तत्प्रस्तारः सप्तलोकाः। तत्रावीचेः प्रभृति मेरुपृष्ठं यावदित्येवं भूर्लोकः। मेरुपृष्ठादारभ्याऽऽध्रुवाद् ग्रहनक्षत्रताराविचित्रोऽन्तरिक्षलोकः। ततः परः स्वर्लोकः पञ्चविधो, माहेन्द्रस्तृतीयो लोकः। चतुर्थः प्राजापत्यो महर्लोकः। त्रिविधो ब्राह्मः। तद्यथा - जनलोकस्तपोलोकः सत्यलोक इति।
ब्राह्मस्त्रिभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान्।
माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः॥इति संग्रहश्लोकः।
तत्रावीचेरुपर्युपरि निविष्टाः षण्महानरकभूमयो घनसलिलानलानिलाकाशतमःप्रतिष्ठा महाकालाम्बरीषरौरवमहारौरवकालसूत्रान्धतामिस्राः। यत्र स्वकर्मोपार्जितदुःखवेदनाः प्राणिनः कष्टमायुर्दीर्घकालमाक्षिप्य जायन्ते। ततो महातलरसातलातलसुतलवितलतलातलपातालाख्यानि सप्त पातालानि। भूमिरियमष्टमी सप्तद्वीपा वसुमती, यस्याः सुमेरुर्मध्ये पर्वतराजः काञ्चनः। तस्य राजतवैदूर्यस्फटिकहेममणिमयानि शृङ्गाणि। तत्र वैदूर्यप्रभानुरागान्नीलोत्पलपत्रश्यामो नभसो दक्षिणो भागः। श्वेतः पूर्वः। स्वच्छः पश्चिमः। कुरुण्डकाभ उत्तरः। दक्षिणपार्श्वे चास्य जम्बूः। यतोऽयं जम्बूद्वीपः। तस्य सूर्यप्रचाराद्वात्रिन्दिवं लग्नमिव विवर्तते। तस्य नीलश्वेतशृङ्गवन्त उदीचीनास्त्रयः पर्वता द्विसाहस्त्रायामाः। तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसहस्राणि रमणकं हिरण्मयमुत्तराः कुरव इति। निषधहेमकूटहिमशैला दक्षिणतो द्विसहस्त्रायामाः। तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसहस्राणि हरिवर्षं किंपुरुषं भारतमिति। सुमेरोः प्राचीना भद्राश्वाः माल्यवत्सीमानः। प्रतीचीनाः केतुमालाः गन्धमादनसीमानः। मध्ये वर्षमिलावृतम्। तदेतद्योजनशतसहस्त्रं सुमेरोर्दिशि दिशि तदर्धेन व्यूढम्।
स खल्वयं शतसहस्रायामो जम्बूद्वीपस्ततो द्विगुणेन लवणोदधिना वलयाकृतिना वेष्टितः। ततश्च द्विगुणा द्विगुणाः शाककुशक्रौञ्चशाल्मलगोमेधपुष्करद्वीपाः समुद्राश्च सर्षपराशिकल्पाः सविचित्रशैलावतंसा इक्षुरससुरासर्पिर्दधिमण्डक्षीरस्वादूदकाः। सप्तसमुद्रपरिवेष्टिता वलयाकृतयो लोकालोकपर्वतपरिवाराः पञ्चाशद्योजनकोटिपरिसंख्याताः। तदेतत्सर्वं सुप्रतिष्ठितसंस्थानमण्डमध्ये व्यूढम्। अण्डं च प्रधानस्याणुरवयवो यथाकाशे खद्योत इति।तत्र पाताले जलधौ पर्वतेष्वेतेषु देवनिकाया असुरगन्धर्वकिन्नरकिंपुरुषयक्षराक्षसभूतप्रेतपिशाचापस्मारकाप्सरोब्रह्मराक्षसकूष्माण्डविनायकाः प्रतिवसन्ति। सर्वेषु द्वीपेषु पुण्यात्मानो देवमनुष्याः। सुमेरुस्त्रिदशानामुद्यानभूमिः। तत्र मिश्रवनं नन्दनं चैत्ररथं सुमानसमित्युद्यानानि, सुधर्मा देवसभा, सुदर्शनंपुरम्, वैजयन्तः प्रासादः। ग्रहनक्षत्रतारकास्तु ध्रुवे निबद्धा वायुविक्षेपनियमेनोपलक्षितप्रचाराः सुमेरोरुपर्युपरि संनिविष्टा दिवि विपरिवर्तन्ते।
