Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) Yogdarshanam / 3/13

3/13
Sutra
एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः ।। ३.१३ ।।

Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak)

हिन्दी
Yogdarshanam (Swami Satypati Parivrajak) - हिन्दी
Word Meaning

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः॥१३॥

शब्दार्थ - (एतेन) इस [चित्त के परिणामों की व्याख्या ] से (भूत-इन्द्रियेषु) भूतों और इन्द्रियों में (धर्म-लक्षण-अवस्था-परिणामाः) धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्था परिणाम (व्याख्याताः) व्याख्यात जानने चाहिये।

सूत्रार्थ - चित्त के इन निरोधपरिणाम, समाधिपरिणाम और एकाग्रतापरिणामों से भूतों और इन्द्रियों में धर्मपरिणाम, लक्षणपरिणाम और अवस्थापरिणाम का व्याख्यान समझ लेना चाहिये।

Vyas Bhashya

एतेन पूर्वोक्तेन चित्तपरिणामेन धर्मलक्षणावस्थारूपेण भूतेन्द्रियेषु धर्मपरिणामो लक्षणपरिणामोऽवस्थापरिणामश्चोक्तो वेदितव्यः। तत्र व्युत्थाननिरोधयोर्धर्मयोरभिभवप्रादुर्भाव धर्मिणि धर्मपरिणामः। लक्षणपरिणामश्च निरोधस्त्रिलक्षणस्त्रिभिरध्वभिर्युक्तः। स खल्वनागतलक्षणमध्वानं प्रथमं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तो वर्तमानलक्षणं प्रतिपन्नो यत्रास्य स्वरूपेणाभिव्यक्तिः। एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा। न चातीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तः।

तथा व्युत्थानं त्रिलक्षणं त्रिभिरध्वभिर्युक्तं वर्तमानं लक्षणं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तमतीतलक्षणं प्रतिपन्नम्। एषोऽस्य तृतीयोऽध्वा। न चानागतवर्तमानाभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तम्। एवं पुनर्व्युत्थानमुपसंपद्यमानमनागतं लक्षणं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तं वर्तमानं लक्षणं प्रतिपन्नम्। यत्रास्य स्वरूपाभिव्यक्तौ सत्यां व्यापारः। एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा। न चातीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तमिति। एवं पुनर्निरोध एवं पुनर्व्युत्थानमिति।

तथावस्थापरिणामः। तत्र निरोधक्षणेषु निरोधसंस्कारा बलवन्तो भवन्ति दुर्बला व्युत्थानसंस्कारा इति। एष धर्माणामवस्थापरिणामः। तत्र धर्मिणो धर्मैः परिणामो धर्माणां लक्षणैः परिणामो लक्षणानामप्यवस्थाभिः परिणाम इति। एवं धर्मलक्षणावस्थापरिणामैः शून्यं न क्षणमपि गुणवृत्तमवतिष्ठते। चलं च गुणवृत्तम्। गुणस्वाभाव्यं तु प्रवृत्तिकारणमुक्तं गुणानामिति। ( भाष्यं द्रष्टव्यम् २/१५,१८) एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मधर्मिभेदात्रिविधः परिणामो वेदितव्यः।

परमार्थतस्त्वेक एव परिणामः। धर्मिस्वरूपमात्रो हि धर्मो धर्मिविक्रियैवैषा धर्मद्वारा प्रपञ्च्यत इति। तत्र धर्मस्य धर्मिणि वर्तमानस्यैवाध्वस्यतीतानागतवर्तमानेषु भावान्यथात्वं भवति, न तु द्रव्यान्यथात्वम्। यथा सुवर्णभाजनस्य भित्त्वाऽन्यथा क्रियमाणस्य भावान्यथात्वं भवति न सुवर्णान्यथात्वमिति।

