Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/45

3/45
Sutra
ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च ।। ३.४५ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसम्पत्तद्धर्मानभिघातश्च॥४५॥

शब्दार्थ - (ततः) उस भूतजय से (अणिमादि-प्रादुर्भावः) अणिमा आदि सिद्धियाँ उत्पन्न होती हैं तथा (काय-सम्पत्) शरीर का सामर्थ्य बढ़ता है (तद्-धर्म-अनभिघात:-च) और योगी के कार्य में पृथिवी आदि भूतों के धर्म एक सीमा तक बाधा नहीं डालते।

सूत्रार्थ - उन भूतों पर विजय प्राप्त कर लेने से अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, वशित्व, ईशितृत्व और यत्रकामावसायित्व ये आठ सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं तथा शारीरिक सम्पदा बढ़ती है और पृथिवी आदि पाँचभूतों के धर्म योगी के कार्यों में एक सीमा तक बाधक नहीं बनते।

Vyas Bhashya

तत्राणिमो भवत्यणुः। लघिमा लघुर्भवति। महिमा महान्भवति। प्राप्तिरङ्गुल्यग्रेणापि स्पृशति चन्द्रमसम्। प्राकाम्यमिच्छानभिघातः, भूमावुन्मज्जति निमज्जति यथोदके। वशित्वं भूतभौतिकेषु वशी भवत्यवश्यश्चान्येषाम्। ईशितृत्वं तेषां प्रभवाप्ययव्यूहानामीष्टे। यत्र कामावसायित्वं सत्यसङ्कल्पता यथा सङ्कल्पस्तथा भूतप्रकृतीनामवस्थानम्। न च शक्तोऽपि पदार्थविपर्यासं करोति। कस्मात् ? अन्यस्य यत्रकामावसायिनः पूर्वसिद्धस्य तथाभूतेषु सङ्कल्पादिति। एतान्यष्टावैश्वर्याणि।

कायसंपद्वक्ष्यमाणा। तद्धर्मानभिघातश्च पृथ्वी मूर्त्या न निरुणद्धि योगिनः शरीरादिक्रियाम्, शिलामप्यनुविशतीति, नापः स्निग्धाः क्लेदयन्ति, नाग्निरुष्णो दहति, न वायुः प्रणामी वहति। अनावरणात्मकेऽप्याकाशे भवत्यावृतकायः, सिद्धानामप्यदृश्यो भवति॥४५॥

व्या० भा० अ० - उनमें से 'अणिमा' (वह है जिसमें) अणु होता है, 'लघिमा ' = लघु होता है, 'महिमा' = महान् होता है। 'प्राप्ति' वह है जिसमें अङ्गुलि के अग्रभाग से चन्द्रमा को छूता है। 'प्राकाम्य' का अर्थ है इच्छा का निर्बाध पूर्ण होना (जिससे) भूमि में (उसी प्रकार) तैरता और डूबता है जिस प्रकार पानी में (तैरता डूबता है)। 'वशित्व' = भूतों एवं भूतों से बने पदार्थों पर (उसका) वशित्व होता है और (वह) अन्यों के वश नहीं होता। 'ईशितृत्व' = उन (भूत एवं भौतिक पदार्थों) के उत्पत्ति प्रलय तथा स्थिति के क्रम का ईशन करने में समर्थ होता है। 'यत्रकामावसायित्व' (नामक सिद्धि) सत्यसङ्कल्पता कहलाती है। (उसकी प्राप्ति होने पर) जिस प्रकार का सङ्कल्प होता है उसी प्रकार का भूत एवं उनकी प्रकृतियों का (तन्मात्राओं का) अवस्थान (=स्थिति) होती है। समर्थ होने पर भी पदार्थों को विरुद्ध (उल्टा) नहीं करता। क्यों ? पूर्व सिद्ध सत्यसङ्कल्प वाले ईश्वर का भूतों में उस प्रकार का सङ्कल्प होने से। ये आठ ऐश्वर्य हैं।

'कायसम्पत्' अगले सूत्र में कही जाने वाली है। और उन (भूतों) के धर्मों के द्वारा बाध न होना। पृथिवी कठिनत्व धर्म के द्वारा योगी की शरीर क्रिया को नहीं रोकती, पत्थर में भी अनुप्रवेश करता है। स्नेहगुण युक्त जल उसको आर्द्र नहीं कर सकता गला नहीं सकता। उष्ण (धर्मयुक्त) अग्नि नहीं जलाता है। वहनशील वायु नहीं डुलाती है। अनावरणरूपी आकाश में भी गुप्त शरीर वाला होता है, सिद्धों के लिए भी अदृश्य होता है।। ४५।।

Yog Prakash

इस सूत्र में अणिमादि सिद्धि, कायसम्पत् और भूतों के धर्मों के आघात का निषेध किया है। इस सूत्र के व्यासभाष्य में अणिमादि आठ सिद्धियों के विषय में लिखा है और कुछ अन्य सिद्धियों के विषय में भी लिखा है।

