Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/28
ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्॥२८॥
शब्दार्थ - (ध्रुवे) ध्रुव तारे में संयम करने से (तद्-गति-ज्ञानम्) अन्य तारों की गति का ज्ञान होता है।
सूत्रार्थ - ध्रुव तारे में संयम करने से अन्य तारों की गति का ज्ञान हो जाता है।
ततो ध्रुवे संयमं कृत्वा ताराणां गतिं विजानीयात्। ऊर्ध्वविमानेषु कृतसंयमस्तानि विजानीयात्॥२८॥
व्या० भा० अ० उसके पश्चात् ध्रुव में संयम करके तारों की गति को जाने। आगे आगे के मानयुक्त लोकों में कृतसंयम योगी उन ऊर्ध्व विमानों एवं उन लोकों की गति को जाने॥२८॥
इस सूत्र में – ध्रुव तारे में संयम करने का फल बतलाया है। 'ध्रुव' का अर्थ स्थिर है। निश्चित स्थान पर रहने वाले लोक को ध्रुवलोक वा ध्रुवतारा कहते हैं। चक्र का अक्ष स्थिर रहता है। इसी प्रकार इस पृथिवी का कल्पित अक्ष भी स्थिर है उस स्थान को ध्रुवस्थान कहा जाता है। उस स्थान पर और उस स्थान पर रहने वाले तारे पर संयम करने से (गतिशील) तारों की गति का ज्ञान होता है। क्योंकि स्थिर स्थान पर रह कर ही चलायमानों को चलते हुए जाना जा सकता है। इस प्रकार ध्रुव में संयम करके तारों की गति का ज्ञान करे। इससे यह ज्ञात करे कि कौन सा तारा किस समय किस स्थान पर होता है॥२८॥