अपर आह-धर्मानभ्यधिको धर्मी पूर्वतत्त्वानतिक्रमात्। पूर्वापरावस्थाभेदमनुपतितः कौटस्त्यैनैव परिवर्तेत यद्यन्वयी स्यादिति। अयमदोषः। कस्मात् ? एकान्तानभ्युपगमात्। तदेतत्रैलोक्यं व्यक्तेरपैति। कस्मात् ? नित्यत्वप्रतिषेधात् अपेतमप्यस्ति। विनाशप्रतिषेधात्। संसर्गाच्चास्य सौक्ष्म्यं सौक्ष्म्या च्चानुपलब्धिरिति।

लक्षणपरिणामो धर्मोऽध्वसु वर्तमानोऽतीतोऽतीतलक्षणयुक्तोऽनागतवर्तमानाभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्तः। तथानागतोऽनागतलक्षणयुक्तो वर्तमानातीताभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्तः। तथा वर्तमानो वर्तमानलक्षणयुक्तोऽतीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्त इति। यथा पुरुष एकस्यां स्त्रियां रक्तो न शेषासु विरक्तो भवतीति।

अत्र लक्षणपरिणामे सर्वस्य सर्वलक्षणयोगादध्वसंकरः प्राप्नोतीति परैर्दोषश्चोद्यत इति। तस्य परिहारः-धर्माणां धर्मत्वमप्रसाध्यम्। सति च धर्मत्वे लक्षणभेदोऽपि वाच्यो, न वर्तमानसमय एवास्य धर्मत्वम्। एवं हि न चित्तं रागधर्मकं स्यात्क्रोधकाले रागस्यासमुदाचारादिति।

किञ्च, त्रयाणां लक्षणानां युगपदेकस्यां व्यक्तौ नास्ति संभवः। क्रमेण तु स्वव्यञ्जकाञ्जनस्य भावो भवेदिति। उक्तं च-रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुध्यन्ते, सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्तन्ते। तस्मादसंकरः। यथा रागस्यैव क्वचित्समुदाचार इति न तदानीमन्यत्राभावः, किं तु केवलं सामान्येन समन्वागत इत्यस्ति तदा तत्र तस्य भावः, तथा लक्षणस्येति।

न धर्मी त्र्यध्वा। धर्मास्तु त्र्यध्वानः। ते लक्षिता अलक्षिताश्च तां तामवस्थां प्राप्नुवन्तोऽन्यत्वेन प्रतिनिर्दिश्यन्तेऽवस्थान्तरतो न द्रव्यान्तरतः। यथैका रेखा शतस्थाने शतं दशस्थाने दशैका चैकस्थाने, यथा चैकत्वेऽपि स्त्री माता चोच्यते दुहिता च स्वसा चेति।

अवस्थापरिणामे कौटस्थ्यप्रसङ्गदोषः कैश्चिदुक्तः। कथम् ? अध्वनो व्यापारेण व्यवहितत्वात्। यदा धर्मः स्वव्यापारं न करोति तदानागतो, यदा करोति तदा वर्तमानो, यदा कृत्वा निवृत्तस्तदातीत इत्येवं धर्मधर्मिणोर्लक्षणानामवस्थानां च कौटस्थ्यं प्राप्नोतीति परैर्दोष उच्यते।

नासौ दोषः। कस्मात् ? गुणिनित्यत्वेऽपि गुणानां विमर्दवैचित्र्यात्। यथा संस्थानमादिमद्धर्ममात्रं शब्दादीनां विनाश्यविनाशिनामेवं लिङ्गमादिमद् धर्ममात्रं सत्त्वादीनां गुणानां विनाश्यविनाशिनाम्, तस्मिन्विकारसंज्ञेति।

तत्रेदमुदाहरणं मृद्धर्मी पिण्डाकाराद्धर्माद्धर्मान्तरमुपसंपद्यमानो धर्मतः परिणमते घटाकार इति। घटाकारोऽनागतं लक्षणं हित्वा वर्तमानलक्षणं प्रतिपद्यत इति लक्षणतः परिणमते। घटो नवपुराणतां प्रतिक्षणमनुभवन्नवस्थापरिणामं प्रतिपद्यत इति। धर्मिणोऽपि धर्मान्तरमवस्था, धर्मस्यापि लक्षणान्तरमवस्थेत्येक एव द्रव्यपरिणामो भेदेनोपदर्शित इति। एवं पदार्थान्तरेष्वपि योज्यमिति। त एते धर्मलक्षणावस्थापरिणामा धर्मिस्वरूपमनतिक्रान्ता इत्येक एव परिणामः सर्वानमून्विशेषानभिप्लवते। अथ कोऽयं परिणामः ? अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः परिणामः॥१३॥

