Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/32

3/32
Sutra
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनं ।। ३.३२ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्॥३२॥

शब्दार्थ - (मूर्ध-ज्योतिषि ) मूर्धा की ज्योति में संयम करने से (सिद्ध-दर्शनम्) सिद्ध महायोगियों को पहचानने की योग्यता प्राप्त होती है।

सूत्रार्थ - मूर्धा के सात्त्विक प्रकाश में संयम करने से सिद्ध महान् योगियों को पहचानने की योग्यता प्राप्त होती है।

Vyas Bhashya

शिरःकपाले ऽन्तश्छिद्रं प्रभास्वरं ज्योतिः, तत्र संयमं कृत्वा सिद्धानां द्यावापृथिव्योरन्तरालचारिणां दर्शनम्॥३२॥

व्या० भा० अ० - शिर के कपाल के अन्दर छिद्र है उसमें प्रभास्वर-ज्योति है। उसमें संयम करने से पृथ्वी पर रहने वाले सिद्ध योगियों का, द्युलोक एवं पृथ्वी लोक के मध्य में विचरण करने वाले (ग्रहोपग्रह आदि) का दर्शन होता है॥३२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में मूर्धा के सात्त्विक प्रकाश में संयम करने का फल बतलाया है। मूर्धा के सात्त्विक प्रकाश में संयम करने से सिद्धों का दर्शन होता है। योगाभ्यास करने से साधक की बुद्धि सात्त्विक हो जाती है। सत्संग, स्वाध्याय, ईश्वरोपासना करने से योगी में सत्त्वगुण प्रधान हो जाता है और रजोगुण, तमोगुण गौण हो जाते हैं। उससे व्यक्ति विवेक-वैराग्य का विकास करता है और ईश्वरोपासना श्रद्धापूर्वक करता है। व्यवहार में मन, वाणी, शरीर से यम-नियमों का पालन करता है तथा सात्त्विक भोजन करता है। ऐसे अनुष्ठानों के करने से जो सात्त्विक बुद्धि उत्पन्न होती है और ईश्वर की ओर से जो ज्ञान प्राप्त होता है, मेरी दृष्टि में वह मूर्ध- ज्योति है। इस मूर्धज्योति को परिपक्व बना लेने पर सिद्ध पुरुष = उच्च कोटि के योगियों को जानने का सामर्थ्य उत्पन्न होता है। साधारण व्यक्ति जिन योगियों को नहीं जान सकता, उनको योगाभ्यासी जान लेता है।

यहाँ एक ध्यान देने योग्य बात है। भूमिस्थ सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है। भूमि और लोक के मध्य में चलने वाले ग्रहोपग्रहादि का दर्शन होता है। द्युलोक एवं पृथिवीलोक के मध्य में सिद्ध पुरुष घूमते हैं, ऐसा मन्तव्य परीक्षणीय है॥३२॥

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