इस सूत्र में यह बात बतलायी है कि सोपक्रम -निरुपक्रम कर्मों में संयम के करने से और अरिष्टों से भी मृत्यु का ज्ञान होता है।
कर्म दो प्रकार के होते हैं। शीघ्र फल देने वाले और विलम्ब से फल देने वाले। यहाँ आयुफल देने वाले कर्मों के विषय में विशेष विचार करना है। आयुफल देने में पूर्वजन्म के कर्म और इस जन्म के कर्म दोनों ही आयु को बढ़ाने और घटाने में कारण हैं। पूर्वजन्म में किये कर्मों के विषय में योगी संस्कारों के आधार पर सामान्य रूप से ज्ञान कर सकता है। परन्तु पूर्वजन्म के कर्मों को सम्पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। पूर्वजन्म के सम्पूर्ण कर्मों को तो ईश्वर ही जान सकता है। इस जन्म के आयुफल को देने वाले कर्मों के विषय में योगी अधिक मात्रा में जान सकता है। परन्तु इस जन्म के कर्मों को भी, जो जन्म से लेकर अब तक किये हैं उनको वह भी पूर्णरूपेण नहीं जान सकता।
पूर्वजन्मकृत कर्मों के संस्कारों के सामान्य ज्ञान के आधार पर और इस जन्म में किये कर्मों के विशेष ज्ञान के आधार पर योगी अपनी आयु के विषय में यह जान सकता है कि मेरी आयु लगभग इतने वर्ष की हो सकती है। परन्तु इतने क्षणों तक मेरी आयु होगी, यह नहीं जान सकता। जो भूकम्प अथवा किसी व्यक्ति के द्वारा अकस्मात् मृत्यु होती है, उसके विषय में योगी नहीं जान सकता कि मेरी मृत्यु इतने दिनों में अमुक व्यक्ति के द्वारा होगी अथवा अमुक समय में भूकम्प आयेगा और मेरी मृत्यु इतने बजकर इतने क्षणों में होगी। जिस योगी ने बाल्य अवस्था से ब्रह्मचर्य का पालन किया है, उचित व्यायाम किया है, उत्तम भोजन खाया है, शरीर को स्वस्थ रखा है इत्यादि अपने कर्मों को जानकर यह बतला सकता है कि यदि कोई अकस्मात् दुर्घटना न हुई तो मेरी आयु लगभग इतनी हो सकती है। जिस योगाभ्यासी के जीवन में ऊपर बतलाये साधनों की अपेक्षाकृत न्यूनाधिकता रही होगी तो वह अपनी आयु को न्यूनाधिक बतलायेगा सांसारिक लोग अपनी आयु के विषय में न्यून जानते हैं और योगी उनसे अधिक जानता है। यह दोनों में अन्तर है।
अरिष्टों से भी मृत्यु के विषय में ज्ञान होता है। आयुर्वेद में मृत्यु का ज्ञान करवाने वाले अरिष्टों को बतलाया है।
आध्यात्मिक अरिष्ट - जैसे कि कानों में अँगुली डालकर बन्द करने से अव्यक्त ध्वनि सुनाई नहीं देती, इसी प्रकार आँखों को हाथ से दबाने पर प्रकाश नहीं दिखता इत्यादि।
आधिभौतिक अरिष्ट - आध्यात्मिक अरिष्टों के सदृश ये भी होते है, इनके अन्तर्गत व्यक्ति की जीवन शक्ति के क्षीण होने से विचारों में सन्तुलन नहीं रहता। मृत्यु का भी भय बना रहता है। इस स्थिति में वह व्यक्ति अपने पूर्व संस्कारों के आधार पर कभी-कभी ऐसा सोचता है कि मुझे मारने के लिये लोग आ रहे हैं। वास्तव में ये उसके असन्तुलित विचार हैं। वहाँ कोई व्यक्ति नहीं होता। भिन्न भिन्न कल्पनाओं के अनुसार भिन्न भिन्न काल्पनिक पदार्थों को देखता रहता है। इसी प्रकार अपने मृत पूर्वजों को देखता है। यह सर्वविदित है कि मृत व्यक्ति तो रहते ही नहीं हैं।
आधिदैविक अरिष्ट - इन्हें इसी सूत्र के व्यासभाष्य में अनुवाद में देख लेवें॥२२॥