माहेन्द्रनिवासिनः षड् देवनिकायाः - त्रिदशा अग्निष्वात्ता याम्यास्तुषिता अपरिनिर्मितवशवर्तिनः परिनिर्मितवशवर्तिनश्चेति। ते सर्वे संकल्पसिद्धा अणिमाद्यैश्वर्योपपन्नाः कल्पायुषो वृन्दारकाः कामभोगिन औपपादिकदेहा उत्तमानुकूलाभिरप्सरोभिः कृतपरिवाराः। महति लोके प्राजापत्ये पञ्चविधो देवनिकायःकुमुदा ऋभवः प्रतर्दना अञ्जनाभाः प्रचिताभा इति। एते महाभूतवशिनो ध्यानाहाराः कल्पसहस्रायुषः।
प्रथमे ब्रह्मणो जनलोके चतुर्विधो देवनिकायो ब्रह्मपुरोहिता ब्रह्मकायिका ब्रह्ममहाकायिका अजरामरा इति। एते भूतेन्द्रियवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः।
द्वितीये तपसि लोके त्रिविधो देवनिकायः - आभास्वरा महाभास्वराः सत्यमहाभास्वरा इति। ते भूतेन्द्रियप्रकृतिवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः सर्वे ध्यानाहाराः ऊर्ध्वरेतस ऊर्ध्वमप्रतिहतज्ञाना अधरभूमिष्वनावृतज्ञानविषयाः।
तृतीये ब्रह्मणः सत्यलोके चत्वारो देवनिकाया:-अच्युताः शुद्धनिवासाः सत्याभाः संज्ञासंज्ञिनश्चेति। ते चाकृतभवनन्यासाः स्वप्रतिष्ठा उपर्युपरि स्थिताः प्रधानवशिनो यावत्सर्गायुषः।
तत्राच्युताः सवितर्कध्यानसुखाः, शुद्धनिवासाः सविचारध्यानसुखाः, सत्याभा आनन्दमात्रध्यानसुखाः, संज्ञासज्ञिनश्चास्मितामात्रध्यानसुखाः। तेऽपि त्रैलोक्यमध्ये प्रतितिष्ठन्ति। त एते सप्त लोकाः सर्व एव ब्रह्मलोकाः। विदेहप्रकृतिलयास्तु मोक्षपदे वर्तन्त इति न लोकमध्ये न्यस्ता इति।
एतद्योगिना साक्षात्करणीयं सूर्यद्वारे संयमं कृत्वा ततोऽन्यत्रापि। एवं तावदभ्यसेद्यावदिदं सर्वं दृष्टमिति॥२६॥
व्या० भा० अ० - उस संसार के विस्तार सात लोक हैं। उनमें नीचे नरक से लेकर मेरुपृष्ठ पर्यन्त यह 'भूः' लोक है। मेरुपृष्ठ से लेकर ध्रुव पर्यन्त ग्रह, नक्षत्र, तारायुक्त विचित्र 'अन्तरिक्ष’ लोक है। उसके पश्चात् 'स्व:' लोक, पुनः पाँच प्रकार का 'माहेन्द्र' नामक तृतीय लोक है। चौथा 'प्राजापत्य' नाम का 'महः' लोक है। (आगे) तीन प्रकार का ब्रह्मलोक है जो कि 'जनलोक', 'तपोलोक' और 'सत्यलोक' नाम का है।
तीन भूमियों वाला ब्रह्मलोक, उसके पश्चात् महान् प्राजापत्यलोक है। उसके पश्चात् माहेन्द्रलोक जो कि स्वः नामक लोक कहा गया है कि जिसके अन्तरिक्ष में तारे और भूमि पर प्रजा हैं। ऐसा संग्रहश्लोक में कहा है।