व्या० भा० अ० –

चित्त के इस (निरोध परिणाम, समाधि परिणाम, एकाग्रता परिणाम) के द्वारा भूतों एवं इन्द्रियों में धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम और अवस्था परिणाम कहा गया है ऐसा जान लेना चाहिये।उनमें से व्युत्थान एवं निरोध धर्मों का अभिभव प्रादुर्भाव धर्मी (चित्त) में धर्म परिणाम है और लक्षण परिणाम कहा जाने वाला निरोध तीन लक्षणों वाला तीन अध्वाओं-स्थितियों से युक्त है। यह अनागत (भविष्यत्) कालिक अपनी पहली स्थिति को छोड़कर (अपने) धर्मत्व को सुरक्षित रखता हुआ वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुआ जहाँ इसकी स्वरूप के द्वारा अभिव्यक्ति है। यह इस (निरोध) की दूसरी स्थिति है। यह (वर्तमान स्थिति वाला निरोध) अतीत अनागत लक्षणों से वियुक्त नहीं हैं।

उसी प्रकार व्युत्थान तीन लक्षणों वाला, तीनों स्थितियों से युक्त वर्तमान लक्षण को छोड़कर अपने धर्मत्व को सुरक्षित रखता हुआ अतीत लक्षण (स्थिति) को प्राप्त होता है। यह इसकी तीसरी स्थिति है।और (यह स्थिति) अनागत (भविष्यत्) और वर्तमान (कालिक) लक्षणों से (स्थितियों से) वियुक्त नहीं है। इसी प्रकार प्रादुर्भूत होने वाला व्युत्थान अनागत स्थिति को छोड़कर (अपने) धर्मत्व को न छोड़ता हुआ वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुआ है। जिस स्थिति में इसके स्वरूप की अभिव्यक्ति (प्रकटता) होने पर (वर्तमान कालिक) कार्य होते हैं। यह इस व्युत्थान की दूसरी स्थिति है। यह स्थिति अतीत, अनागत (भूत, भविष्यत्) कालिक लक्षणों से वियुक्त नहीं होती है। इसी प्रकार पुनः निरोध, इसी प्रकार पुनः व्युत्थान होता है।

इसी प्रकार अवस्था परिणाम है। उसमें निरोध (काल) के क्षणों में निरोध संस्कार बलवान् होते हैं और व्युत्थान संस्कार निर्बल होते हैं। यह धर्मों का अवस्था परिणाम है उन तीनों (प्रकार के) परिणामों में धर्मी का धर्मों के द्वारा परिणाम, तीन स्थितियों वाले धर्मों का लक्षणों के द्वारा परिणाम और लक्षणों का भी अवस्थाओं के द्वारा परिणाम होता है।

इस प्रकार धर्म, लक्षण अवस्था से रहित होकर (गुणों का व्यवहार) एक क्षण भी स्थित नहीं होता। गुणों का व्यवहार चञ्चल होता है। गुणों का स्वभाव ही गुणों के परिणाम का कारण कहा गया है। (इस संबंध में योगसूत्र २/१५ व १८ का भाष्य द्रष्टव्य है)। इस (चित्तपरिणाम) के द्वारा भूतों एवं इन्द्रियों में धर्मधर्मी भेद से तीन प्रकार का परिणाम जानना चाहिये।

 

