इस सूत्र में कायसम्पत् का स्वरूप बतलाया है।
भूतों पर विजय प्राप्त करने वाले योगी का शरीर रूपवान् = सुन्दर रूप वाला, विशेष कान्ति युक्त, बहुत बलवान् और दृढ़ अवयवों वाला हो जाता है। 'वज्र' पत्थर को कहते हैं। यहाँ पर शरीर के अङ्गों के लिये वज्र शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका यह अभिप्राय नहीं है कि योगी का शरीर पत्थर जैसा ही दृढ़ हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि शरीर के अवयव बहुत हढ़ हो जाते हैं। शरीर की जो विशेषतायें यहाँ पर बतलाई हैं उसमें केवल योगाभ्यास ही कारण है ऐसा नहीं मानना चाहिये। उत्तम भोजन, उचित व्यायाम, पृथिवी आदि भूतों के स्वरूप का ज्ञान, उनसे उत्पन्न हुए अन्न, फल आदि का ज्ञान, उनका उचित प्रयोग, स्वास्थ्य से सम्बद्ध नियमों का परिज्ञान इत्यादि इस शारीरिक सम्पत्ति की प्राप्ति में सहायक होते हैं। आयुर्वेद में कहा है कि (आहार, स्वप्न = निद्रा, ब्रह्मचर्य) ये तीन स्वास्थ्य के आधार हैं?॥४६॥