इस सूत्र में 'प्रातिभ ज्ञान' से अनेक पदार्थों को जानने का कथन है। 'प्रातिभ' उस ज्ञान का नाम है जो किसी बाहर के निमित्त से उत्पन्न नहीं होता। किन्तु अपने अन्दर से ही उत्पन्न होता है। इस ज्ञान को विवेकज ज्ञान का प्रथम रूप माना जाता है। जैसे सूर्य उदय होने से पूर्व सूर्य की लाली का ज्ञान होता है वैसे ही विवेकज ज्ञान के उत्पन्न होने से पूर्व उसके उत्पन्न होने का ज्ञान होता है। सूर्योदय से पूर्व एक सूक्ष्म प्रकाश दिखाई देता है। वह सूर्योदय होने का ज्ञापक है। वैसे ही विवेकज ज्ञान उत्पन्न होने से पूर्व प्रातिभ ज्ञान का उत्पन्न होना विवेकज ज्ञान उत्पन्न होने का ज्ञापक है।
यहाँ पर यह बात ध्यान देने की है कि यह 'प्रातिभज्ञान' कहाँ से आता है। इस जन्म अथवा पूर्वजन्म में जो धर्माचरण वेदादिशास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, सत्संग, योगाभ्यास अर्थात् अष्टाङ्ग योग का अनुष्ठान किया जाता है। उससे सुसंस्कार उत्पन्न होते हैं। उन सुसंस्कारों से जो ज्ञान उत्पन्न होता है उसका नाम प्रातिभज्ञान है। इस प्रातिभज्ञान से अनेक पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। यह देखा जाता है कि इस जन्म में विशेष रूप से न पढे हुए व्यक्तियो को भी कुछ पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। इस सूत्र में पठित 'सर्व' शब्द का यह अर्थ नहीं है कि समस्त पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि अनेक पदार्थों का ज्ञान हो जाता है। जैसे वैशेषिकदर्शन में कुसंस्कार से अविद्या की उत्पत्ति मानी है '। वैसे ही सुसंस्कार से विद्या की उत्पत्ति होती है। इसलिये यह प्रातिभज्ञान सुसंस्कारों से उत्पन्न होता है॥३३॥