वास्तव में एक ही परिणाम है। (क्योंकि) धर्म तो धर्मी का स्वरूप मात्र है। धर्म के द्वारा धर्मी का यह विकार (परिणाम) ही प्रपञ्चित होता है। उस (धर्मी) में रहनेवाले धर्म का ही अतीत, अनागत, वर्तमान स्थितियों में भाव (विकार) की ही अन्यता होती है द्रव्य (धर्मी) का अन्यथात्व नहीं होता। जैसे कि तोड़कर अन्य प्रकार से बनाये जाने वाले सुवर्णपात्र का अन्य प्रकारत्व होता है, सुवर्ण का अन्य प्रकारत्व नहीं।

दूसरा कहता है - धर्मों से अतिरिक्त धर्मी नहीं है। पूर्वतत्त्व (धर्मी) का अतिक्रमण न होने से। यदि पूर्व एवं पर अवस्था में अनुगत रहने वाला कोई धर्मी होवे (तो वह) कूटस्थता से ही परिवर्तित होवे ? (इस पक्ष में) यह दोष नहीं है। क्यों ? नित्यत्व के प्रतिषेध से (ऐकान्तिक नित्यता को स्वीकार न करने से )। यह सारा जगत् व्यक्तता से च्युत होता है। क्यों ? नित्यत्व के प्रतिषेध से। व्यक्तता से च्युत होने पर भी विद्यमान रहता है, विनाश का प्रतिषेध होने से। अपने कारण में लीन होने से (जगत् की) सूक्ष्मता होती है। और सूक्ष्मता के कारण ही इसकी (अभिव्यक्ति की) उपलब्धि नहीं होती है।

लक्षण परिणाम धर्म (तीनों) कालों में विद्यमान होता हुआ अतीत होता है, अतीत लक्षणयुक्त (धर्म) अनागत एवं वर्तमान लक्षणों से अवियुक्त होता है। इसी प्रकार अनागत (धर्म) अनागत लक्षण युक्त होता हुआ वर्तमान एवं अतीत लक्षणों से अवियुक्त होता है। इसी प्रकार वर्तमान (धर्म) वर्तमान लक्षण से युक्त होता हुआ अतीत एवं अनागत लक्षणों से अवियुक्त होता है। जैसे कोई पुरुष एक स्त्री में रक्त (रागयुक्त) शेष (स्त्रियों) में विरक्त नहीं होता है।

इस लक्षण परिणाम में प्रत्येक लक्षण का सब लक्षणों के साथ कालसार्य दोष होता है ऐसा इस पक्ष में दोष बतलाया जाता है। उसका समाधान :- धर्मों का धर्मत्व (सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं) सिद्ध ही है। धर्मत्व है तो लक्षण भेद भी कहना होगा। इस (धर्म का) धर्मत्व केवल वर्तमान समय में ही नहीं है। इसी प्रकार चित्त क्रोध काल में राग के अभिव्यक्त न होने से राग धर्मक सिद्ध नहीं होवे।

और क्या ? एक ही समय एक (पदार्थ में) अभिव्यक्ति में तीन लक्षणों का होना सम्भव नहीं है। क्रमशः तो अपने व्यञ्जक से अभिव्यक्त होने वाले की अभिव्यक्ति होती है। और कहा है कि. अभिव्यक्तरूप और अभिव्यक्त वृत्तियों का परस्पर विरोध होता है। अनभिव्यक्तरूप वृत्ति तो अभिव्यक्त रूप वृत्तियों के साथ वर्तमान रहते हैं। इसलिये यह काल का साङ्कर्य दोष नहीं रहता है। जैसे कि राग की किसी विषय में अभिव्यक्ति है तो तब अन्यत्र राग का अभाव नहीं होता। किन्तु केवल अपने अव्यक्तरूप से समनुगत रहता है इसलिये तब वहाँ उस (राग) का भाव है, उसी प्रकार लक्षण की (विद्यमानता होती है)।

धर्मी तीन अवस्था वाला नहीं है। धर्म (वर्तमान, अतीत, अनागत) तीन लक्षणों वाले हैं। वे जाने जाते हुवे और न जाने जाते हुवे धर्म उस उस अवस्था को प्राप्त होते हुए अवस्था के भेद से भिन्न रूप से व्यवहृत होते हैं द्रव्य भेद से नहीं। जैसे कि एक रेखा सौ के स्थान में सौ, दश के स्थान में दश, एक के स्थान में एक कही जाती है। और जिस प्रकार स्त्री के एक होने पर भी, माता कही जाती है, और पुत्री कही जाती है और बहन भी।

