सर्व श्रोत्राणामाकाशं प्रतिष्ठा सर्वशब्दानां च। यथोक्तम्- तुल्यदेशश्रवणानामेकदेशश्रुतित्वं सर्वेषां भवतीति। तच्चैतदाकाशस्य लिङ्गम् अनावरणं चोक्तम्। तथाऽमूर्तस्यानावरणदर्शनाद्विभुत्वमपि प्रख्यातमाकाशस्य। शब्दग्रहणानुमितं श्रोत्रम्, बधिराबधिरयोरेकः शब्दं गृह्णात्यपरो न गृह्णातीति, तस्माच्छ्रोत्रमेव शब्दविषयम्। श्रोत्राकाशयोः संबन्धे कृतसंयमस्य योगिनो दिव्यं श्रोत्रं प्रवर्तते॥४१॥
व्या० भा० अ० - समस्त श्रोत्रेन्द्रियों का आधार आकाश है और सब शब्दों का भी (आधार आकाश है)। जैसा कहा है कि सभी समान स्थान में स्थित श्रोत्रेन्द्रिय वालों को एक देश वाले एक ही प्रकार के शब्दों का श्रवण होता है। इसलिये वह यह (श्रोत्रेन्द्रिय) आकाश का अनुमापक है = साधक है। और (आकाश) अनावरण कहा गया है। उसी प्रकार अमूर्त (आकाश) के अनावरण दिखने से आकाश का विभुत्व भी प्रसिद्ध है। शब्द ग्रहण से श्रोत्रेन्द्रिय की अनुमिति (अनुमानजनित ज्ञान) होता है। बहरे, न बहरे ( इन दोनों) में एक शब्द को ग्रहण करता है, दूसरा ग्रहण नहीं करता है इसलिये श्रोत्र ही शब्द को ग्रहण करता है। श्रोत्रेन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने वाले योगी का 'दिव्य श्रोत्र' होता है॥४१॥