इस सूत्र में इन्द्रियों के पाँच रूपों ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय, अर्थवत्त्व में संयम करने का फल बतलाया है। इसी पाद के ४४ वे सूत्र में भूतों के पाँच रूपों में संयम करने से भूतजय की सिद्धि बतलाई थी। अब इन्द्रियों के पाँच रूपों में संयम करने से 'इन्द्रिय जय' की सिद्धि बतलाते हैं।
(१) शब्दादि तथा घटादि विषय, 'ग्राह्य' कहाते हैं और शब्दादि घटादि ग्राह्यविषयों में जो इन्द्रियों की वृत्ति (व्यापार) है, वह 'ग्रहण' कही जाती है अर्थात् विषय ग्राह्य हैं और विषयाकार वृत्ति ग्रहण कहाती है। यह इन्द्रियों का प्रथम रूप है। वह ग्रहण रूप इन्द्रियों की वृत्ति केवल सामान्य विषयक नहीं है अर्थात् केवल धर्ममात्र को ही विषय करने वाली नहीं है। किन्तु धर्मी का भी ज्ञान करवाती है। कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि इन्द्रियों से घटादि वस्तुओं का विशेष ज्ञान नहीं होता। यदि इन्द्रियों से घटादि पदार्थों का विशेष ज्ञान होना न माना जायेगा तो इन्द्रियों से जाने गये विषय का इन्द्रियों से और मन से कैसे निश्चय होगा ? इसलिये इन्द्रियाँ धर्म, धर्मी दोनों का ही ग्रहण करवाती हैं।
(२) महत्तत्त्व से अहंकार उत्पन्न होता है। अहंकार से इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं। ये नेत्रादि इन्द्रियाँ कार्य द्रव्य रूप। यही इन्द्रियों का दूसरा रूप हैं।
(३) अस्मिता स्वरूप वाला अहंकार इन्द्रियों का तीसरा रूप है। उस सामान्य के इन्द्रियाँ विशेष हैं। व्यवसायात्मक निश्चयात्मक प्रकाशक्रियास्थितिशील गुण है ।
(४) जिन गुणों के अहंकार सहित इन्द्रियाँ परिणाम है अर्थात् अहंकार और इन्द्रियों का उपादान सत्त्वादि तीन गुण हैं, यह इन्द्रियों का चौथा रूप है।
(५) तीनों गुणों में अनुगत जो भोग और अपवर्ग सम्पादन का सामर्थ्य है, वह इन्द्रियों का पाँचवाँ रूप है।
यहाँ इन्द्रियों के पाँच रूपों को जानने की रीति बतलाई है। जब व्यक्ति इन्द्रियों के इन पाँच रूपों को अच्छे प्रकार जान लेता है तो अनेक भ्रान्तियाँ दूर हो जाती हैं। जैसे इन्द्रियों को ही आत्मा जानना, उन्हीं को भोक्ता जानना और इन्द्रियों को ही अच्छे बुरे कर्मों का कर्ता जानना इत्यादि भ्रान्तियाँ दूर हो जाती हैं और जीवात्मा का शुद्ध स्वरूप परिज्ञात हो जाता है। इन्द्रियों के पाँचों रूपों में संयम करने से, योगी इन पर विजय प्राप्त कर लेता है। विजय प्राप्त करने पर योगी अधिकारपूर्वक इनको अधर्माचरण से रोककर धर्माचरण में चलाता है। अज्ञान ग्रहण करने से रोककर ज्ञान ग्रहण करने में लगाता है। उपासना काल में जो पाँच इन्द्रियों के विषयों से बाधा उपस्थित होती है, वह बाधा इन्द्रियों को जीत लेने पर दूर हो जाती है॥४७॥