यहाँ पर उन सिद्धियों पर विचार किया जाता है।

अणिमादि सिद्धियों के विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के विचार -

"इसमें द्रष्टा से अभिप्राय ईश्वर है। योगी विभूति को शुद्ध करता है यह योगशास्त्र में लिखा है। अणिमा आदि विभूतियाँ हैं। ये योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांसारिक लोग जो यह मानते हैं कि ये योगी के शरीर में पैदा होती हैं, वह ठीक नहीं है। अणिमा का अर्थ यह है कि (योगी का चित्त) छोटी से छोटी वस्तु को विशेष सूक्ष्म होकर नापने वाला होता है। इसी प्रकार बड़े से बड़े पदार्थ को विशेषतर बड़ा होकर योगी का मन घेर लेता है, उसे गरिमा कहते हैं। ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है।" उपदेशमञ्जरी ११ वाँ प्रवचन, पृष्ठ ११७ 

अणिमादि आठ सिद्धियाँ

१. अणिमा - शरीर को अणु बना लेना यदि पतले शरीर को अणु माना जाता है, तो ठीक है। परन्तु शरीर को चींटी जैसा अथवा परमाणु जैसा बनाना माना जाता है, तो यह सम्भव नहीं।

२. लघिमा - शरीर को कुछ हलका बनाना माना जाता है, तो ठीक है। परन्तु विमान की भाँति आकाश में उड़ना माना जाता है, तो यह परीक्षा कोटि में है।

३. महिमा - शरीर बलवान् व्यक्तियों की भाँति लम्बा चौड़ा बना लिया जाता है तो ठीक है। परन्तु हिमालय पर्वत जैसा माना जाता है, तो सम्भव नहीं है।

४. प्राप्ति - चन्द्रमा को मानसिक कल्पना से अंगुलि के अग्रभाग से छूना माना जाता है, तो ठीक है और यदि स्थूल शरीर की अंगुलि से चन्द्रमा को छूना माना जाता है, तो यह सम्भव नहीं है।

५. प्राकाम्य - इच्छा का विघात न होना। योगी चित्त को वश में करने की इच्छा करे अथवा ईश्वरसाक्षात्कार की इच्छा करे तो प्रयत्न करने पर पूर्ण हो सकती है। यदि योगी यह इच्छा करे कि मैं स्थूलशरीर से शिला में प्रवेश कर जाऊँ और पश्चात् जैसा का तैसा बाहर निकल आऊँ, यह सम्भव नहीं है।

६. वशित्व - पृथिवी आदि कुछ भूतों और उनसे उत्पन्न कुछ पदार्थों को वश में कर लेना तो सम्भव है। जैसे आजकल के वैज्ञानिक कुछ मात्रा में स्थूल भूतों और उनसे बने पदार्थों को वश में कर लेते हैं। वैसे ही योगी भी कर सकता है। परन्तु सभी भूतों और सभी पदार्थों को वश में कर लेना सम्भव नहीं है।

७. ईशितृत्व - भूमि आदि से बने कुछ पदार्थों को लेकर नये पदार्थ उत्पन्न कर देना और उनका नाश कर देना तथा उनको जिस स्थिति में रखना चाहे उसी स्थिति में रखना ऐसा वशित्व योगी कर सकता है। परन्तु प्रकृति अथवा परमाणुओं को लेकर नई सृष्टि बना देना, उसका विनाश कर देना, समस्त सृष्टि के पदार्थों को व्यवस्थित कर देना सम्भव नहीं है।

८. यत्रकामावसायित्व - सत्यसङ्कल्प जो कार्य योगी के ज्ञान, बल से किये जा सकते हैं, उनको उत्पन्न करने की इच्छा करना, उनको बनाने का प्रयास करना, ऐसी स्थिति में उनकी उत्पत्ति हो सकती है और विनाश भी हो सकता है। परन्तु इच्छा मात्र से नये पदार्थों की उत्पत्ति और विनाश नहीं हो सकता।

इसी सूत्र के भाष्य में आई कुछ अन्य सिद्धियों पर विचार :-

'तद्धर्मानभिघात' भूमि योगी के स्थूल शरीर की गति को नहीं रोकती अर्थात् भूमि में स्थूल शरीर से योगी प्रवेश कर जाता है, यह सम्भव नहीं है। यदि बुद्धि से योगी भूमि में प्रवेश करता है तो यह परीक्षा कोटि में है। इसी प्रकार योगी का स्थूल शरीर से पत्थर में प्रवेश करने की बात को समझ लेवें। यदि योगी के शरीर को जल नहीं गलाता है, अग्नि नहीं जलाती है ऐसा माना जाता है तो यह सम्भव नहीं है। योगी का शरीर जल की शीतलता को अग्नि की उष्णता को किसी सीमा तक अयोगी लोगों की अपेक्षा अधिक सह लेता है, ऐसा माना जाये तो यह ठीक है॥४५॥

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