Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/40
समानजयाज्ज्वलनम्॥४०॥
शब्दार्थ – (समान-जयात्) समान प्राण के जीतने से (ज्वलनम्) योगी दीप्तिमान् हो जाता है।
सूत्रार्थ - समान प्राण को जीतने से योगी के शरीर में 'तेजस्विता' आ जाती है।
जितसमानस्तेजस उपध्मानं कृत्वा ज्वलति॥४०॥
व्या० भा० अ० - समान को जीतने वाला (योगी) तेज को उद्दीप्त करके तेजस्वी होता है॥४०॥
इस सूत्र में समान (प्राण) जय का फल बतलाया है। समान प्राण पर विजय प्राप्त करने पर योगी का शरीर दीप्तिमान हो जाता है। उस पर विजय प्राप्त करने का प्रकार यह है कि विधिपूर्वक प्राणायाम करने से प्राण पर योगी का अधिकार हो जाता है। व्यायाम करने से जठराग्नि तीव्र हो जाती है। ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य और ओज की वृद्धि होती है। सात्त्विक और संतुलित भोजन करने से प्राण उचित मात्रा में कार्य करते हैं, इस प्रकार योगी समान प्राण पर विजय प्राप्त कर लेता है। इससे शरीर स्वस्थ हो जाता है और बल, ओज की वृद्धि होने से योगी का शरीर दीप्तिमान हो जाता है अर्थात् चमकता है। इसी का नाम ज्वलनम् है। ‘ज्वलनम्' का अर्थ यह नहीं है कि अग्नि की भाँति प्रकाश देता है और पदार्थों को जलाने लगता है॥४०॥