प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्॥२५॥
शब्दार्थ - (प्रवृत्ति-आलोक-न्यासात्) प्रवृत्ति के प्रकाश को सूक्ष्म, व्यवहित और दूरस्थ वस्तुओं में लगाने से (सूक्ष्म-व्यवहित-विप्रकृष्ट-ज्ञानम्) सूक्ष्म, व्यवधानयुक्त तथा सुदूरस्थ वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।
सूत्रार्थ - मन की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक में संयम करके उस आलोक को सूक्ष्म, आवरणयुक्त तथा दूर वाली वस्तुओं में लगाने से उन सूक्ष्म आदि वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है।