वहाँ नीचे से ऊपर ऊपर स्थित घन, सलिल, अनल, अनिल, आकाश, अन्धकार में स्थित क्रमशः महाकाल, अम्बरीष रौरव, महारौरव, कालसूत्र, अन्धतामिस्र छः महानरक भूमियाँ हैं। जहाँ अपने कर्मों से उपार्जित दुःखानुभूति करने वाले प्राणी कष्टपूर्वक लम्बी आयु को भोग करके जन्म लेते हैं। उसके पश्चात् महातल, रसातल, अतल, सुतल, वितल, तलातल, पाताल नामक सात पाताल है। आठवीं यह सात द्वीपों वाली वसुमती भूमि है। जिसके मध्य में स्वर्णिम पर्वतराज सुमेरुहै। उसके राजत, वैदूर्य, स्फटिक, हेममणिमय चोटियाँ हैं। वहाँ वैदूर्यरश्मि से रंगा हुआ नीलकमल के पत्र की श्यामता के समान आकाश का दक्षिण भाग है। पूर्व भाग श्वेत है। पश्चिम भाग स्वच्छ है। उत्तर भाग कुरुण्ड (रक्त) की आभा वाला है। इसके दक्षिण पार्श्व में जम्बू वृक्ष है, जिसके कारण यह जम्बूद्वीप कहलाता है। उस जम्बूद्वीप से लगे हुये सूर्य के संचार से रात और दिन प्रवृत हो रहे हैं। उसके उत्तर में नीले और श्वेत चोटियों वाले तीन पर्वत दो-दो सहस्र योजन विस्तार वाले हैं।
उसके बीच में रमणक, हिरण्यमय और उत्तरकुरु नामक नौ-नौ सहस्र योजन विस्तार वाले तीन वर्ष (देश) है। दक्षिण में दो-दो सहस्र योजन विस्तार वाले निषध, हेमकूट और हिमालय हैं। उसके बीच में नौ-नौ सहस्र योजनवाले तीन वर्ष हरिवर्ष, किम्पुरुष और भारत हैं। सुमेरु से पूर्व में माल्यवान् सीमा वाला भद्राश्व है। पश्चिम में गन्धमादन सीमा वाला केतुमाल है। बीच में इलावृत वर्ष (देश) है। वे ये सौ हजार (लाख) योजन विस्तार वाले सुमेरु के चारों दिशाओं में उसके आधे ५० सहस्र योजन वाले परिमाण वाले रचित हैं।
वह यह एक लाख योजन विस्तार वाला जम्बूद्वीप है अपने से दुगुने विस्तार वाले वलयाकार लवणोदधि (क्षार समुद्र) से घिरा है। उससे क्रमशः दुगुने दुगुने विस्तार वाले शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मल, मगध, पुष्कर नामक द्वीप वाले, सरसों के ढ़ेर के समान, चित्र-विचित्र तटीय पर्वतों वाले, इक्षुरस, सुरा, घी, दही, माण्ड, दुग्ध के स्वादयुक्त जल वाले सात समुद्र हैं। सातों समुद्रों से घिरा हुआ वलयाकार लोक, आलोकादि पर्वत समूह ५० करोड़ योजन विस्तार वाले कहे गये हैं। वे ये सारे ब्रह्माण्ड के बीच में पृथक् पृथक् निबद्ध हैं। और ये अण्ड प्रकृति का छोटा सा भाग है जैसे कि आकाश में जुगनू।
