Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/18

3/18
Sutra
संस्कारसाक्षत्करणात्पूर्वजातिज्ञानं ।। ३.१८ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानम्॥१८॥

शब्दार्थ - (संस्कार-साक्षात् करणात्) संयम के माध्यम से संस्कारों का साक्षात्कार करने से (पूर्व-जाति-ज्ञानम्) पूर्वजन्म का ज्ञान होता है।

सूत्रार्थ - योगी संयम के माध्यम से संस्कारों का साक्षात्कार करके 'पूर्वजन्म का ज्ञान' प्राप्त कर लेता है।

Vyas Bhashya

द्वये खल्वमी संस्काराः स्मृतिक्लेशहेतवो वासनारूपा, विपाकहेतवो धर्माधर्मरूपाः। ते पूर्वभवाभिसंस्कृताः परिणामचेष्टानिरोधशक्तिजीवनधर्मवदपरिदृष्टाश्चित्तधर्माः। तेषु संयमः संस्कारसाक्षात् क्रियायै समर्थः। न च देशकालनिमित्तानुभवैर्विना तेषामस्ति साक्षात्करणं, तदित्थं संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानमुत्पद्यते योगिनः। परत्राप्येवमेव संस्कारसाक्षात्करणात्परजातिसंवेदनम्।

अत्रेदमाख्यानं श्रूयते-भगवतो जैगीषव्यस्य संस्कारसाक्षात्करणाद् दशसु महासर्गेषु जन्मपरिणामक्रममनुपश्यतो विवेकजं ज्ञानं प्रादुरभवत्। अथ भगवानावट्यस्तनुधरस्तमुवाच- दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन त्वया नरकतिर्यग्गर्भसंभवं दुःखं संपश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन सुखदुःखयोः किमधिकमुपलब्धमिति ? भगवन्तमावट्यं जैगीषव्य उवाच - दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन मया नरकतिर्यग्भवं दुःखं संपश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन यत्किञ्चिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव प्रत्यवैमि। भगवानावट्य उवाच- यदिदमायुष्मतः प्रधानवशित्वमनुत्तमं च सन्तोषसुखं किमिदमपि दुःखपक्षे निक्षिप्तमिति ? भगवाञ्जैगीषव्य उवाच - विषयसुखापेक्षयैवेदमनुत्तमं सन्तोषसुखमुक्तम्, कैवल्यसुखापेक्षया दुःखमेव। बुद्धिसत्त्वस्यायं धर्मस्त्रिगुणः, त्रिगुणश्च प्रत्ययो हेयपक्षे न्यस्त इति। दुःखस्वरूपस्तृष्णातन्तुः, तृष्णादुःखसंतापापगमात्तु प्रसन्नमबाधं सर्वानुकूलं सुखमिदमुक्तमिति॥१८॥