अवस्था परिणाम में कुछ लोगों ने कूटस्थता की प्रसक्ति का दोष दिया। किस प्रकार ? अनागतादि काल का (केवल) व्यापार से व्यवधान होने से। जब (घटादि ) धर्म (जलाहरणादि) स्वकार्य को नहीं करता तब अनागत, जब करता है तब वर्तमान, जब करके उपरत होता है तब अतीत होता है। इस प्रकार धर्मधर्मी के लक्षणों का और अवस्थाओं का कूटस्थ (नित्यता) दोष आता है, ऐसा अन्यों के द्वारा दोष दिया जाता है।

(वास्तव में) वह दोष नहीं है। किस कारण? गुणी के नित्य होने पर भी गुणों के न्यूनाधिकतारूप विमर्द की विचित्रता से। जैसा कि अविनाशी शब्दादि तन्मात्राओं के विनाशशील कार्यरूपी पृथिवी (आदि पञ्चभूत) धर्ममात्र है इसी प्रकार अविनाशी सत्त्वादि गुणों का, कारणवाला, विनाशी महत्तत्व धर्ममात्र है। उस (पञ्चभूत महत्तत्व) में विकार संज्ञा है।

उसमें यह उदाहरण है - मृत् धर्मी पिण्डाकार धर्म से धर्मान्तर को प्राप्त होता हुआ धर्म रूप से घटरूप में परिणत होता है। घटाकार अनागत लक्षण को छोड़कर वर्तमान लक्षण को प्राप्त होता है, इस प्रकार लक्षण के द्वारा परिणत होता है। घट क्षण क्षण नये से पुराना होता हुआ अवस्था परिणाम को प्राप्त करता है। धर्मी (मृत्) का भी धर्मान्तर (घट) अवस्था, धर्म (घट) का भी लक्षणान्तर (अनागतता से वर्तमानता को प्राप्त होना) अवस्था है एक ही द्रव्यपरिणाम भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखाया है। इस प्रकार की योजना अन्य ( भूत, इन्द्रिय, प्रकृति) में भी कर लेनी चाहिए। वे ये धर्मलक्षणावस्था परिणाम धर्मी के (अपने) स्वरूप) का अतिक्रमण न करते हुए (धर्मी में रहते ) हैं इसलिए एक ही धर्मी का परिणाम इन समस्त विशेषणों को प्राप्त होता है। इसके पश्चात्, यह परिणाम क्या है ? विद्यमान द्रव्य के पूर्वधर्म निवृत्त होने पर अन्यधर्म की उत्पत्ति परिणाम है॥१३॥

Yog Prakash

इस सूत्र में यह बतलाया है कि ९, ११, १२ सूत्रों में जिस प्रकार से चित्त के निरोध परिणाम, समाधिपरिणाम और एकाग्रतापरिणाम बतलाये हैं, उसी प्रकार से भूतों और इन्द्रियों में धर्म, लक्षण और अवस्थापरिणाम जानने चाहियें। यद्यपि चित्त के परिणामों में धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम, अवस्था परिणाम पढ़े नहीं गये हैं। पुनरपि वहाँ पर इन तीनों का ग्रहण होता है।

प्रत्येक वस्तु में अनेक धर्म (गुण) रहते हैं, किंतु यह आवश्यक नहीं कि वे सदा प्रकट ही हों। कुछ धर्म प्रकट रहते हैं कुछ अप्रकट, कुछ धर्म प्रकट रहकर अप्रकट हो जाते हैं, कुछ धर्म अप्रकट से प्रकट हो जाते हैं। सत्कार्यवाद की दृष्टि से कोई भी धर्म अभाव से भावरूप में और भाव से अभावरूप में नहीं आता। वे मात्र प्रकट-अप्रकट रूप में आते जाते रहते हैं।

