिया है कि स्थूल शरीर के बिना केवल सूक्ष्म शरीर कार्य नहीं कर सकता। बिना स्थूल शरीर के केवल इन्द्रियों से योगी भी कार्य नहीं कर सकता।

(३) प्रधानजय - प्रधान = प्रकृति से बने महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्रा, ये प्रकृति भी हैं और विकृति भी। महत्तत्त्व = (बुद्धि) को जीत लेना, अहंकार को जीत लेना और प्रकृति से बने उपकरणों को अपने वश में कर लेना प्रधानजय है, अर्थात् सत्त्वादि तीन गुणों से बने अपने से सम्बद्ध उपकरणों को जीत लेना प्रधानजय है। प्रधानजय का यह अभिप्राय नहीं कि पूर्ण प्रकृति और पूर्ण सृष्टिरूप विकृति को जीत लेना। अपने से सम्बद्ध बुद्धि आदि पदार्थों को और कुछ मात्रा में बाहर के पदार्थों को अधिकार में कर लेना प्रधानजय है॥४८॥

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