व्या० भा० अ० - संस्कार दो प्रकार के हैं। (पहला) स्मृत्ति एवं क्लेश के निमित्त = वासनारूप, (दूसरा) विपाक (कर्मफल भोग) के कारण = धर्माधर्मरूप हैं। वे (दोनों प्रकार के संस्कार) पूर्वजन्मों में निष्पादित, परिणाम, चेष्टा, निरोध, शक्ति, जीवन तथा धर्म के समान चित्त के 'अपरिदृष्ट धर्म' हैं। उन (संस्कारों) में (किया गया) संयम उन संस्कारों का साक्षात्कार कराने में समर्थ (होता) है। उन संस्कारों से सम्बद्ध देशकाल निमित्तों के अनुभवों के बिना उन (संस्कारों) का साक्षात्कार नहीं होता। वह इस प्रकार संस्कारों के साक्षात्कार से योगी को पूर्वजन्म का ज्ञान उत्पन्न होता है। इसी प्रकार दूसरे (आत्मा के चित्तस्थ) संस्कारों के साक्षात्कार करने से दूसरे के जन्म का ज्ञान होता है।इस विषय में यह आख्यान सुनने में आता है- संस्कार साक्षात्कार करने से दश महासर्गों में (व्यतीत) जन्मपरिणाम के क्रम को जानने वाले भगवान् जैगीषव्य को विवेकज ज्ञान उत्पन्न हुआ। किसी समय शरीरधारी भगवान् आवट्य उनसे बोले कि दश महासर्गों में जन्म लेते रहने के कारण अनभिभूत बुद्धिसत्त्व वाले, दुःखमय एवं पश्वादि योनियों में प्राप्त होने वाले दुःख को अनुभव करते हुए देवों और मनुष्यों के रूप में बार बार उत्पन्न होने वाले आपने सुख-दुःख में से अधिक क्या प्राप्त किया ? भगवान् आवट्य से जैगीषव्य बोले कि दश महासर्गों में भव्यत्व के कारण अनभिभूत बुद्धिसत्त्व वाले, नारकीय, पशु-पक्षी योनियों में प्राप्त होने वाले दुःख को अनुभव करते हुए देवमनुष्यों के रूप में बार बार उत्पन्न होने वाले मैंने जो कुछ अनुभव किया उस सारे को दुःख ही मानता हूँ। भगवान् आवट्य बोले कि जो यह आप चिरञ्जीव का प्रधान वशित्व और अत्युत्तम सन्तोष सुख है, क्या यह भी दुःख की कोटि में डाल दिया है ? भगवान् जैगीषव्य बोले कि विषय सुख की अपेक्षा से ही यह अत्युत्तम सन्तोष सुख कहा गया है (परन्तु) कैवल्य सुख की अपेक्षा यह दुःख ही है। यह (सन्तोष सुख) बुद्धि सत्त्व का धर्म है (और) त्रिगुणात्मक है। और त्रिगुणात्मक ज्ञान हेय की कोटि में डाला गया है। तृष्णातन्तु दुःखरूप है। तृष्णा (रूपी) दुःख सन्ताप की निवृत्ति होने से यह निर्मल, निर्बाध, सबके अनुकूल सुख कहा गया है॥१८॥

Yog Prakash

इस सूत्र में संस्कारों के साक्षात्कार करने से पूर्वजन्म का ज्ञान होता है, यह बतलाया है। संस्कार दो प्रकार के हैं। एक जो कि स्मृति और क्लेशों के कारण वासनारूप हैं, दूसरे (संस्कार) कर्म फल के कारण हैं जो धर्माधर्मरूप हैं। ये दोनों प्रकार के संस्कार पूर्वजन्म के सञ्चित हैं। ये परिणाम, चेष्टा, निरोध आदि धर्मों के समान चित्त के 'अपरिदृष्ट धर्म' हैं। इनमें किया गया संयम, संस्कारों के साक्षात्कार करने में समर्थ है।  इन संस्कारों का साक्षात्कार देशकाल और निमित्तों के अनुभव के बिना नहीं हो सकता। संस्कारों का साक्षात्कार होने पर योगी को पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है। इस प्रसंग में यह बात ध्यान देने की है कि क्या पूर्वजन्म का ज्ञान प्रत्यक्षस्मृति के रूप में होता है अथवा परोक्षस्मृति के रूप में होता है।

प्रत्यक्षस्मृति - जैसे इसी जन्म में किसी व्यक्ति ने बीस वर्ष का अपना वृतान्त ज्यों का त्यों बतला दिया कि मेरा जन्म इतने वर्ष पूर्व, इस ग्राम वा नगर में इस घर में हुआ था। ये मेरे मातापिता, भाई-बहिन हैं आदि। उस व्यक्ति को अपने जन्मस्थान, माता - पिता आदि के विषय में ठीक प्रकार से स्मरण है और अपने जन्म स्थान पर जाकर, उसको दिखा सकता है। यह है प्रत्यक्षरूप से स्मृति।

