शरीराद्बहिर्मनसो वृत्तिलाभो विदेहा नाम धारणा।
सा यदि शरीरप्रतिष्ठस्य मनसो बहिर्वृत्तिमात्रेण भवति सा कल्पितेत्युच्यते। या तु शरीरनिरपेक्षा बहिर्भूतस्यैव मनसो बहिर्वृत्तिः, सा खल्वकल्पिता। तत्र कल्पितया साधयन्त्यकल्पितां महाविदेहामिति, यया परशरीराण्याविशन्ति योगिनः। ततश्च धारणातः प्रकाशात्मनो बुद्धिसत्त्वस्य यदावरणं क्लेशकर्मविपाकत्रयं रजस्तमोमूलं तस्य च क्षयो भवति॥४३॥
व्या० भा० अ० - शरीर से बाहर (के किसी पदार्थ में) मन की वृत्ति 'विदेहा' नामक धारणा है। वह (धारणा) यदि शरीर में स्थित मन की बाह्य ( पदार्थ में) वृत्तिमात्र से होती है (तो वह) कल्पिता कही जाती है। जो तो शरीराभिमानरहित बहिर्भूत मन की बाह्यवृत्ति अकल्पिता कहलाती है। (योगी) उन दोनों में से कल्पिता के द्वारा अकल्पिता नामक महाविदेहा को सिद्ध करते हैं, जिससे (वृत्तिमात्र से) परशरीरों में आविष्ट हो जाते हैं। उस धारणा से रजस्-तमस् के कारण प्रकाशात्मा बुद्धि का जो क्लेश कर्म और त्रिविध विपाकात्मक आवरण है, उसका क्षय होता है।। ४३॥