किसी वस्तु के प्रकट-धर्म का अप्रकट हो जाना और अप्रकट-धर्म का प्रकट हो जाना 'धर्मपरिणाम' कहलाता है। जैसे मिट्टी के लौंदे में पिण्ड- धर्म प्रकट है किन्तु घट-धर्म अप्रकट है, जब मिट्टी के लौंदे से घट बन जायेगा तब 'पिण्ड - धर्म' प्रकट से अप्रकट हो जाता है व 'घटधर्म' अप्रकट से प्रकट हो जाता है। एक (पिण्ड) धर्म का हट जाना और दूसरे (घट) धर्म का आ जाना, 'धर्म-परिणाम' है।

किसी वस्तु के एक धर्म को देखें तो उसे भविष्यत्, वर्तमान और भूत इन तीन कालों में रख सकते हैं। वस्तु में प्रकट होने से पूर्व वह धर्म, भविष्यकाल में है, जब प्रकट हो गया तब वह वर्तमानकाल में है और प्रकट होने के पश्चात् जब अप्रकट हो गया तब भूतकाल में है। किसी धर्म का इन कालों में होना 'लक्षण - परिणाम' कहलाता है। यदि वह धर्म भविष्यकाल में है तो यह उसका ‘अनागत- लक्षण - परिणाम' कहलाता है। यदि वह धर्म वर्तमानकाल में है तो यह उसका ‘वर्तमान-लक्षण-परिणाम' कहलाता है। यदि वह धर्म भूतकाल में है तो यह उसका 'अतीतलक्षण - परिणाम' कहलाता है। जैसे घट बनने से पूर्व मिट्टी में घट - धर्म प्रकट नहीं है, वह भविष्य में प्रकट होगा अर्थात् घट - धर्म भविष्यकाल में है, इसे घट-धर्म का 'अनागत-लक्षण-परिणाम' कहते हैं। घड़ा बनने पर मिट्टी में घट - धर्म प्रकट है अर्थात् घट-धर्म वर्तमानकाल में है, उसे घटधर्म का ‘वर्तमान-लक्षण - परिणाम' कहते हैं। घड़ा टूट जाने पर मिट्टी में घट-धर्म नहीं रहा अर्थात् वह भूत-काल में चला गया, उसे घट-धर्म का 'अतीत-लक्षण-परिणाम' कहते हैं। 

किसी वस्तु के एक धर्म की भविष्यकाल से वर्तमानकाल में अथवा वर्तमानकाल से भूतकाल में जाने की प्रक्रिया को देखें तो ज्ञात होता है कि ये परिवर्तन एकदम एक साथ नहीं होते, क्रमशः होते हैं। वस्तु के धर्म का भविष्यकाल (=अनागत-लक्षण) से वर्तमानकाल (= वर्तमान-लक्षण) में क्रमशः आना और वर्तमानकाल (= वर्तमान-लक्षण) से भूतकाल (= अतीत-लक्षण) में क्रमशः जाना ' अवस्था - परिणाम' कहलाता है। जैसे - मृतपिण्ड में घटधर्म अनागत-लक्षण के रूप में है, अब इस मृत्पिण्ड में क्रमशः परिवर्तन लाकर घड़ा बना दिया गया तो घट-धर्म वर्तमान - लक्षण के रूप में है। मृत्पिण्ड से घड़ा बनने के बीच मिट्टी में क्रमशः जो परिवर्तन हुए, उन्हें 'अवस्था - परिणाम' कहते हैं। अवस्था - परिणाम का अग्रिम उदाहरण घड़ा बनने के कुछ मास या वर्ष पश्चात् वह पुराना, जीर्ण-शीर्ण और नष्ट देखा जाता है, अर्थात् घट-धर्म वर्तमानकाल से भूतकाल में चला गया। नवीन घडे से पुरातन घड़ा बनना व जीर्णशीर्ण होकर नष्ट हो जाना इनके बीच में तो धीरे-धीरे क्रमशः परिवर्तन हुए ये ' अवस्था - परिणाम' कहलाते हैं।