परोक्ष रूप से स्मृति - जिसमें संस्कार के कारण स्मृति तो होती है, परन्तु उसमें यह ज्ञात नहीं होता कि ये संस्कार किस देश, काल और किन पदार्थों के माध्यम से उत्पन्न हुए हैं।

जिस स्मृति में देश, काल और मनुष्य आदि पदार्थों का ज्यों का त्यों स्मरण होता है, वह प्रत्यक्ष रूप से स्मृति है। और जिस स्मृति में देश, काल और मनुष्य आदि पदार्थों का कुछ भी परिज्ञान नहीं होता है, वह परोक्षरूप से स्मृति है। गौ का बछड़ा उत्पन्न होते ही मां के स्तनों कादूध पीने का प्रयास करता है, यह परोक्ष स्मृति है। उस बछड़े को यह ज्ञात है कि इन स्तनों में दूध है। यह पूर्वजन्म के संस्कारों से स्मृति उत्पन्न हुई है। परन्तु बछडे को यह ज्ञात नहीं है कि उसने किस देश में, किस काल में, किस प्रकार की गौ के स्तनों का दूध पिया था। इस स्मृति के विषय में पुनर्जन्म मानने वालों में प्रायः मतभेद नहीं है। परन्तु देश, काल और अन्य पदार्थों सहित स्मृति के विषय में मतभेद है। इस सूत्र में 'पूर्व जन्म का ज्ञान होता है' ऐसा माना है, परन्तु महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस बात को स्वीकार नहीं किया, इसलिए यह विषय और विचारणीय है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के वचन इस प्रकार से हैं

"प्रश्न - जो अनेक (जन्म) हों तो पूर्वजन्म और मृत्यु की बातों का स्मरण क्यों नहीं ? उत्तर - जीव अल्पज्ञ है त्रिकालदर्शी नहीं, इसलिए स्मरण नहीं रहता। और जिस मन से स्मरण करता है, वह भी एक समय में दो ज्ञान नहीं कर सकता। भला पूर्वजन्म की बात दूर रहने दीजिये, इसी देह में जब गर्भ में जीव था, शरीर बना, पश्चात् जन्मा, पाँचवें वर्ष से पूर्व तक जो जो बातें हुई हैं उनका स्मरण क्यों नहीं कर सकता ? और जागृत वा स्वप्न में बहुत सा व्यवहार प्रत्यक्ष में करके जब सुषुप्ति अर्थात् गाढ निद्रा होती है तब जागृत आदि व्यवहार का स्मरण क्यों नहीं कर सकता ? और तुम से कोई पूछे कि बारह वर्ष के पूर्व तेरहवें वर्ष के पाँचवें महीने के नवमें दिन दश बजे पर पहली मिनट में तुम ने क्या किया था ? तुम्हारा मुख, हाथ, कान, नेत्र, शरीर किस ओर किस प्रकार का था ? और मन में क्या विचार था ? (तो कुछ भी न बता सकोगे ) जब इसी शरीर में ऐसा है, तो पूर्वजन्म की बातों के स्मरण में शङ्का करनी केवल लड़कपने की बात है। और जो स्मरण नहीं होता है इसी से जीव सुखी है, नहीं तो सब जन्मों के दुःखों को देख दुःखित होकर मर जाता। जो कोई पूर्व और पीछे जन्म के वर्तमान को जानना चाहे तो भी नहीं जान सकता। क्योंकि जीव का ज्ञान और स्वरूप अल्प है। यह बात ईश्वर के जानने योग्य है, जीव के नहीं।"- सत्यार्थप्रकाश नवम समुल्लास इसी प्रकार ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने पुनर्जन्म के विषय में 'ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका' में लखा है "जब इसी जन्म के व्यवहारों को इसी शरीर में भूल जाते हैं, तो पूर्व शरीर के व्यवहारों का कब ज्ञान रह सकता है ? "॥१८॥

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