इस सूत्र में कण्ठकूप में संयम करने का फल बतलाया है। कण्ठकूप में संयम करने से योगी की भूख-प्यास की निवृत्ति होती है। जिह्वा के अधोभाग में एक तन्तु है। तन्तु के अधोभाग में कण्ठ प्रदेश है। उस कण्ठ प्रदेश के नीचे कूप है। उसमें संयम करने से योगी की भूख और प्यास की निवृत्ति (=अनुभूति नहीं) होती है।
इस विषय में यह बात ध्यान देने की है कि कण्ठकूप में संयम करने से कितने समय तक योगी की भूख-प्यास निवृत्त होती है। भूख और प्यास को सहन करने की शक्ति प्रत्येक व्यक्ति की भिन्न-भिन्न होती है और उसको सहन करने का अभ्यास भी भिन्न-भिन्न होता है। ध्यानाभ्यास करने वाला योगी किस प्रकार का भोजन खा कर बैठा है, यह भी भूख-प्यास के सहन करने में कारण है। ध्यानकाल में भूख और प्यास का ध्यान करना अथवा न करना भी इनके न्यून अधिक होने का कारण है। समाधि अवस्था में ईश्वरसाक्षात्कार से जो नित्यानन्द की प्राप्ति होती है उससे भी भूख-प्यास सहन करने की शक्ति मिलती है। इसलिए इन बातों के आधार पर भूख और प्यास को सहने का काल प्रत्येक व्यक्ति का न्यून अधिक होता है।
भूख और प्यास की निवृत्ति होने का यह अर्थ नहीं है कि आजीवन भूख-प्यास नहीं लगती। अथवा कई वर्षों तक भूख प्यास नहीं लगती। कुछ लोग कहते हैं कि अमुक व्यक्ति १५ वर्षों से केवल वायु का सेवन करके जीवित है। वास्तविकता तो यह है कि इस भूमि पर जन्मे हुए शरीर का अन्नादि को छोड़कर केवल वायु के आधार पर जीवित रहना संभव नहीं है।
मानवजीवन का लक्ष्य समस्त दुःखों से मुक्त होकर पूर्ण आनन्द को प्राप्त करना है। इसके लिए इस शास्त्र में प्रतिपादित योग ही एकमात्र उपाय है। योग के अनुष्ठान के लिए शरीर को निरोग, स्वस्थ, बलवान् रखना और दीर्घ जीवन को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना आवश्यक है, यह योग के अन्तर्गत आता है। यह निश्चित है कि भूख-प्यास को रोकने से वा उनको रोकने के लिए औषधि आदि को लेने से शरीर क्षीण होता है। शरीर का क्षीण होना योग के लिए अपेक्षित नहीं है। इस सन्दर्भ में इतना ही विचारणीय है कि भूख-प्यास की निवृत्ति का अर्थ यही है कि ध्यानकाल में भूख-प्यास से बाधा न हो। कण्ठकूप में संयम करने से यह सिद्धि प्राप्त होती है। इस प्रकार योगाभ्यासी कुछ काल तक भूख-प्यास से मुक्त होता है॥३०॥