Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/42

3/42
Sutra
कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनं ।। ३.४२ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

कायाकाशयोः सम्बन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम्॥४२॥

शब्दार्थ (काय-आकाशयोः) शरीर और आकाश के (सम्बन्ध-संयमात्) सम्बन्ध में संयम करने से (लघु-तूल-समापत्तेः-च) और हल्के तूल आदि पदार्थों में संयम के द्वारा समापत्ति प्राप्त होने पर (आकाश-गमनम्) आकाश में गमन सिद्ध हो जाता है।

सूत्रार्थ- शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से अथवा हल्के रूई आदि पदार्थों में संयम के माध्यम से चित्त के तदाकार होने पर 'आकाश गमन की सिद्धि' प्राप्त होती है।

Vyas Bhashya

यत्र कायस्तत्राकाशं तस्यावकाशदानात् कायस्य, तेन संबन्धः प्राप्तिः। तत्र कृतसंयमो जित्वा तत्संबन्धं लघुषु वा तूलादिष्वापरमाणुभ्यः समापत्तिं लब्ध्वा जितसंबन्धो लघुर्भवति। लघुत्वाच्च जले पादाभ्यां विहरति, ततस्तूर्णनाभितन्तुमात्रे विहृत्य रश्मिषु विहरति। ततो यथेष्टमाकाशगतिरस्य भवतीति॥४२॥

व्या० भा० अ० - जहाँ शरीर होता है वहाँ आकाश होता है (शरीर की स्थिति के लिए) आकाश के (द्वारा) अवकाश देने से शरीर का उससे सम्बन्ध होता है। वहाँ संयम करने वाला (योगी) उस सम्बन्ध को जीतकर रूई आदि परमाणु पर्यन्त लघु पदार्थों में समापत्ति को प्राप्त करके उस सम्बन्ध को जीतकर लघु (हो जाता है), लघु होने से जल पर पैरों से चलता है। पश्चात् मकड़ी के जाले के तन्तुओं में विचरण कर किरणों में विचरता है। उससे इच्छानुसार योगी का आकाश में गमन होता है॥४२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में काया तथा आकाश के सम्बन्ध में किये संयम का फल और रूई आदि हल्के पदार्थों में तथा परमाणुओं तक समापत्ति करके उसके सम्बन्ध को जीतने का फल बतलाया है।

जहाँ पर काया है, वहाँ पर आकाश है। आकाश के द्वारा अवकाश प्रदान करने से शरीर का उससे सम्बन्ध हो जाता है। उस सम्बन्ध में संयम करने वाला योगी, उस सम्बन्ध को जीतकर रूई आदि परमाणु पर्यन्त सूक्ष्म पदार्थों में समापत्ति करके, उस सम्बन्ध को जीतकर हल्का हो जाता है। हल्का होने से जल पर पैरों से गमन करता है। उसके पश्चात् मकड़ी के जाले पर विचरण

करके किरणों पर स्थूल शरीर से घूमता है। उससे अपनी इच्छानुसार स्थूल शरीर से आकाश में घूमता है। अब ऊपर लिखी सिद्धियों पर विचार किया जाता है -

शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से योगी का स्थूल शरीर कैसे इतना हल्का होता है कि जिससे स्थूल शरीर से योगी पानी पर घूमता है। मकड़ी के जाले पर घूमता है। किरणों और परमाणुओं पर घूमता है और अपनी इच्छा के अनुसार आकाश में घूमता है। इतने सम्बन्धमात्र से शरीर के इतना हल्का होने का कारण कोई भी दिखाई नहीं देता और स्थूल शरीर में जो गति आई उसका भी कोई कारण परिज्ञात नहीं है। रूई, मकड़ी का जाला, परमाणु, किरण आदि में समापत्ति करके रूई आदि पदार्थों और शरीर के सम्बन्ध को जीतकर, उन सूक्ष्म पदार्थों पर स्थूल शरीर से घूमने का कोई भी कारण दिखाई नहीं देता। न तो शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से शरीर के हल्का होने का कोई कारण हमें दिखाई देता है और न स्थूल शरीर की गति का कोई कारण दिखाई देता है। इसी प्रकार से रूई, मकड़ी का जाला, परमाणु, किरण इनमें शरीर के हल्का होने का कारण हमें दिखाई नहीं देता है। और न कोई शरीर के घूमने का कारण दिखाई देता है।

प्रश्न - महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने यजुर्वेद १७/६७ मन्त्र के भाष्य में योगी के आकाश और सूर्य में आरोहण करने को लिखा है, इसका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर - वहाँ भी अभिधा से अर्थ नहीं करना चाहिये। अर्थात् यदि यह अर्थ किया जाये कि - योगी शरीर सहित आकाश और सूर्य में आरोहण करता है, तो संभव नहीं। क्योंकि सूर्य में करोड़ों अंश सेल्सियस तापमान है। इतने तापमान में योगी का पार्थिव शरीर जीवित ही नहीं रह सकता। यदि योगी शरीर सहित सूर्य में जायेगा, तो उसकी मृत्यु हो जायेगी। ऐसी सिद्धि तो योगी की मृत्यु का कारण बनेगी। अतः यह बात सिद्ध है कि योगी शरीर सहित आकाश और सूर्य में आरोहण नहीं कर सकता। यदि मन से आकाश गमन और सूर्य में आरोहण माना जाये, तो ठीक है। इसका अभिप्राय यह है कि योगी एकाग्र चित्त होकर बौद्धिक स्तर पर सूर्यादि लोकों का विशेष मनन चिन्तन करके उनके विषय में ज्ञान प्राप्त करता है। सूर्य आरोहण से यही अभिप्राय महर्षि दयानन्द जी का भी समझना चाहिए जो कि उनके निम्न उपदेश से स्पष्ट होता है - 

"अणिमा आदि विभूतियाँ हैं। ये योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांसारिक लोग जो यह मानते हैं कि ये योगी के शरीर में पैदा होती हैं, वह ठीक नहीं है। 'अणिमा' का अर्थ यह है कि [योगी का चित्त] छोटी से छोटी वस्तु का विशेष सूक्ष्म होकर नापनेवाला होता है। इसी प्रकार बड़े से बड़े पदार्थ को विशेषकर बड़ा होकर योगी का मन घेर लेता है, उसे 'गरिमा' कहते हैं। ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है। इस तरह श्रवण, मनन, निदिध्यासन, साक्षात्कार हो जाने से निसन्देह स्पष्ट ज्ञान प्राप्त हो जाता है।" महर्षिदयानन्द उपदेशमञ्जरी ११वां उपदेश - (इतिहासविषय)

इसलिये ये सिद्धियाँ परीक्षा कोटि में हैं। यदि कोई व्यक्ति प्रमाणों से उपर्युक्त सिद्धियों को सिद्ध कर देवे तो, हमें स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है॥४२॥

All Bhashya Sutras