चित्त के धर्म, लक्षण, अवस्था परिणाम: - चित्त के परिणामों को इस प्रकार जानना चाहिये जब योगी प्रयत्न के द्वारा व्युत्थान- संस्कारों को रोक देता है और निरोध -संस्कारों को उत्पन्न कर देता है, तब चित्त-धर्मी का 'निरोध - परिणाम' कहलाता है, यह 'धर्म - परिणाम' है, क्योंकि यहाँ व्युत्थान-धर्म हटकर निरोध-धर्म आ गया है। चित्त की निरुद्ध स्थिति में चित्त का निरोध- धर्म प्रकट अर्थात् वर्तमान रहता है, यह निरोध- धर्म का 'वर्तमान - लक्षण - परिणाम' कहलाता है। इसी स्थिति में चित्त का व्युत्थान-धर्म हट (अर्थात् भूतकाल में चला जाता है, यह व्युत्थान-धर्म का ‘अतीत-लक्षण-परिणाम' कहलाता है। जब असंप्रज्ञात -समाधि में निरोध-संस्कार मंद हो रहे होते हैं और व्युत्थान- संस्कार प्रबल हो रहे होते हैं तब निरोध-धर्म के वर्तमान-लक्षण को प्रतिक्षण बदलना अर्थात् अतीत में जाते जाना और व्युत्थान-धर्म के अनागत-लक्षण को प्रतिक्षण बदलना अर्थात् वर्तमान में आते जाना यह 'अवस्था-परिणाम' कहलाता है।

जब सर्वार्थता (विविध विषयों की वृत्तियाँ) दब जाती है और एकाग्रता (एक विषय की वृत्ति) उभर जाती है तब चित्त का 'समाधि - परिणाम' होता है, यह चित्त का 'धर्म - परिणाम' कहलाता है, क्योंकि यहाँ सर्वार्थता - धर्म हटकर एकाग्रता - धर्म आ गया है। चित्त की एकाग्र-स्थिति में उसका एकाग्रता-धर्म प्रकट (अर्थात् वर्तमानकाल में ) रहता है, यह एकाग्रता - धर्म का 'वर्तमान-लक्षणपरिणाम' कहलाता है। इसी स्थिति में सर्वार्थता - धर्म हट गया (अर्थात् भूतकाल में) होता है, यह सर्वार्थता-धर्म का ‘अतीत - लक्षण - परिणाम' कहलाता है। जब संप्रज्ञात -समाधि में एकाग्रता - धर्म मंद पड़ रहा हो व सर्वार्थता - धर्म उभर रहा हो, तब एकाग्रता - धर्म के वर्तमान - लक्षण का प्रतिक्षण बदलना अर्थात् वर्तमान - लक्षण से अतीत - लक्षण में चले जाना और सर्वार्थता - धर्म के अनागतलक्षण का प्रतिक्षण बदलना अर्थात् अनागत - लक्षण से वर्तमान - लक्षण में आते जाना, यह 'अवस्थापरिणाम' कहलाता है।

जिस प्रकार से ये धर्म, लक्षण, अवस्था परिणाम चित्त के हैं, उसी प्रकार से पृथिवी आदि भूतों और इन्द्रियों के भी होते हैं।

भूतों में तीन परिणाम - जब मिट्टी चूर्ण के रूप में होती है, तब उसमें पानी डालकर पिण्ड बनाते हैं। उसके पश्चात् पिण्ड का घट बना लेते हैं और उसको सुखाकर पका लेते हैं। यह मिट्टी का चूर्ण-धर्म से पिण्ड-धर्म में आना, पिण्ड-धर्म से घट-धर्म में आना 'धर्म -परिणाम' है। जब मिट्टी का घट-धर्म अपने स्वरूप में प्रकट है, यह घट-धर्म का 'वर्तमान- लक्षण-परिणाम' है। घडे का धीरे-धीरे निर्बल होते जाना घट-धर्म के वर्तमान- लक्षण का 'अवस्था-परिणाम' है। जिस प्रकार से मिट्टी में धर्म, लक्षण व अवस्था परिणाम होते हैं, वैसे मनुष्य शरीर में बाल्यावस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था के रूप में धर्म, लक्षण, अवस्था परिणाम होते हैं।

