नाभिचक्रे संयमं कृत्वा कायव्यूहं विजानीयात्। वातपित्तश्लेष्माणस्त्रयो दोषाः। धातवः सप्त त्वग्लोहितमांसस्नाय्वस्थिमज्जाशुक्राणि। पूर्वं पूर्वमेषां बाह्यमित्येवष विन्यासः॥२९॥
व्या० भा० अ० - नाभि चक्र में संयम करके काया के अङ्गों के सन्निवेश को जाने। वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। त्वचा, रक्त, मांस, स्नायु, अस्थि, मज्जा, शुक्र ये सात धातु हैं। इनमें से त्वचा आदि पूर्व पूर्व बाह्य हैं। (त्वचा सबसे बाहर, उसके भीतर रक्त, उसके भीतर मांस, उसके भीतर स्नायु, उसके भीतर अस्थि, उसके भीतर मज्जा, उसके भीतर शुक्र है )॥२९॥