उस पाताल समुद्र और पर्वतों में देवजाति, असुर, गन्धर्व, किन्नर, किम्पुरुष, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, अपस्मारक, अप्सरा, ब्रह्मराक्षस, कूष्णाण्ड और विनायक रहते हैं। सभी द्वीपों पर पुण्यात्मा देव और मनुष्य रहते हैं। सुमेरु (पर्वत) त्रिदशों की उद्यानभूमि है। उसमें मिश्रवन, नन्दनवन और चैत्ररथ नामक तीन उद्यान सुन्दर सुन्दर फूलों से सुशोभित हैं। वहाँ सुधर्मा नाम देवसभागार है, सुदर्शन नामक नगर है तथा वैजयन्त ( पताकाओं वाले) महल हैं। ग्रह नक्षत्र और तारे ध्रुव से बँधे हुये वायु से प्रेरित नियमित गति वाले सुमेरु के ऊपर स्थित धूम रहें हैं।
माहेन्द्रलोक निवासी छः देवनिकाय है - त्रिदश, अग्निष्वात्त, याम्य, तुषित, अपरिनिर्मित वशवर्ती और परिनिर्मित-वशवर्ती। वे सभी त्रिदशादि पूर्णमनोरथ वाले, अणिमादि [आठ] विभूति सम्पन्न, कल्प के बराबर आयुवाले, पूज्य, काम्यविषयभोगी, संकल्पमात्र निर्मित दिव्यशरीरधारी, उत्तम अनुकूल अप्सराओं के साथ परिवार बनाकर रहनेवाले होते हैं। महः नामक प्राजापत्यलोक में पाँच प्रकार के देव- निकाय (समूह) हैं- कुमुद, ऋभव, प्रतर्दन, अञ्जनाभ और प्राचिताभ।ये महाभूतों पर वशीत्व रखनेवाले, ध्यानसुखाश्रित सहस्रकल्प आयु वाले होते हैं।
ब्रह्मलोक के प्रथम भाग जनलोक में चार प्रकार के देवगण हैं - ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक और अजरामर। ये भूत और इन्द्रियों पर अधिकार रखने वाले क्रमशः दुगुने दुगुने आयु वाले होते हैं।
ब्रह्मलोक के द्वितीय तपोलोक में तीन प्रकार के देवगण हैं - आभास्वर महाभास्वर और सत्य महाभास्वर। ये भूतों और इन्द्रियों और प्रकृति पर अधिकार रखने वाले क्रमशः दुगुने दुगुने आयुवाले, सबके सब ध्यानसुखाजीवी, ऊर्ध्वरेता, सत्य लोक नामक ऊर्ध्वलोक के विषय में अव्याहत ज्ञानवाले, जनलोकप्रभृति अधर भूमियों के विषय सुस्पष्ट ज्ञान वाले होते हैं।
ब्रह्मलोक के तृतीयलोक सत्यलोक में चार देवसमूह हैं - अच्युत, शुद्धनिवास, सत्याभ और संज्ञासज्ञी। ये सब अकृत- भवनन्यास (भवनस्थापनरहित), अपने आप में आश्रित, (निराधार) ऊपरऊपर स्थित, प्रकृति पर अधिकार रखनेवाले और सृष्टि के बराबर आयु वाले होते हैं।
उनमें से अच्युतदेवगण सवितर्कसमाधिसुख सम्पन्न होते हैं। शुद्धनिवास सविचार समाधि सुख सम्पन्न होते हैं। सत्याभ आनन्द समाधिसुखसम्पन्न होते हैं। सँज्ञासज्ञी अस्मिता समाधिसुख सम्पन्न होते है। वे भी त्रिलोक के मध्य में रहते हैं। वे ये सात लोक सारे ब्रह्मलोक ही हैं। विदेहप्रकृतिलय तो मोक्ष मे रहते हैं, वे लोकों में नहीं रहते हैं।
सूर्यद्वार में संयम करके योगियो के द्वारा ये विषय साक्षात् करने योग्य हैं। इनसे अन्यत्र विषयों में भी अभ्यास करना चाहिये जब तक कि ये सारे विषय प्रत्यक्ष न हो जायें।।