इन्द्रियों में धर्म -लक्षण-अवस्था-परिणाम उदाहरण के लिये एक नेत्रेन्द्रिय का ग्रहण कर रहे हैं। जब नेत्रेन्द्रिय बंद है तब उसमें 'दर्शन- धर्म' अप्रकट है। नेत्रेन्द्रिय के खुलने पर जब वह किसी वस्तु का प्रत्यक्ष करा रही होती है, तब 'दर्शन - धर्म' प्रकट है। नेत्रेन्द्रिय में दर्शन-धर्म का अप्रकट से प्रकट होना नेत्रेन्द्रिय का 'धर्म-परिणाम' है। नेत्रेन्द्रिय की बंद स्थिति में दर्शन-धर्म प्रकट नहीं है, वह भविष्य में प्रकट होगा अर्थात् दर्शन-धर्म भविष्यकाल में है, इसे दर्शन-धर्म का 'अनागतलक्षण-परिणाम' कहते हैं। नेत्रेन्द्रिय के खुलने पर जब वह किसी वस्तु का प्रत्यक्ष कर रही होती है तब दर्शन-धर्म प्रकट है अर्थात् वर्त्तमानकाल में है, इसे दर्शन-धर्म का 'वर्तमान-लक्षण-परिणाम' कहते हैं। वस्तु का प्रत्यक्ष कर लेने के बाद जब नेत्रेन्द्रिय बंद हो गई, तब उसका दर्शन-धर्म अप्रकट है अर्थात् भूतकाल में है, इसे दर्शन-धर्म का 'अतीत-लक्षण-परिणाम' कहेंगे।।

नेत्रेन्द्रिय की बंद स्थिति में दर्शन-धर्म अप्रकट (अनागत-लक्षण में) रहता है, नेत्रेन्द्रिय के खुलने पर दर्शन-धर्म प्रकट (वर्तमान-लक्षण में) रहता है। दर्शन-धर्म के अनागत लक्षण से वर्तमान लक्षण में आते समय जो अनेक परिवर्तन हुए, उन्हें 'अवस्था-परिणाम' कहते हैं।

ये धर्म, लक्षण, अवस्था, धर्मी के परिणाम बतलाये हैं। परन्तु वास्तव में तो एक धर्म परिणाम ही है। यहाँ परिणाम के स्वरूप को जानना आवश्यक है। विद्यमान पदार्थ के पूर्व धर्म का निवृत्त होना और धर्मान्तर की उत्पत्ति होना परिणाम होता है जैसे चूर्ण मिट्टी से पिण्ड, पिण्ड से घट उत्पन्न होता है। यहाँ पर मिट्टी धर्मी का पिण्ड धर्म निवृत्त हो जाता है और घट धर्म उत्पन्न हो जाता है। यह परिणाम है। चित्त के व्युत्थान परिणाम, निरोध परिणाम, समाधि परिणाम और एकाग्रता परिणाम, इनके जानने से योगी सरलता से व्युत्थान अवस्था को अभिभूत करने में और समाधि, एकाग्रता को उद्बुद्ध करने में समर्थ हो जाता है। भूतेन्द्रियों के धर्म, लक्षण, अवस्था परिणामों को जानने से भौतिक पदार्थों के स्वरूप को जानने में समर्थ हो जाता है। समस्त उत्पन्न पदार्थों का उपादान कारण सत्त्व, रजस्, तमस् मूल धर्मी है। परन्तु महत्तत्व, अहंकार, तन्मात्रा, ये प्रकृति धर्मी के धर्म हैं। और ये जिस पदार्थ के उपादान कारण हैं, उसके धर्मी हैं। ये धर्म और धर्मी दोनों प्रकार के हैं। जो किसी पदार्थ का उपादान कारण है; वह धर्मी और जो उससे उत्पन्न कार्य है; वह धर्म है, ऐसा जानना चाहिये॥१३॥

All Bhashya Sutras