Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/22

3/22
Sutra
सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म. तत्संयमादपरान्तज्ञानम्,अरिष्टेभ्यो वा ।। ३.२२ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा॥२२॥

शब्दार्थ - (सोपक्रमम्) शीघ्र फल देने वाले (निरुपक्रमम् ) विलम्ब से फल देने वाले () और (कर्म) कर्म होते हैं (तत्-संयमात्) उन कर्मों में संयम करने से (अपरान्त-ज्ञानम्) मृत्यु का ज्ञान होता है (अरिष्टेभ्यः) मृत्यु के ज्ञापक चिह्नों से (वा) और (ज्ञान होता है)।

सूत्रार्थ - कर्म दो प्रकार के होते हैं शीघ्र फल देने वाले और विलम्ब से फल देने वाले। उन कर्मों में संयम करने से और मृत्यु के ज्ञापक चिह्नों से योगी को 'मृत्यु का ज्ञान' होता है।

Vyas Bhashya

आयुर्विपाकं कर्म द्विविधम्- सोपक्रमं निरुपक्रमं च। तत्र यथार्दं वस्त्रं वितानितं लघीयसा कालेन शुष्येत्तथा सोपक्रमम्। यथा च तदेव संपिण्डितं चिरेण संशुष्येदेवं निरुपक्रमम्। यथा वाऽग्निः शुष्के कक्षे मुक्तो वातेन समन्ततो युक्तः क्षेपीयसा कालेन दहेत्तथा सोपक्रमम्। यथा वा स एवाग्निस्तृणराशौ क्रमशोऽवयवेषु न्यस्तश्चिरेण दहेत्तथा निरुपक्रमम्। तदैकभविकमायुष्करं कर्म द्विविधम्-सोपक्रमं निरुपक्रमं च। तत्संयमादपरान्तस्य प्रायणस्य ज्ञानम्। अरिष्टेभ्यो वेति।

त्रिविधमरिष्टमाध्यात्मिकमाधिभौतिकमाधिदैविकं च। तत्राध्यात्मिकं घोषं स्वदेहे पिहितकर्णो न शृणोति, ज्योतिर्वा नेत्रेऽवष्टब्धे न पश्यति। तथाधिभौतिकं यमपुरुषान्पश्यति पितॄनतीतानकस्मात्पश्यति। तथाधिदैविकं स्वर्गमकस्मात्सिद्धान्वा पश्यति, विपरीतं वा सर्वमिति। अनेन वा जानात्यपरान्तमुपस्थितमिति॥२२॥

व्या० भा० अ० - आयु रूपी फल को देने वाला कर्म सोपक्रम और निरुपक्रम (नाम से) दो प्रकार का है। उनमें से सोपक्रम (कर्म) ऐसा होता है जैसा कि गीला वस्त्र फैलाया हुआ अल्पकाल से सूख जाय। और जिस प्रकार वही एकत्रित पिण्ड बनाया हुआ देर में सूखे, इस प्रकार (का) निरुपक्रम (कर्म) होता है। और जिस प्रकार अग्नि सूखे तिनकों के समूह पर डाली हुई चारों ओर से वायु से युक्त स्वल्पकाल में जलावे उसी प्रकार सोपक्रम (कर्म) और जिस प्रकार वही अग्नि घास के ढेर में क्रमपूर्वक एक एक अवयव में डाली हुई देर में जलावे, इस प्रकार निरुपक्रम (कर्म) होता है। वह एक जन्म में होने वाला कर्म, आयुरूपी फल देने वाला दो प्रकार का हैसोपक्रम और निरुपक्रम। उसमें (किये गये) संयम से अपरान्त ( = मरण का ज्ञान ) होता है अथवा अरिष्टों से (होता है)।

आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक (नाम से) तीन प्रकार का अरिष्ट है। उनमें से आध्यात्मिक - कर्णों को बन्द किये हुए (व्यक्ति) स्वशरीर में स्थित ध्वनि को नहीं सुनता अथवा नेत्रों को बन्द कर लेने पर प्रकाश को नहीं देखता। उसी प्रकार आधिभौतिक - ( मरणासन्न मानव की मानसिक स्थिति भयभीत असन्तुलित होती है। अत: वह मारने के लिए आने वालों की कल्पना करता है अतः कल्पना से) मारने वालों को देखता है, मृत (परिचित वा) पारिवारिक जनों को अकस्मात् देखता है। उसी प्रकार आधिदैविक - (स्वयं निर्धन, दुःखों से घिरा हुआ होने पर भी अपनी कल्पना में मग्न होने से) अकस्मात् (धनधान्य, भोगभाग्य से परिपूर्ण समस्त सुखों से युक्त) स्वर्ग को देखता है, अथवा सिद्ध पुरुषों को देखता है अथवा (स्वयं धनी, साधन सम्पन्न होने पर भी) सर्वथा उसके विरुद्ध (अपने को दीन-हीन, असहाय) देखता है - इस प्रकार अरिष्टों को देखने से भी जानता है कि मरणासन्न है॥२२॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बात बतलायी है कि सोपक्रम -निरुपक्रम कर्मों में संयम के करने से और अरिष्टों से भी मृत्यु का ज्ञान होता है।

कर्म दो प्रकार के होते हैं। शीघ्र फल देने वाले और विलम्ब से फल देने वाले। यहाँ आयुफल देने वाले कर्मों के विषय में विशेष विचार करना है। आयुफल देने में पूर्वजन्म के कर्म और इस जन्म के कर्म दोनों ही आयु को बढ़ाने और घटाने में कारण हैं। पूर्वजन्म में किये कर्मों के विषय में योगी संस्कारों के आधार पर सामान्य रूप से ज्ञान कर सकता है। परन्तु पूर्वजन्म के कर्मों को सम्पूर्ण रूप से नहीं जान सकता। पूर्वजन्म के सम्पूर्ण कर्मों को तो ईश्वर ही जान सकता है। इस जन्म के आयुफल को देने वाले कर्मों के विषय में योगी अधिक मात्रा में जान सकता है। परन्तु इस जन्म के कर्मों को भी, जो जन्म से लेकर अब तक किये हैं उनको वह भी पूर्णरूपेण नहीं जान सकता।

पूर्वजन्मकृत कर्मों के संस्कारों के सामान्य ज्ञान के आधार पर और इस जन्म में किये कर्मों के विशेष ज्ञान के आधार पर योगी अपनी आयु के विषय में यह जान सकता है कि मेरी आयु लगभग इतने वर्ष की हो सकती है। परन्तु इतने क्षणों तक मेरी आयु होगी, यह नहीं जान सकता। जो भूकम्प अथवा किसी व्यक्ति के द्वारा अकस्मात् मृत्यु होती है, उसके विषय में योगी नहीं जान सकता कि मेरी मृत्यु इतने दिनों में अमुक व्यक्ति के द्वारा होगी अथवा अमुक समय में भूकम्प आयेगा और मेरी मृत्यु इतने बजकर इतने क्षणों में होगी। जिस योगी ने बाल्य अवस्था से ब्रह्मचर्य का पालन किया है, उचित व्यायाम किया है, उत्तम भोजन खाया है, शरीर को स्वस्थ रखा है इत्यादि अपने कर्मों को जानकर यह बतला सकता है कि यदि कोई अकस्मात् दुर्घटना न हुई तो मेरी आयु लगभग इतनी हो सकती है। जिस योगाभ्यासी के जीवन में ऊपर बतलाये साधनों की अपेक्षाकृत न्यूनाधिकता रही होगी तो वह अपनी आयु को न्यूनाधिक बतलायेगा सांसारिक लोग अपनी आयु के विषय में न्यून जानते हैं और योगी उनसे अधिक जानता है। यह दोनों में अन्तर है।

अरिष्टों से भी मृत्यु के विषय में ज्ञान होता है। आयुर्वेद में मृत्यु का ज्ञान करवाने वाले अरिष्टों को बतलाया है।

आध्यात्मिक अरिष्ट - जैसे कि कानों में अँगुली डालकर बन्द करने से अव्यक्त ध्वनि सुनाई नहीं देती, इसी प्रकार आँखों को हाथ से दबाने पर प्रकाश नहीं दिखता इत्यादि।

आधिभौतिक अरिष्ट - आध्यात्मिक अरिष्टों के सदृश ये भी होते है, इनके अन्तर्गत व्यक्ति की जीवन शक्ति के क्षीण होने से विचारों में सन्तुलन नहीं रहता। मृत्यु का भी भय बना रहता है। इस स्थिति में वह व्यक्ति अपने पूर्व संस्कारों के आधार पर कभी-कभी ऐसा सोचता है कि मुझे मारने के लिये लोग आ रहे हैं। वास्तव में ये उसके असन्तुलित विचार हैं। वहाँ कोई व्यक्ति नहीं होता। भिन्न भिन्न कल्पनाओं के अनुसार भिन्न भिन्न काल्पनिक पदार्थों को देखता रहता है। इसी प्रकार अपने मृत पूर्वजों को देखता है। यह सर्वविदित है कि मृत व्यक्ति तो रहते ही नहीं हैं।

आधिदैविक अरिष्ट - इन्हें इसी सूत्र के व्यासभाष्य में अनुवाद में देख लेवें॥२२॥

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